चीन-मध्य एशिया प्रकाशन केंद्र स्थापित
बीजिंग, 17 मार्च (आईएएनएस)। चीन-मध्य एशिया प्रकाशन केंद्र 16 मार्च को कजाकिस्तान के फराबी राष्ट्रीय विश्वविद्यालय में स्थापित हुआ।
बताया जाता है कि चीन के शीआन च्याओथोंग विश्वविद्यालय के प्रकाशन गृह और फराबी राष्ट्रीय विश्वविद्यालय ने चीन-मध्य एशिया प्रकाशन केंद्र का निर्माण किया। भविष्य में यह केंद्र दोनों पक्ष शिक्षा प्रकाशन में सहयोग, चीन व मध्य एशिया के शास्त्रीय कृतियों के अनुवाद, डिजिटल प्रकाशन प्लेटफॉर्म के निर्माण, कॉपीराइट सहयोग व प्रकाशन सेवा, शैक्षणिक आदान-प्रदान और प्रतिभा संवर्धन में कार्य करेगा।
अल्माटी स्थित चीनी महावाणिज्यदूत सू फांग छ्यो ने अनावरण समारोह में कहा कि सांस्कृतिक सहयोग चीन और कजाकिस्तान के बीच आदान-प्रदान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इससे दोनों देशों के लोगों के बीच विश्वास और मित्रता मजबूत हुई। विश्वास है कि प्रकाशन केंद्र चीन और मध्य एशियाई देशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान और सभ्यताओं के बीच आपसी सीख को बढ़ावा देगा।
वहीं, फराबी राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के संचालक तुइमेबाएव ने कहा कि प्रकाशन केंद्र पुस्तक, ज्ञान और विज्ञान के जरिए चीन और मध्य एशियाई देशों के लोगों के बीच दूरी कम करता है। यह रेशम मार्ग जारी करने का पुल बनेगा।
(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)
--आईएएनएस
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West Bengal Elections 2026: ममता बनर्जी की ‘सियासी सर्जिकल स्ट्राइक’, 74 विधायकों के काट दिए नाम
West Bengal Elections 2026: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से पहले तृणमूल कांग्रेस (TMC) की पहली उम्मीदवार सूची ने राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक बड़ा और चौंकाने वाला फैसला लेते हुए 74 मौजूदा विधायकों के टिकट काट दिए. इस कदम को पार्टी के भीतर अब तक की सबसे बड़ी ‘सियासी सर्जिकल स्ट्राइक’ माना जा रहा है.
74 विधायकों के टिकट कटने से बड़ा संदेश
इस सूची ने साफ कर दिया कि TMC अब किसी भी तरह की एंटी-इंकंबेंसी या खराब छवि का जोखिम नहीं लेना चाहती. जिन नेताओं पर जनता से दूरी, गुटबाजी या विवादों के आरोप थे, उन्हें सीधे बाहर का रास्ता दिखा दिया गया.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम चुनाव से पहले पार्टी की छवि सुधारने और जनता के बीच विश्वास मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा है.
दागी नेताओं पर सख्त कार्रवाई
पिछले कुछ वर्षों में पश्चिम बंगाल की राजनीति में भ्रष्टाचार के आरोपों ने TMC को घेरा था. खासकर शिक्षक भर्ती घोटाले जैसे मामलों ने पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचाया. इसी को ध्यान में रखते हुए ममता ने पार्थ चटर्जी, माणिक भट्टाचार्य और जीवनकृष्ण साहा जैसे बड़े नामों से दूरी बना ली. इन नेताओं का टिकट काटकर यह साफ संदेश दिया गया कि अब ‘दागी छवि’ वाले नेताओं के लिए पार्टी में जगह नहीं है.
स्टार पावर से ज्यादा क्लीन इमेज पर फोकस
TMC हमेशा से टॉलीवुड सितारों को टिकट देने के लिए जानी जाती रही है, लेकिन इस बार रणनीति पूरी तरह बदली नजर आई. कांचन मल्लिक और चिरंजीत चक्रवर्ती जैसे चर्चित चेहरों को भी टिकट नहीं मिला. यह संकेत है कि पार्टी अब सिर्फ लोकप्रियता नहीं, बल्कि साफ छवि और ग्राउंड कनेक्ट को प्राथमिकता दे रही है.
पुराने क्षत्रपों का कद घटा
टिकट कटने वालों में कई ऐसे नेता शामिल हैं जो लंबे समय से अपने-अपने क्षेत्रों में मजबूत पकड़ रखते थे. तपन दासगुप्ता, ज्योत्सना मंडी, तजमूल हुसैन और परेश पाल जैसे नेताओं को बाहर का रास्ता दिखाकर पार्टी ने यह संकेत दिया है कि अब ‘स्थानीय दबदबे’ से ज्यादा ‘जनता का भरोसा’ अहम है.
यह कदम टीएमसी के भीतर एक बड़े जेनरेशन शिफ्ट की ओर भी इशारा करता है, जहां नए चेहरों को मौका दिया जा रहा है.
रणनीतिक बदलाव: 15 सीटों पर फेरबदल
टीएमसी ने केवल टिकट काटने तक ही खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि 15 विधायकों की सीटें भी बदल दीं. यह रणनीति एंटी-इंकंबेंसी को कम करने और स्थानीय समीकरणों को साधने के लिए अपनाई गई है. साथ ही, 135 विधायकों को उनकी पुरानी सीटों से ही चुनाव लड़ने का मौका दिया गया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि पार्टी ने प्रदर्शन के आधार पर ही फैसले लिए हैं.
‘करो या घर बैठो’ का संदेश
पूरी सूची का सबसे बड़ा संदेश यही है या तो जनता के बीच काम करो और साफ छवि बनाए रखो, या फिर राजनीति से बाहर हो जाओ. ममता बनर्जी ने इस फैसले के जरिए यह दिखा दिया है कि वे चुनाव जीतने के लिए बड़े से बड़े फैसले लेने से पीछे नहीं हटतीं.
कुल मिलाकर, TMC की यह रणनीति आगामी चुनाव में पार्टी की स्थिति को मजबूत करने की कोशिश है, लेकिन यह भी तय है कि इससे पार्टी के अंदर असंतोष और बगावत का खतरा भी बढ़ सकता है.
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