Uncovered with Manoj Gairola: क्या मिसाइलों की किल्लत ने महाशक्ति को घुटने टेकने पर कर दिया मजबूर?
क्या ईरान युद्ध का फैसला हो चुका है? क्या अमेरिका वाकई इस युद्ध को हार चुका है? ये सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि एक महीने से ज्यादा का वक्त बीतने के बाद अब डोनाल्ड ट्रंप इस युद्ध को छोड़कर भागने की बात कह रहे हैं. ट्रंप ने कहा है कि अगले दो तीन हफ्तों में अमेरिकी फौज युद्ध के मैदान को छोड़ देगी. आखिरकार जिस जोर शोर के साथ ईरान युद्ध शुरू किया गया था, उसे ट्रंप बीच में क्यों छोड़ना चाहते हैं? आखिर ट्रंप की क्या मजबूरी है? आज हम इसी मुद्दे पर बात करेंगे कि कैसे एक महाशक्ति मिसाइलों की कमी के सामने बेबस नजर आ रही है.
युद्ध के अधूरे मकसद और ट्रंप की मजबूरी
जब 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान पर ताबड़तोड़ हमले शुरू किए थे, तब इस युद्ध के तीन बड़े मकसद बताए गए थे. पहला मकसद था ईरान में रिजीम चेंज यानी सरकार बदलना, दूसरा ईरान की परमाणु ताकत को पूरी तरह खत्म करना और तीसरा ईरान की मिसाइल पावर को सीमित करना. आज एक महीने से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी इनमें से एक भी मकसद पूरा नहीं हुआ है. इसके बावजूद ट्रंप युद्ध छोड़ने की बात कर रहे हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि अमेरिका की खुद की मिसाइल पावर अब बेहद कमजोर हो गई है और उसके पास स्टॉक खत्म होने की कगार पर है.
टॉमहॉक मिसाइलों का खाली होता जखीरा
द वाशिंगटन पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, युद्ध के पहले चार हफ्तों में ही अमेरिका ने ईरान पर 850 टॉमहॉक क्रूज मिसाइलें दाग दी हैं. टॉमहॉक मिसाइल अमेरिका के हथियारों के जखीरे का सबसे खास हिस्सा मानी जाती है. इस मिसाइल की मारक क्षमता 1500 से 2000 किलोमीटर तक की है. मॉडर्न नेविगेशन सिस्टम से लैस यह मिसाइल सटीक निशाने के साथ हमला करती है. इसकी स्पीड करीब 900 किलोमीटर प्रति घंटे की है और यह अपने साथ 450 किलोग्राम तक बारूद ले जा सकती है. लेकिन दिक्कत यह है कि अमेरिका के पास इसका स्टॉक बहुत लिमिटेड है. एक मिसाइल को बनाने की लागत करीब 34 करोड़ रुपए आती है और इसे तैयार करने में दो साल का समय लगता है. पिछले साल अमेरिका ने केवल 57 मिसाइलें ही अपने जखीरे में शामिल की थीं, जबकि युद्ध शुरू होने से पहले उसके पास सिर्फ 3000 टॉमहॉक मिसाइलें थीं.
डिफेंस सिस्टम भी पड़ने लगा है कमजोर
अमेरिका सिर्फ हमला ही नहीं कर रहा, बल्कि ईरान के हमलों को रोकने के लिए भी उसे भारी कीमत चुकानी पड़ रही है. ईरान की मिसाइलों और ड्रोन्स को रोकने के लिए अमेरिका, इजरायल और उनके मित्र देश अब तक 2400 पैट्रियट मिसाइलों का इस्तेमाल कर चुके हैं. हैरानी की बात यह है कि एक साल में ऐसी केवल 650 पैट्रियट मिसाइलों का ही प्रोडक्शन होता है. यानी जितनी मिसाइल अभी तक दागी जा चुकी हैं, उनको दोबारा बनाने में अमेरिका को कम से कम साढ़े तीन साल का समय लगेगा. नौबत यहां तक आ गई है कि अमेरिका ने अपने नाटो सहयोगी देश पोलैंड से पैट्रियट मिसाइलों को खाड़ी में शिफ्ट करने के लिए कहा, लेकिन पोलैंड ने अपनी सुरक्षा का हवाला देकर साफ इनकार कर दिया है.
थाड सिस्टम और चीन का बड़ा खेल
पैट्रियट के अलावा ईरान के हमलों को रोकने के लिए थाड एयर डिफेंस सिस्टम का इस्तेमाल भी हो रहा है. इस युद्ध में अब तक 40 परसेंट थाड सिस्टम की मिसाइलें खत्म हो गईं हैं. एक साल में केवल 100 थाड इंटरसेप्टर बनाए जा सकते हैं. अभी तक जितनी मिसाइलें खर्च हो चुकी हैं, उतना स्टॉक पूरा करने में अमेरिका को कम से कम 5 साल लगेंगे. लेकिन यह प्रोडक्शन भी आसान नहीं है, क्योंकि यहां पर चीन का एंगल जुड़ जाता है. दरअसल, हर इंटरसेप्टर मिसाइल में जो मैग्नेट लगता है, पूरी दुनिया में उसकी 90 परसेंट सप्लाई केवल चीन करता है. इसका मतलब यह हुआ कि अगर चीन चाहे तो अमेरिका के मिसाइल प्रोडक्शन को कभी भी ठप कर सकता है.
