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अमेरिका-ईरान युद्ध के चलते महंगाई की चपेट में आ सकता है चीन: रिपोर्ट

नई दिल्ली, 21 मार्च (आईएएनएस)। अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण बढ़ती वैश्विक ऊर्जा कीमतों से चीन डिफ्लेशन (मंदी जैसी स्थिति) से तो बाहर निकल सकता है, लेकिन लागत-आधारित महंगाई की एक खतरनाक स्थिति में पहुंच सकता है। यूरोप स्थित मॉडर्न डिप्लोमेसी की रिपोर्ट में यह जानकारी सामने आई है।

इस रिपोर्ट के अनुसार, तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से चीन में उत्पादन लागत बढ़ रही है, जबकि घरेलू मांग अभी भी कमजोर बनी हुई है। ऐसे में कंपनियां कीमतें ज्यादा बढ़ा नहीं पा रही हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि ऊर्जा और कच्चे माल की बढ़ती लागत कंपनियों के मुनाफे को और कम करेगी। कंपनियां इन बढ़ी हुई लागतों को ग्राहकों पर डालने के बजाय खुद ही सहन करेंगी, जिससे वेतन और नई भर्तियों पर असर पड़ सकता है।

चीन का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पहले से ही कम मुनाफे पर काम कर रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, लगभग एक-चौथाई कंपनियां घाटे में चल रही हैं, जिसका कारण ज्यादा उत्पादन क्षमता और कड़ी प्रतिस्पर्धा है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि लोगों की आय की वृद्धि धीमी हो गई है और आधे से ज्यादा कर्मचारियों को पिछले साल वेतन वृद्धि नहीं मिली। कुछ को तो वेतन में कटौती भी झेलनी पड़ी। युवाओं में बेरोजगारी भी ज्यादा है और कई लोग सैकड़ों आवेदन देने के बावजूद नौकरी नहीं पा रहे हैं।

वेतन ठहरने से लोगों का खर्च भी घट रहा है, जिससे चीन में मांग कमजोर बनी हुई है और कंपनियों के लिए विकास के अवसर सीमित हो रहे हैं।

चीन की अर्थव्यवस्था काफी हद तक निर्यात पर निर्भर रही है, लेकिन ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी के कारण वैश्विक मांग कम होने से निर्यात पर भी असर पड़ सकता है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अगर तेल की कीमतें तेजी से बढ़ती हैं, तो इससे चीन की जीडीपी ग्रोथ पर भी असर पड़ेगा और इसमें गिरावट आ सकती है।

हालांकि, इलेक्ट्रिक वाहनों और नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश के कारण चीन को कुछ प्रतिस्पर्धात्मक फायदा मिल सकता है, लेकिन वैश्विक मांग में कमजोरी इन फायदों को कम कर सकती है।

मध्य पूर्व में जारी संघर्ष के कारण ऊर्जा आपूर्ति और व्यापार मार्गों में रुकावट भी चीन के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है।

रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है, अगर यह ऊर्जा संकट लंबे समय तक जारी रहा, तो चीन ऐसी स्थिति में फंस सकता है जहां न तो पूरी तरह डिफ्लेशन होगा और न ही स्वस्थ महंगाई, बल्कि धीमी ग्रोथ और बढ़ती लागत का लंबा दौर देखने को मिल सकता है।

--आईएएनएस

डीबीपी

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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नींद में ‘जेंडर गैप’! क्यों महिलाएं सोती हैं कम?

नई दिल्ली, 21 मार्च (आईएएनएस)। दुनियाभर में किए गए कई अध्ययनों से एक अहम और दिलचस्प तथ्य सामने आया है कि महिलाओं और पुरुषों की नींद में स्पष्ट अंतर है, जिसे जेंडर स्लीप गैप कहा जा रहा है। यह सिर्फ नींद की मात्रा का फर्क नहीं है, बल्कि उसकी गुणवत्ता और उससे जुड़े मानसिक प्रभावों का भी मामला है।

2017 के एक अध्ययन के अनुसार, 45 साल से कम उम्र की केवल 48 फीसदी माताएं ही रोजाना कम से कम 7 घंटे की नींद ले पाती हैं, जबकि बिना बच्चों वाली 62 फीसदी महिलाएं इतनी नींद लेती हैं। इससे यह साफ होता है कि मातृत्व महिलाओं की नींद पर गहरा असर डालता है।

इसी तरह 2025 में स्लीप साइकल की एक वैश्विक रिपोर्ट में पाया गया कि 57 फीसदी महिलाएं औसतन सामान्य मूड के साथ जागती हैं, जो पुरुषों के मुकाबले करीब तीन अंक कम है। यह अंतर भले ही छोटा लगे, लेकिन यह लगातार नींद की कमी और खराब गुणवत्ता की ओर इशारा करता है।

महिलाओं की नींद अक्सर बार-बार टूटती है और उन्हें गहरी नींद कम मिलती है, जिससे शरीर और दिमाग को पूरा आराम नहीं मिल पाता। इसके पीछे एक बड़ा कारण जीवन के अलग-अलग चरणों में होने वाले हार्मोनल बदलाव हैं, जैसे मासिक धर्म, गर्भावस्था और मेनोपॉज, जो नींद के पैटर्न को प्रभावित करते हैं। इसके साथ ही सामाजिक कारण भी उतने ही अहम हैं। परिवार और बच्चों की देखभाल, घर और काम के बीच संतुलन, और लगातार रहने वाला मानसिक दबाव महिलाओं की नींद को और कमजोर कर देता है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि महिलाओं का दिमाग दिनभर अधिक मल्टीटास्किंग और भावनात्मक प्रोसेसिंग करता है, जिसके कारण उन्हें रिकवरी के लिए पुरुषों की तुलना में ज्यादा नींद की जरूरत होती है। लेकिन जब यह जरूरत पूरी नहीं होती, तो इसका असर उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर साफ दिखाई देता है।

लगातार नींद की कमी से महिलाओं में थकान, चिड़चिड़ापन, तनाव, हार्मोनल असंतुलन और दिल तथा मेटाबॉलिक बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। ऐसे में “जेंडर स्लीप गैप” को समझना और इसे कम करने के लिए जागरूकता बढ़ाना बेहद जरूरी है, क्योंकि अच्छी नींद केवल आराम नहीं, बल्कि बेहतर स्वास्थ्य की बुनियाद है।

--आईएएनएस

केआर/

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