अल्कराज मियामी ओपन से बाहर:सेबेस्टियन कोर्डा ने हराया; हार के बीच हताश दिखे, बोले- अब और बर्दाश्त नहीं होता, मैं घर जा रहा हूं
मियामी ओपन में रविवार को बड़ा उलटफेर देखने को मिला। मौजूदा ऑस्ट्रेलियन ओपन चैंपियन कार्लोस अल्कराज टूर्नामेंट के तीसरे राउंड में हारकर बाहर हो गए हैं। उन्हें अमेरिका के सेबेस्टियन कोर्डा ने तीन सेटों के कड़े मुकाबले में 6-3, 5-7, 6-4 से मात दी। मैच 2 घंटे 19 मिनट चला। कार्लोस अल्काराज, जिन्होंने जनवरी में ऑस्ट्रेलियन ओपन जीतकर करियर ग्रैंड स्लैम पूरा किया, इस सीजन में अब तक 19 मैच खेल चुके हैं, जिनमें उन्होंने 17 जीत और 2 हार दर्ज की हैं। इंडियन वेल्स में भी उनका सफर सेमीफाइनल में समाप्त हुआ, जहां उन्हें डेनियल मेदवेदेव के खिलाफ हार का सामना करना पड़ा। यह लगातार दूसरा साल है जब अल्कराज को मियामी में शुरुआती दौर में ही बाहर होना पड़ा है। पिछले साल भी उन्हें दूसरे दौर में डेविड गोफिन ने हराकर चौंकाया था। मैच के दौरान अल्कराज का दिखा अलग रूप हार्ड रॉक स्टेडियम में खेले गए इस मैच में अल्कराज अपनी लय में नजर नहीं आए। मानसिक मजबूती के लिए पहचाने जाने वाले अल्कराज मैच के दौरान काफी हताश दिखे। पहले सेट में 3-6 से पिछड़ने और दूसरे सेट की शुरुआत में सर्विस टूटने के बाद उन्होंने अपने बॉक्स (कोचिंग टीम) की तरफ चिल्लाते हुए कहा,'अब मुझसे और बर्दाश्त नहीं होता। मैं घर जा रहा हूं... मैं अब और नहीं झेल सकता।' उनके इस व्यवहार ने फैंस को हैरान कर दिया, क्योंकि वे आमतौर पर मैदान पर शांत और मुस्कुराते हुए नजर आते हैं। कोर्डा ने निर्णायक सेट में दिखाया दम दूसरे सेट में एक समय कोर्डा 5-4 से आगे थे और मैच के लिए सर्व कर रहे थे। यहाँ अल्कराज ने वापसी की कोशिश की और लगातार पांच गेम जीतकर स्कोर बराबर कर दिया। हालांकि, इस दौरान भी उनके चेहरे पर वह चिर-परिचित चमक और जीत का जश्न गायब था। निर्णायक सेट (तीसरे सेट) में 25 साल के कोर्डा ने अपना संयम बनाए रखा और 2 घंटे 19 मिनट तक चले इस मुकाबले को 6-4 से अपने नाम कर लिया। रैंकिंग में 36वें नंबर के खिलाड़ी से हारे सेबेस्टियन कोर्डा फिलहाल एटीपी रैंकिंग में 36वें स्थान पर हैं। पिछले साल डेविड गोफिन (तब 55वीं रैंक) के बाद कोर्डा सबसे कम रैंकिंग वाले खिलाड़ी बन गए हैं जिन्होंने अल्कराज को इस टूर्नामेंट में हराया है। इस हार के साथ ही मियामी ओपन में अल्कराज का खराब रिकॉर्ड जारी रहा। अल्कराज बोले- अहम मौकों पर कोर्डा बेहतर रहे मैच के बाद अपनी हार स्वीकार करते हुए अल्कराज ने कहा,'जाहिर तौर पर यह एक कठिन मैच था। मुझे लगता है कि आज कोर्डा ने बेहतरीन खेल दिखाया। मैच में कई ऐसे मौके आए जहां स्कोर काफी करीबी था, लेकिन मैं उन मौकों का फायदा नहीं उठा सका। उन परिस्थितियों में कोर्डा मुझसे बेहतर साबित हुए। ------------------------------------- स्पोर्ट्स की यह खबर भी पढ़ें… आकाशदीप की जगह सौरभ दुबे KKR में शामिल हुए:अब तक IPL डेब्यू नहीं किया; हर्षित राणा के रिप्लेसमेंट पर फैसला बाकी IPL का 19वां सीजन 28 मार्च से शुरू हो रहा है। पहला मुकाबला डिफेंडिंग चैंपियन रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु और सनराइजर्स हैदराबाद के बीच बेंगलुरु के एम. चिन्नास्वामी स्टेडियम में खेला जाएगा। पूरी खबर
