देश को 1947 में मिली आजादी भले ही बीते जमाने की बात लगती हो लेकिन आज भी अंग्रेजों की औपनिवेशिक मानसिकता का अहसास कराते कई सारे प्रतीक मौजूद हैं. इसी मानसिकता पर विजय पाने की दिशा में 24 फरवरी 2026 को एक बड़ा कदम उठाया गया। करीब 79 वर्षों तक राष्ट्रपति भवन में स्थापित रही ब्रिटिश वास्तुकार एडविन लुटियंस की मूर्ति हटा ली गई। इस मूर्ति के नीचे शिलालेख पर 'Edwin Lutyens, Architect of this House' अंकित था। अब इसे बुराड़ी के पास कोरोनेशन पार्क में रखा जाएगा। कोरोनेशन पार्क ब्रिटिश दौर की स्मृतियों का एक प्रकार का 'कब्रिस्तान' बन चुका है। आपको यहां किंग जॉर्ज पंचम, लॉर्ड हार्डिंग, लॉर्ड चेम्सफोर्ड, लॉर्ड विलिंगडन की मूर्तियां भी मिलेंगी। राष्ट्रपति भवन में लुटियंस की मूर्ति अप्रैल 1947 में लगाई गई थी। लॉर्ड माउंटबेटन ने भारत के वायसराय का पदभार 21 फरवरी 1947 को संभालने के तुरंत बाद वायसराय हाउस (अब राष्ट्रपति भवन) में एडविन लुटियंस की मूर्ति स्थापित करने का आदेश दिया था। दिल्ली को भारत की राजधानी बनाने के फैसले के बाद 1912 में ही एडविन लुटियंस यहां आ गए थे और 1930 तक यहीं रहे।
'राजाजी उत्सव' के अवसर पर लगी मूर्ति
'राजाजी उत्सव' के अवसर पर राष्ट्रपति भवन के सेंट्रल कोर्टयार्ड में सी. राजगोपालाचारी की मूर्ति स्थापित कर दी गई है। साथ ही, उनके जीवन पर एक प्रदर्शनी 24 फरवरी से 1 मार्च तक आयोजित भी की गई। यह कदम 'डेकोलोनाइजेशन' (औपनिवेशिक अवशेषों को हटाने) की दिशा में महत्वपूर्ण है। यह अजीब संयोग है कि लुटियंस 1917 के आसपास 10 हेस्टिंग्स रोड (अब राजाजी मार्ग) के बंगले में शिफ्ट हो गए थे। इसी बंगले में भारत के प्रथम गवर्नर जनरल सी. राजगोपालाचारी भी रहे। इसलिए इस बंगले के सामने वाली सड़क का नाम राजाजी मार्ग रखा गया।
कौन थे राजगोपालाचारी
ए राजा जी यानि सिर राजागोपालाचारी यानि चक्रवर्ती राजगोपालाचारी कई बातों के लिए याद किए जाते हैं वह ना सिर्फ आजाद भारत के पहले और आखिरी भारतीय गवर्नर जनरल थे के बल्कि वह एक बेहतरीन नेता जबरदस्त वकील शानदार लिखित और हिंदी के बेहतरीन कार्यकर्ता रहें। जीएपी राजगोपालाचारी का जन्म मद्रास के थोड़ा पहली गांव में हुआ था इनके पिता का नाम ललित चक्रवर्ती था 5 साल के होने पर इनका पूरा परिवार जो था वह असुर चलाकर इनकी प्राथमिक शिक्षा को सूखे सरकारी स्कूल में हुई। 1894 में बेंगलुरु के सेंट्रल कॉलेज से उन्होंने ग्रेजुएशन किया। फिर 1898 मद्रास कि प्रेसिडेंसी कॉलेज से कानून की पढ़ाई की। 1897 में इन्होंने शादी की।
राज गोपालचारी के राजनीति में आने की वजह है महात्मा गांधी
28 साल की उम्र में वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जोड़ते हैं। गांधी के छुआछूत आंदोलन और हिंदू मुसलमान एकता के कार्यक्रम से वह प्रभावित होते हैं। इसके बाद स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय होने पर राजगोपालाचारी जो है वह उनके अनुयाई बनते हैं। 1930 में जब गांधी जी ने दांडी मार्च किया तो कि इन्होंने नागपट्टनम के पानमक कानून भी तोड़ा। इसके लिए उन्हें जेल तक जाना पड़ा। मंदिर में जहां दलित समुदाय का जाना मना था इसका इन्होंने जमकर विरोध किया। इसी के फलस्वरूप मंदिरों में दलितों का प्रवेश संभव हो सका। गांधी के असहयोग आंदोलन का उन पर इतना शांत हुआ था कि उन्होंने अपनी जमीन जमाई वकालत तक छोड़ दी और खादी पहनने लगे उनकी वकालत इतनी जबरदस्त चल रही थी कि वह सेलम तमिलनाडु के जिला वहां कार खरीदने वाले पहले वकील बन गए थे। उधर महात्मा गांधी भी राजगोपालचारी से बहुत प्रभावित थे कि इतने प्रभावित थे कि उन्होंने अपना कांफ्रेंस की पर्यंक विवेक जागृत रखने वाला तक उन्हें कह दिया था। राजगोपालाचारी को उन्होंने ही राजा जी का उपनाम दिया था।
