साल 2026 में भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है। बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन, चीन की आक्रामक सैन्य विस्तार नीति, हिंद महासागर में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और सीमा क्षेत्रों में लगातार तनाव ने भारत को अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं को नए सिरे से परिभाषित करने के लिए मजबूर किया है। इसी पृष्ठभूमि में मोदी सरकार ने वर्ष 2026 में ऐसी सामरिक रणनीति अपनाई है जिसका मूल उद्देश्य है सैन्य शक्ति का तीव्र आधुनिकीकरण, स्वदेशी रक्षा उत्पादन का विस्फोटक विस्तार, नई युद्ध तकनीकों में निर्णायक बढ़त और वैश्विक रक्षा कूटनीति का विस्तार।
हम आपको बता दें कि प्रधानमंत्री मोदी की सबसे पहली और सबसे स्पष्ट प्राथमिकता है रक्षा बजट में निरंतर वृद्धि। केंद्रीय बजट 2026-27 में भारत सरकार ने रक्षा क्षेत्र के लिए लगभग 7.85 लाख करोड़ रुपये का रिकॉर्ड आवंटन किया है जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 15 प्रतिशत अधिक है। यह राशि भारत के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग दो प्रतिशत है और केंद्र सरकार के कुल खर्च का लगभग 14.67 प्रतिशत हिस्सा रक्षा क्षेत्र को जाता है। इस बजट में 2.19 लाख करोड़ रुपये पूंजीगत व्यय के लिए रखे गए हैं ताकि सेना को अगली पीढ़ी के लड़ाकू विमान, आधुनिक युद्धपोत, पनडुब्बी, ड्रोन और स्मार्ट हथियारों से लैस किया जा सके।
मोदी सरकार की दूसरी निर्णायक रणनीति है सैन्य आधुनिकीकरण को तेज करना। पिछले कुछ वर्षों में यह स्पष्ट हुआ है कि भारत को एक साथ दो मोर्चों पर युद्ध की संभावना को ध्यान में रखते हुए अपनी सैन्य क्षमता बढ़ानी होगी। इसी रणनीति के तहत भारत ने नौसेना के लिए 26 आधुनिक राफेल लड़ाकू विमान खरीदने का लगभग 7.4 अरब डॉलर का समझौता किया है, जिससे हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की समुद्री शक्ति और मजबूत होगी।
इसके साथ ही भारतीय वायुसेना के लिए नए लड़ाकू स्क्वॉड्रन, आधुनिक मिसाइल प्रणाली और लंबी दूरी की मारक क्षमता वाले हथियारों पर तेजी से काम चल रहा है। सामरिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम चीन और पाकिस्तान दोनों से उत्पन्न सुरक्षा चुनौतियों के जवाब में उठाया गया है।
तीसरी बड़ी प्राथमिकता है आत्मनिर्भर रक्षा उद्योग का निर्माण। वर्ष 2026 के रक्षा बजट में पूंजीगत खरीद का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा घरेलू उद्योगों से खरीद के लिए निर्धारित किया गया है। इसका अर्थ है कि लगभग 1.39 लाख करोड़ रुपये भारतीय कंपनियों और रक्षा निर्माण इकाइयों को मिलेंगे। इससे न केवल सैन्य क्षमता बढ़ेगी बल्कि देश में विशाल रक्षा औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र भी विकसित होगा।
इसी दिशा में उत्तर प्रदेश रक्षा औद्योगिक गलियारा एक बड़ा उदाहरण बनकर उभरा है जहां अब तक 35000 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश आकर्षित हो चुका है। इस परियोजना का लक्ष्य भारत को वैश्विक रक्षा उत्पादन केंद्र बनाना है और हजारों उच्च कौशल रोजगार पैदा करना है।
चौथी रणनीतिक प्राथमिकता है नई पीढ़ी के युद्ध क्षेत्रों में प्रवेश। पारंपरिक युद्ध अब अकेला निर्णायक तत्व नहीं रह गया है। ड्रोन, कृत्रिम बुद्धि आधारित युद्ध प्रणाली, डाटा युद्ध और साइबर युद्ध भविष्य की लड़ाइयों का आधार बनते जा रहे हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए भारत ने ड्रोन बल, सैन्य जियो स्पेशल एजेंसी, डाटा फोर्स और संज्ञानात्मक युद्ध इकाइयों की स्थापना की दीर्घकालिक योजना तैयार की है। इसका उद्देश्य है कि वर्ष 2047 तक भारत पूरी तरह तकनीकी रूप से उन्नत सैन्य शक्ति बन सके।