गठबंधन देशों की भी सांसें फूलीं
मिसाइलों की यह कमी सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं है. खाड़ी में मौजूद उसके मित्र देशों के लिए भी खतरे की घंटी बज गई है. यूएई और कुवैत जैसे देश अपनी पैट्रियट एयर डिफेंस मिसाइलों का 75 परसेंट हिस्सा खर्च कर चुके हैं. वहीं बहरीन का 87 परसेंट और कतर का 40 परसेंट जखीरा खाली हो चुका है. इजरायल के हालात भी बहुत अच्छे नहीं कहे जा सकते. युद्ध के पहले दो हफ्तों में इजरायल ने ईरान की 97 परसेंट मिसाइलें रोक दी थीं, लेकिन अगले दो हफ्तों में 27 परसेंट मिसाइलें इजरायल के एयर डिफेंस सिस्टम को भेदने में कामयाब रहीं. इसकी वजह यह है कि इजरायल के पास इंटरसेप्टर मिसाइलें कम होने लगी हैं और अब वह हर मिसाइल को गिराने के लिए इंटरसेप्टर नहीं दाग रहा है.
चुनाव का डर और आगे का रास्ता
इन सारे हालातों के बीच डोनाल्ड ट्रंप ने अपने हालिया बयान में कहा है कि स्ट्रेट ऑफ हार्मुज को खुलवाना उनकी जिम्मेदारी नहीं है. वहीं पूरी दुनिया समेत अमेरिका में भी पेट्रोल और गैस की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं. ऐसे में ट्रंप की पार्टी को डर है कि वह नवंबर में होने वाले मिडटर्म इलेक्शन हार सकती है. ट्रंप गुरुवार सुबह अमेरिका को संबोधित करने वाले हैं. वैसे तो ट्रंप के बयान बहुत अनप्रेडिक्टेबल होते हैं, लेकिन इन हालातों को देखते हुए कयास यही लगाए जा रहे हैं कि ट्रंप ईरान में अपनी सो कॉल्ड विक्ट्री का ऐलान करके युद्ध से पीछे हट सकते हैं. अगर ऐसा होता है तो मिडिल ईस्ट के फ्यूचर में क्या होगा, यह कोई नहीं जानता.
चीन ने स्थापित किया विश्व का सबसे बड़ा कृषि मौसम अवलोकन नेटवर्क
बीजिंग, 1 अप्रैल (आईएएनएस)। चीन मौसम विज्ञान प्रशासन के अनुसार, देश ने विश्व का सबसे बड़ा कृषि मौसम अवलोकन नेटवर्क स्थापित किया है। यह नेटवर्क अपने एकीकृत अंतरिक्ष-वायु-भूमि निगरानी मॉडल और अत्याधुनिक तकनीकों के साथ न केवल राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा रणनीति को मजबूती प्रदान करता है, बल्कि अपनी विशिष्ट तकनीकी प्रणाली के माध्यम से स्मार्ट कृषि के विकास के लिए एक डिजिटल इंजन के रूप में भी कार्य करता है।
वर्तमान में मौसम विज्ञान विभाग ने 642 कृत्रिम अवलोकन स्टेशनों, 738 स्वचालित अवलोकन स्टेशनों, 15 विशेष सेवा केंद्रों और 91 प्रायोगिक स्टेशनों सहित एक आधुनिक अवलोकन प्रणाली स्थापित की है।
चीन मौसम विज्ञान प्रशासन के मौसम विज्ञान अवलोकन केंद्र के सिस्टम विभाग की उप-निदेशक वू तोंगली ने कहा कि इस अवलोकन नेटवर्क की सबसे बड़ी विशेषता बुद्धिमत्ता और सटीकता का संयोजन है। उन्होंने बताया कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता, लेजर और रिमोट सेंसिंग जैसी अत्याधुनिक तकनीकों के समर्थन से विश्व-स्तर की अग्रणी कृषि मौसम अवलोकन प्रणाली का निर्माण किया गया है। वर्तमान में चीन दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जिसके पास फसलों के विकास के विभिन्न चरणों के लिए स्वचालित अवलोकन डेटा का एक संपूर्ण सेट उपलब्ध है, और मूल डेटा की सटीकता दर 90 प्रतिशत से अधिक है।
(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)
--आईएएनएस
एबीएम/
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