मद्रास प्रांत का प्रीमियर बनाया गया
1937 में कांग्रेस ने मद्रास यानि कि आज के तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश का अधिकांश इलाका तब मद्रास प्रांत का हिस्सा था उसकी उन्होंने जो है वह प्रोविंशियल असेंबली का चुनाव जीता। राजगोपालाचारी को मद्रास प्रांत का प्रीमियर यानी कि प्रधानमंत्री बना दिया गया। लेकिन उस दौर में जब उन्होंने मद्रास प्रांत में हिंदी को स्वीकार करने की कोशिश शुरू की तो हिंसक विरोध होने लगा। राजगोपालाचारी ने मशहूर तमिल पत्रिका सुदेश मित्र में छह मई 1937 को अपने लेख में लिख दिया कि जब हम हिंदी सीख लेंगे तभी दक्षिण भारत को सम्मान हासिल होगा। दक्षिण भारत हिंदी के प्रसार में उन्हें उस वक्त कोई कामयाबी नहीं मिली लेकिन वह हार नहीं माने प्रयास करते रहे वह लगे रहे वह दक्षिण में हिंदी को मुकाम नहीं दिला सके फिर भी प्रचार-प्रसार जमकर किया कामयाबी मिलती भी।
रिश्तेदारी में बदल गई गांधीजी से दोस्ती
राजाजी को महात्मा गांधी का खास माना जाता था। दोनों के बीच रिश्ते प्रगाढ़ थे, जिसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि गांधीजी को अक्सर जब भी किसी गंभीर मामले पर कोई सलाह लेनी होती थी तो उन्हें राजाजी ही याद आते थे। दोनों नेताओं के रिश्ते में आपसी भरोसा इतना बढ़ा कि राजाजी ने अपनी बेटी को गांधीजी के आश्रम में रहने के लिए भेज दिया। राजाजी की बेटी लक्ष्मी जब वर्धा के आश्रम में रह रही थीं, तभी उनके और गांधीजी के छोटे बेटे देवदास के बीच प्यार पनपने लगा। गांधीजी के बेटे देवदास की उम्र 28 साल की थी और लक्ष्मी 15 साल की थीं। दोनों की शादी हो गई. इस तरह राजाजी और गांधीजी समधी भी बन गए।
नेहरू से मतभेद
इसके बाद 1952 से 54 के दौर में एक बार फिर से राजगोपालाचार्य मद्रास प्रांत के मुख्यमंत्री बने। उस दौरान उन्होंने हिंदी को माध्यमिक स्तर की शिक्षा में अनिवार्य कराया। यह अलग बात है कि तमिलों के उग्र हिंदू विरोध के चलते यह प्रयास सिर्फ कागजों पर ही सीमित रह गया। उधर राजगोपालचारी ना सिर्फ नेहरु की आर्थिक नीतियों से नाराज होने लगे बल्कि उन्हें नेहरू और कांग्रेस की बदली बदली कार्यशैली भी नागवार गुजरने लगी। राजगोपालाचारी के नेहरू से गहरे मतभेद होते चले गए। नेहरू और कांग्रेस से मतभेद होने के कारण स्वतंत्रता प्राप्ति के समय कांग्रेस अध्यक्ष रह चुके आचार्य जेबी कृपलानी ने भी 1951 में कांग्रेस छोड़ा और अभी फिर वही सवाल राजगोपालाचारी उठाने लगे। 1957 में एक सेमिनार में भाग लेते हुए राजगोपालाचारी ने यहां तक कह दिया कि 62 साल पहले देश में शासन तंत्र के खिलाफ एक मजबूत विपक्ष की भूमिका निभाने के लिए कि पार्टी का गठन हुआ था और इसी तरह आज भी ऐसी ही एक पार्टी की जरूरत है। बिना विपक्ष के लोकतंत्र ऐसा ही होता है जैसे कि किसी गधे की पीठ पर एक ही तरफ कपड़ों का गठ्ठर लाद दिया जाए।स्वतंत्र पार्टी ने 1962 में अपना पहला लोकसभा चुनाव लड़ा और 18 सीटें जीती बिहार समेत कई राज्यों की विधानसभा में मुख्य विपक्षी पार्टी का उसे दर्जा भी हासिल हो गया क्योंकि लोगों का समर्थन उनके प्रति था। 1967 के चुनाव में कांग्रेस को 283 सीटें मिली थी जबकि दूसरे नंबर की पार्टी स्वतंत्र पार्टी को लोकसभा की 44 सीटें हासिल हुई थी।