Shaheed Diwas 2026 | 'भारत माता के वीर सपूतों का बलिदान सदैव प्रेरित करेगा', PM Modi ने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को किया नमन
आज पूरा देश 'शहीद दिवस' के अवसर पर उन महान क्रांतिकारियों को याद कर रहा है, जिन्होंने भारत की आजादी के लिए हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शहीद भगत सिंह, सुखदेव थापर और शिवराम राजगुरु को उनकी पुण्यतिथि पर भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की और कहा कि राष्ट्र उनके साहस के आगे नतमस्तक है।
PM मोदी का संदेश: "अमिट है उनका बलिदान"
प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर राष्ट्र के नाम एक प्रेरक संदेश साझा किया। उन्होंने लिखा: "आज, हम भारत माता के वीर सपूतों - भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के चरणों में श्रद्धापूर्वक नमन करते हैं। राष्ट्र के लिए उनका बलिदान हमारी सामूहिक स्मृति में हमेशा के लिए अंकित है। कम उम्र में ही, उन्होंने असाधारण साहस और भारत की स्वतंत्रता के प्रति अटूट समर्पण दिखाया। न्याय और देशभक्ति के उनके आदर्श आज भी करोड़ों भारतीयों के मन में जोश भरते हैं।"
शहीद दिवस क्यों मनाया जाता है?
शहीद दिवस, जो हर साल 23 मार्च को मनाया जाता है, उस दिन की याद दिलाता है जब 1931 में अंग्रेजों द्वारा इन तीनों क्रांतिकारियों को फांसी दी गई थी। तब से, उनका बलिदान भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई का एक शक्तिशाली प्रतीक बन गया है। इस दिन को पूरे देश में श्रद्धांजलि सभाओं, कार्यक्रमों और आयोजनों के साथ याद किया जाता है, जो उनके योगदान का सम्मान करते हैं और उनकी विरासत को जीवित रखते हैं।
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उनकी सफलता के पीछे की कहानी
उनकी फांसी तक ले जाने वाली घटनाओं की शुरुआत 1928 में हुई, जब साइमन कमीशन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन भड़क उठे। लाहौर में ऐसे ही एक विरोध प्रदर्शन के दौरान, स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय पुलिस के लाठीचार्ज में घायल हो गए और बाद में उनका निधन हो गया। इस घटना ने भगत सिंह और उनके साथियों को गहरा आघात पहुँचाया। इसके जवाब में, उन्होंने इस हमले के लिए जिम्मेदार एक ब्रिटिश अधिकारी को निशाना बनाने की योजना बनाई। हालाँकि, गलती से उन्होंने एक दूसरे अधिकारी, जॉन सॉन्डर्स की हत्या कर दी।
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1929 में, भगत सिंह ने बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर, ब्रिटिश कानूनों के विरोध में दिल्ली स्थित केंद्रीय विधान सभा में एक प्रतीकात्मक बम धमाका भी किया था। इस कृत्य का उद्देश्य एक सशक्त संदेश देना था, न कि किसी को नुकसान पहुँचाना। 23 मार्च, 1931 को उन्हें राजगुरु और सुखदेव के साथ लाहौर जेल में फाँसी दे दी गई।
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