पांचवीं प्राथमिकता है रक्षा निर्यात का आक्रामक विस्तार। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने हथियार आयातक देश की छवि से बाहर निकलकर रक्षा निर्यातक बनने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाए हैं। उदाहरण के तौर पर हाल ही में इंडोनेशिया ने भारत से लगभग 3800 करोड़ रुपये की ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने का समझौता किया है। यह सौदा केवल आर्थिक नहीं बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे हिंद प्रशांत क्षेत्र में भारत की सामरिक उपस्थिति मजबूत होती है।
छठी रणनीतिक दिशा है भविष्य के युद्ध खतरों के लिए तैयारी। भारत की नई रक्षा दृष्टि में रासायनिक, जैविक, रेडियोलॉजिकल और परमाणु हमलों से निपटने के लिए विशेष सुरक्षा ढांचे का निर्माण भी शामिल है। रक्षा बल विजन 2047 दस्तावेज में स्पष्ट किया गया है कि भविष्य के युद्ध बहुआयामी होंगे और उनके लिए तेज प्रतिक्रिया क्षमता विकसित करना आवश्यक है।
इन सभी पहलों का व्यापक लक्ष्य है भारत को वर्ष 2047 तक एक विकसित और सैन्य दृष्टि से आत्मनिर्भर राष्ट्र बनाना। देखा जाये तो रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा प्रस्तुत रक्षा विजन 2047 राष्ट्रीय शक्ति के समग्र विस्तार का खाका है जिसमें सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और तकनीकी नवाचार को एक साथ जोड़ा गया है।
कुल मिलाकर देखें तो वर्ष 2026 में मोदी सरकार की रणनीतिक प्राथमिकताएं बेहद स्पष्ट और आक्रामक हैं। विशाल रक्षा बजट, तेज सैन्य आधुनिकीकरण, स्वदेशी हथियार निर्माण, नई युद्ध तकनीकों में निवेश, रक्षा निर्यात का विस्तार और भविष्य के युद्धों के लिए तैयारी, ये सभी कदम मिलकर भारत को एक उभरती वैश्विक सैन्य शक्ति में बदलने की दिशा में आगे बढ़ा रहे हैं। यदि यह रणनीति इसी गति से लागू होती रही तो आने वाले दशक में भारत केवल दक्षिण एशिया की सुरक्षा व्यवस्था का केंद्र नहीं रहेगा बल्कि हिंद प्रशांत क्षेत्र की शक्ति संतुलन राजनीति में भी निर्णायक भूमिका निभाएगा।
-नीरज कुमार दुबे
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कैब से सफर करने वाले यात्रियों के लिए, खासकर महिलाओं के लिए, सरकार ने एक अहम और दूरगामी कदम उठाया है। जल्द ही ओला, उबर और रैपिडो जैसे कैब एग्रीगेटर एप्स में यात्रियों को सेम जेंडर ड्राइवर चुनने का विकल्प मिलेगा। यानी महिला यात्री चाहें तो अपनी राइड के लिए महिला ड्राइवर को प्राथमिकता दे सकेंगी। इसके साथ ही ट्रिप पूरी होने के बाद ड्राइवर को सीधे टिप देने की सुविधा भी दी जाएगी, जिसकी पूरी राशि ड्राइवर को ही मिलेगी। यह बदलाव मोटर व्हीकल एग्रीगेटर्स गाइडलाइंस, 2025 में किए गए संशोधनों का हिस्सा है, जिसे केंद्र सरकार ने जारी किया है और राज्यों से इसे लागू करने को कहा गया है।
यात्रियों की सुरक्षा बढ़ाने की दिशा में अहम कदम
इन नए नियमों का मुख्य उद्देश्य यात्रियों की सुरक्षा को मजबूत करना है। खासतौर पर महिला यात्रियों के लिए यह सुविधा काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। देर रात या अनजान इलाकों में सफर के दौरान कई बार महिलाएं असहज महसूस करती हैं। ऐसे में फीमेल ड्राइवर चुनने का विकल्प उन्हें अधिक सुरक्षित और भरोसेमंद अनुभव दे सकता है। सरकार का मानना है कि यह कदम न सिर्फ यात्रियों का भरोसा बढ़ाएगा, बल्कि कैब सेवाओं को ज्यादा समावेशी और संवेदनशील भी बनाएगा।
कब से लागू होगा सेम जेंडर ड्राइवर का नियम?
