अफगानिस्तान से जंग लड़ते-लड़ते पाकिस्तान की हालत पतली हो गई है। पाकिस्तान की हालत पतली होने के पीछे की एक सबसे बड़ी वजह है मिडिल ईस्ट में युद्ध। लेकिन इन सबके बीच रूस ने पाकिस्तान को एक बड़ा ऑफर दे दिया है। लेकिन ऑफर के साथ एक ऐसी शर्त रख दी है कि शाहबाज शरीफ की बात गले-गले में आकर फंस गई है। ईरान जंग के बीच रूस अपना तेल बेचकर खूब मुनाफा कमा रहा है। वैश्विक तेल सप्लाई बनाए रखने के लिए अमेरिका ने रूसी तेल पर लगे प्रतिबंधों में अस्थाई छूट दे दी है। जिसके बाद दुनिया भर के देश रूसी तेल खरीद रहे हैं। मध्य पूर्व में तेल सप्लाई में आई रुकावट की वजह से रूसी तेल की कीमतें बहुत बढ़ गई हैं। भारत भी रिकॉर्ड कीमत पर रूसी तेल खरीद रहा है। इस बीच खबर है कि रूस ने पाकिस्तान को सस्ता कच्चा तेल ऑफर किया है। लेकिन इसके साथ एक शर्त रख दी है।
पाकिस्तान में रूस के राजदूत अल्बर्ट खुरेव ने कहा है कि रूस पाकिस्तान को रियायती दरों पर तेल सप्लाई करने के लिए तैयार है और उन्होंने इस मौके पर फायदा उठाने की अपील की है। इस्लामाबाद में एक प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित करते हुए खोरोव ने पाकिस्तान को यह ऑफर दिया। साथ ही शर्त रख दी कि अगर पाकिस्तान औपचारिक तौर पर रूस से संपर्क करता है तो रूस पाकिस्तान को सस्ता तेल बेच सकता है। हालांकि रूसी राजदूत ने यह भी साफ किया कि इस संबंध में अभी तक कोई औपचारिक संपर्क नहीं किया गया। रूसी राजदूत ने जोर देते हुए कहा कि ऊर्जा क्षेत्र दोनों देशों के द्विपक्षीय सहयोग का सबसे अहम स्तंभ बना हुआ है और इस इलाके में किसी भी प्रगति के लिए शुरुआत पाकिस्तान को ही करनी होगी। दुनिया की कई अर्थव्यवस्थाओं की तरह पाकिस्तान भी तेल और गैस की बढ़ती कीमतों से जूझ रहा है।
ईरान ने अमेरिका और इजराइली हमलों के जवाब में वैश्विक तेल परिवहन के लिए अहम समुद्री रास्ते होम स्टेट को बंद कर दिया है। इस वजह से आर्थिक बदहाली झेल रहे पाकिस्तान की हालत और खराब हो गई है। पाकिस्तान ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में करीब 20% की भारी बढ़ोतरी कर दी है। इन सबके बीच अब रूस ने पाकिस्तान की तरफ ऑफर दिया है। पाकिस्तान को रियायती दरों यानी डिस्काउंट पर कच्चा तेल देने के लिए रूस पूरी तरह तैयार है। हालांकि इस सस्ते तेल के पीछे रूस ने एक छोटी लेकिन बेहद महत्वपूर्ण शर्त रख दी। रूस का कहना है अगर पाकिस्तान को तेल चाहिए तो उसे खुद आगे बढ़कर औपचारिक तौर पर संपर्क करना होगा। यानी अब पूरी जिम्मेदारी पाकिस्तान की है कि वो इस मौके को भुनाता है या नहीं। पाकिस्तान ऊर्जा जरूरतों के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर है। लेकिन अब उसे विकल्प के रूप में भारत का दोस्त रूस ही दिखाई दे रहा है।
पाकिस्तान के पूर्व राजनयिक और भारत में उच्चायुक्त रह चुके अब्दुल बासिद कहते हैं कि पाकिस्तान ऊर्जा संकट से निपटने के लिए रूस पर भरोसा कर सकता है। हालांकि पाकिस्तान ने अमेरिकी टेरिफ के डर से रूस से चंद बैरल तेल खरीदने के बाद इसे बंद कर दिया था। पाकिस्तान 2023 से रूस से कच्चा तेल आयात कर रहा है। हालांकि इसकी मात्रा बहुत कम है। पाकिस्तान का कहना है कि वह अपनी ऊर्जा स्त्रोतों में विविधता के लिए रूस से तेल खरीद रहा है। दरअसल पाकिस्तान रूसी कच्चे तेल के लिए पेमेंट चीनी युवान में कर रहा है। इन सबके बीच पाकिस्तान में ऊर्जा संकट चरम पर है। देश के पेट्रोल पंप ड्राई होने के हालात में हैं। लोग डीजल और पेट्रोल के लिए आपस में मारामारी कर रहे हैं।
Continue reading on the app