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देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की तारीखें भले ही चुनाव आयोग ने घोषित कर दी हों, लेकिन इस समय सबसे ज्यादा चर्चा बिहार की राजनीति की ही हो रही है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा में जाने से पहले ही जनता के मन में मुख्यमंत्री पद को लेकर सवाल उठ रहे थे कि राज्य की बागडोर किसके हाथों में होगी। हालांकि नीतीश कुमार ने राज्यसभा चुनाव जीत लिया है, लेकिन भाजपा ने अभी तक मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार का नाम घोषित नहीं किया है। लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के एक बयान ने राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है।
दरअसल, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जमुई दौरे के दौरान ऐसा बयान दिया जिससे राजनीतिक माहौल गरमा गया। कार्यक्रम के दौरान उन्होंने उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, "अब ये सारा काम करेंगे।" नीतीश कुमार के इस बयान से कई राजनीतिक अर्थ निकाले जा रहे हैं। नीतीश के इस बयान के बाद यह अटकलें लगने लगी हैं कि क्या बिहार में नेतृत्व परिवर्तन को लेकर कोई बड़ा संकेत दिया गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नीतीश कुमार का यह बयान सामान्य नहीं है।
इसे भविष्य की राजनीति और जिम्मेदारियों के बंटवारे का संकेत माना जा रहा है। कुछ विशेषज्ञ इसे सम्राट चौधरी की बढ़ती भूमिका के रूप में देख रहे हैं, जबकि कुछ इसे सत्ता में संभावित बदलाव की ओर इशारा कर रहे हैं। यह उल्लेखनीय है कि नीतीश कुमार वास्तव में मधेपुरा, किशनगंज, कटिहार, बेगूसराय सहित विभिन्न जिलों में बार-बार सम्राट चौधरी को मंच पर लाते हैं और लोगों से अपील करते हैं कि जिस तरह उन्होंने हमारा साथ दिया है, उसी तरह उनकी भी मदद करें। इतना ही नहीं, सहरसा में नीतीश कुमार ने यहां तक कह दिया कि अब इन लोगों को सब कुछ देखना होगा।
हालांकि, बिहार में सत्ता में बदलाव का पूरा फॉर्मूला सामने नहीं आया है। किस पार्टी का मुख्यमंत्री बनेगा, इसको लेकर भी फिलहाल कोई चर्चा नहीं हो रही है। भाजपा ने भी अभी तक कोई नाम आगे नहीं किया है। क्या भाजपा सम्राट चौधरी को भी राज्य की कमान सौंपने जा रही है, यह भी साफ नहीं हो पाया है। भागलपुर में नीतीश कुमार की सभा के बारे में बात करते हुए, भाषण के बाद नीतीश कुमार ने मंच से कहा, "ठीक है, रुकिए, इन्हें भी बुला लेते हैं।" यह कहते ही नीतीश कुमार सम्राट चौधरी के पास पहुँचे और मुस्कुराते हुए उनका हाथ पकड़कर उन्हें आगे ले गए। यहाँ सम्राट चौधरी मंच से हाथ जोड़कर जनता का अभिवादन करते हैं, जबकि अन्य नेता हाथ उठाकर जनता को संबोधित करते हैं।
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