सरकारी नोटिफिकेशन में इस नियम की कोई स्पष्ट प्रभावी तारीख नहीं बताई गई है। ऐसे में माना जा रहा है कि यह नियम नोटिफिकेशन जारी होने की तारीख से ही प्रभावी है। जब जुलाई 2025 में मोटर व्हीकल एग्रीगेटर्स की मूल गाइडलाइंस जारी की गई थीं, तब राज्यों को इन्हें लागू करने के लिए तीन महीने का समय दिया गया था। संशोधित नियमों के लिए भी कुछ ऐसा ही समय दिया जा सकता है, हालांकि अभी कोई फिक्स्ड टाइमलाइन घोषित नहीं की गई है।
कैसे लागू होगा नया नियम?
यह गाइडलाइंस केंद्र सरकार की ओर से जारी की गई हैं, लेकिन इन्हें जमीन पर लागू करने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की होगी। राज्य सरकारें इन संशोधनों को अपनी लाइसेंसिंग प्रक्रिया में शामिल करेंगी। कैब एग्रीगेटर कंपनियों को अपने एप्स में तकनीकी बदलाव करने होंगे। उदाहरण के तौर पर, क्लॉज 15.6 के तहत एप में सेम जेंडर ड्राइवर चुनने का फीचर जोड़ना होगा। लाइसेंस बनाए रखने या रीन्यू कराने के लिए इन नियमों का पालन अनिवार्य होगा। नियमों की अनदेखी करने पर कंपनी का लाइसेंस सस्पेंड या रद्द भी किया जा सकता है।
हालांकि व्यावहारिक रूप से एप अपडेट और सिस्टम बदलाव में कुछ समय लग सकता है, लेकिन अनुपालन अनिवार्य रहेगा।
महिला ड्राइवरों की कमी बन सकती है बड़ी चुनौती
सरकार के इस फैसले को लेकर इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स ने कुछ व्यावहारिक चुनौतियों की ओर भी इशारा किया है। कैब एग्रीगेटर प्लेटफॉर्म से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक, फिलहाल देश में कुल कैब ड्राइवरों में महिलाओं की हिस्सेदारी 5% से भी कम है।
ऐसे में सेम जेंडर ड्राइवर का विकल्प देना ऑन-डिमांड सर्विस की प्रकृति को प्रभावित कर सकता है। महिला ड्राइवरों की सीमित संख्या के कारण बुकिंग के समय वेटिंग टाइम बढ़ सकता है, खासकर लेट नाइट में जब डिमांड ज्यादा और ड्राइवरों की उपलब्धता कम होती है। फिलहाल उबर, ओला और रैपिडो ने इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है।
टिप का 100% पैसा जाएगा ड्राइवर को
नई गाइडलाइंस में टिपिंग सिस्टम को भी ज्यादा पारदर्शी बनाया गया है। अब यात्री अपनी इच्छा से ड्राइवर को टिप दे सकेंगे, लेकिन इसके लिए कुछ साफ नियम तय किए गए हैं।
- सफर के बाद ही टिप: टिप देने का विकल्प सिर्फ ट्रिप पूरी होने के बाद ही उपलब्ध होगा। बुकिंग के समय या सफर के दौरान यह ऑप्शन नहीं दिखेगा।
- कोई कटौती नहीं: यात्री जितनी भी टिप देगा, उसकी पूरी राशि ड्राइवर को मिलेगी। कंपनियां इसमें से कोई कमीशन नहीं काट सकेंगी।
- भ्रामक तरीके पर रोक: कंपनियां टिप के लिए किसी भी तरह के भ्रामक या दबाव बनाने वाले तरीके का इस्तेमाल नहीं कर सकेंगी, जो कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट के खिलाफ हो।
सेम जेंडर ड्राइवर और पारदर्शी टिपिंग जैसे बदलाव कैब इंडस्ट्री में एक नए युग की शुरुआत माने जा सकते हैं। जहां एक ओर इससे यात्रियों, खासकर महिलाओं की सुरक्षा और सुविधा बढ़ेगी, वहीं दूसरी ओर कंपनियों के लिए इसे प्रभावी ढंग से लागू करना एक बड़ी चुनौती भी होगी। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि राज्य सरकारें और कैब एग्रीगेटर्स इन नियमों को कितनी तेजी और गंभीरता से अपनाते हैं।
- डॉ. अनिमेष शर्मा
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