मिडिल ईस्ट में चल रहे ईरान और इजरायल के युद्ध के बीच एक ऐसी आहट, एक ऐसी सैन्य हलचल सामने आई है जिसने पूरी दुनिया के रक्षा विशेषज्ञों को हैरान कर दिया है। अमेरिकी नौसेना के सबसे आधुनिक माइंड काउंटर मेजर जहाजों में से दो यूएसएस तुलसा और यूएसएस सा बरबरा अचानक अपने बेस बहरीन से 3500 मील दूर मलेशिया के पेनांग में देखे गए हैं। यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब हुर्म जलडमरू मध्य में समुद्री बारूदी सुरंगों का खतरा चरम पर है। इन जहाजों का प्राथमिक काम ही समुद्र से बारूदी सुरंगों को खोजकर नष्ट करना है ताकि तेल के टैंकरों और मालवाहक जहाज सुरक्षित निकल सके। ऐसे में इनका युद्ध क्षेत्र से इतनी दूर जाना अमेरिका की सैन्य रणनीति और सुरक्षा चिंताओं पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है। रक्षा गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि अमेरिका ने इन कीमती जहाजों को ईरान की जवाबी कार्रवाही से बचने के लिए जानबूझकर एक क्षेत्र से बाहर निकाला है।
फरवरी 2026 के अंत में ईरान और अमेरिका के बीच शुरू हुई प्रत्यक्ष सैन्य झड़पों के बाद बहरीन स्थित अमेरिकी फिफ्थ फ्लट का मुख्यालय ईरान की बैलेस्टिक मिसाइलों और कामिकाजे ड्रस की सीधी रेंज में आ गया। विशेषज्ञों का तर्क है कि इंडिपेंडेंस क्लास के यह जहाज एलुमिनियम से बने हैं। हालांकि ये तकनीक में बेजोड़ हैं, लेकिन संरचनात्मक रूप से यह पुराने लकड़ी के माइन वेपर्स की तुलना में अधिक नाजुक हैं। अगर ईरान अपनी एंटीशिप मिसाइलों या विस्फोटक नावों से इन पर हमला करता है, तो इनके डूबने या भारी नुकसान पहुंचने का खतरा बहुत ज्यादा है। अमेरिका संभवत अपने इन महंगे युद्धपोतों को सॉफ्ट टारगेट बनने से बचाना चाहता है। अमेरिका की रणनीतिक चूक या सोची समझी चाल। यूएसएस टुलसा और यूएसएस सा बरवरा को मलेशिया के नॉर्थ बटरवर्थ कंटेनर टर्मिनल पर खड़ा देखा जाना यह संकेत है कि अमेरिका फिलहाल मिडिल ईस्ट के समुद्री रास्तों की सुरक्षा को लेकर बैकफुट पर है। हुरमुस की खारी दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति की जीवन रेखा है। यहां से वैश्विक तेल का करीब 20% हिस्सा गुजरता है।
अगर ईरान ने इस संगीन समुद्री रास्ते में माइंस बिछा दी तो उन्हें हटाने की जिम्मेदारी इन्हीं जहाजों की थी। इनकी गैर मौजूदगी होने से अब तेल के टैंकरों और अन्य व्यापारिक जहाजों के लिए खतरा दोगुना हो गया है। हालांकि अमेरिकी नौसेना ने इसे केवल एक लॉजिस्टिक स्टॉप बताया है लेकिन 3500 मील की यह दूरी महज रसद आपूर्ति के तर्क से मेल नहीं खाती। एक अन्य पहलू यह भी है कि अमेरिका अपनी सैन्य शक्ति का केंद्र धीरे-धीरे मिडिल ईस्ट से हटाकर इंडोपेसिफिक की ओर स्थानांतरित कर रहा है। ट्रांसफर कर रहा है। चीन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए इन जहाजों की मलेशिया में मौजूदगी को एक नए सैन्य तालमेल के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन सवाल वही है कि क्या इस बदलाव की कीमत मिडिल ईस्ट में असुरक्षित होते समुद्री मार्ग होंगे। वर्तमान में मिडिल ईस्ट में केवल एक माइन हंटर जहाज यूएस कैनबरा तैनात बताया जा रहा है। अकेले एक जहाज के भरोसे दुनिया के सबसे खतरनाक समुद्री रास्ते को सुरक्षित रखना असंभव है।
इस घटना ने सहयोगी देशों, विशेष तौर पर खाड़ी देशों और इसराइल के बीच भी चिंता पैदा कर दी है जो समुद्र में अमेरिकी सुरक्षा कवच पर निर्भर है। आने वाले दिनों में यह देखना होगा कि क्या अमेरिका इन जहाजों को वापस मिडिल ईस्ट भेजता है या जापान में तैनात अपने अन्य माइनपर्स को इस कमी को पूरा करने के लिए बुलाता है। फिलहाल मलेशिया के तट पर खड़े यह जहाज वाशिंगटन की डिफेंसिव मोड़ यानी रक्षात्मक मुद्रा की गवाही दे रहे हैं। अमेरिका आपका वफादार नहीं है और इजराइल आपका दुश्मन है। यह कभी आपके अपने नहीं होंगे। यह लोग सिर्फ एक दूसरे के इंटरेस्ट में काम करेंगे। अब मुसलमानों को तय करना होगा कि मुस्तकबिल या भविष्य क्या हो। यह बातें कहते हुए ईरान की सुप्रीम सिक्योरिटी काउंसिल के चीफ अली लारीजानी ने दुनिया भर के अरब और मुस्लिम बहुल देशों को झकझोरा है।
Continue reading on the app