केरल विधानसभा चुनाव के लिए बिगुल फूँकते हुए भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने सोमवार को 47 उम्मीदवारों की अपनी पहली सूची जारी कर दी है। इस लिस्ट की सबसे बड़ी विशेषता ईसाई (Christian) मतदाताओं को साधने की पार्टी की सोची-समझी रणनीति है। भाजपा ने राज्य के 'ईसाई गढ़' माने जाने वाले निर्वाचन क्षेत्रों में चार प्रमुख क्रिश्चियन चेहरों को मैदान में उतारा है, ताकि दशकों से जारी एलडीएफ (LDF) और यूडीएफ (UDF) के दबदबे को चुनौती दी जा सके।
ये हैं BJP के 4 'क्रिश्चियन वॉरियर'
पार्टी ने मध्य केरल (Central Kerala) की महत्वपूर्ण सीटों पर इन चेहरों पर दांव लगाया है:-
जॉर्ज कुरियन (कंजिरापल्ली): वर्तमान केंद्रीय राज्य मंत्री जॉर्ज कुरियन कोट्टायम जिले की कंजिरापल्ली सीट से चुनाव लड़ेंगे। ईसाई-बहुल इस क्षेत्र में कुरियन की पकड़ भाजपा के लिए 'गेमचेंजर' साबित हो सकती है।
पीसी जॉर्ज (पूंजर): सात बार के विधायक और दिग्गज नेता पीसी जॉर्ज अपनी पारंपरिक सीट पूंजर से ताल ठोकेंगे। 33 वर्षों तक इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले जॉर्ज का अनुभव भाजपा के लिए बेहद अहम है।
शोन जॉर्ज (पाला): युवा नेता और पीसी जॉर्ज के बेटे शोन जॉर्ज को पाला निर्वाचन क्षेत्र से टिकट दिया गया है। जिला पंचायत सदस्य और वकील शोन को पार्टी के भविष्य के चेहरे के रूप में देखा जा रहा है।
अनूप एंटनी जोसेफ (तिरुवल्ला): भाजपा के प्रदेश महासचिव अनूप एंटनी जोसेफ पठानमथिट्टा के तिरुवल्ला से चुनाव लड़ेंगे। यह क्षेत्र ईसाइयों का मजबूत गढ़ माना जाता है।
दिग्गजों की फौज: चंद्रशेखर और मुरलीधरन भी मैदान में
भाजपा ने केवल ईसाई चेहरों ही नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय कद के नेताओं को भी चुनावी दंगल में उतार दिया है: राजीव चंद्रशेखर: पूर्व केंद्रीय मंत्री तिरुवनंतपुरम की हाई-प्रोफाइल नेमोम सीट से चुनाव लड़ेंगे। वी. मुरलीधरन: पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री को कझाक्कुट्टम सीट की जिम्मेदारी दी गई है। अन्य नाम: शोभा सुरेंद्रन, के. सुरेंद्रन, पद्मजा वेणुगोपाल, और फिल्म निर्माता मेजर रवि जैसे नाम भी इस 47 सदस्यीय सूची का हिस्सा हैं। इसके अलावा, पूर्व DGP आर. श्रीलेखा की उम्मीदवारी ने भी सबका ध्यान खींचा है।
चंद्रशेखर नेमोम विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ेंगे, जबकि मुरलीधरन को कझाकूटम से मैदान में उतारा गया है; ये दोनों ही तिरुवनंतपुरम जिले के प्रमुख निर्वाचन क्षेत्र हैं। BJP ने पूर्व विधायक K अजित को भी वैकोम निर्वाचन क्षेत्र से मैदान में उतारा है, जो हाल ही में CPI छोड़कर पार्टी में शामिल हुए थे। केरल में विधानसभा चुनाव 9 अप्रैल को एक ही चरण में होंगे, जबकि वोटों की गिनती 4 मई को होनी तय है।
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अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में सोमवार रात जो हुआ, उसने पूरी दुनिया को झकझोर दिया है। एक नशा मुक्ति अस्पताल पर हुए भयानक हवाई हमले ने मानवता को शर्मसार कर दिया है। अफगानिस्तान ने इस हमले के लिए सीधे पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराया है, जबकि पाकिस्तान इस आरोप को सिरे से खारिज कर रहा है। लेकिन जमीन पर बिखरी लाशें और जलते हुए ढांचे कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं।
अफगान सरकार के उप प्रवक्ता हमदुल्लाह फितरत के अनुसार यह हमला स्थानीय समयानुसार रात करीब नौ बजे काबुल स्थित उमर नशा मुक्ति उपचार अस्पताल पर हुआ। यह अस्पताल दो हजार बिस्तरों की क्षमता वाला एक बड़ा केंद्र था, जहां सैकड़ों मरीज इलाज करा रहे थे। इस हमले में अब तक लगभग चार सौ लोगों की मौत की खबर है, जबकि करीब ढाई सौ लोग घायल बताए जा रहे हैं। अस्पताल का बड़ा हिस्सा पूरी तरह तबाह हो चुका है और आग की लपटों ने पूरे परिसर को निगल लिया।
हमदुल्लाह फितरत ने इस भयावह घटना के बारे में कहा कि “उम्मीद का अस्पताल सपनों का कत्लखाना बन गया” बन गया। हम आपको बता दें कि सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो में धुएं के विशाल गुबार और मलबे के बीच जिंदा लोगों की तलाश में जुटे बचाव दल दिखाई दे रहे हैं। यह दृश्य किसी युद्ध क्षेत्र से कम नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी त्रासदी है जिसने चिकित्सा और मानवता के मूल सिद्धांतों को रौंद दिया है।
दूसरी ओर पाकिस्तान ने इन आरोपों को बेबुनियाद बताते हुए कहा है कि उसके हमले केवल सैन्य ठिकानों और आतंकी ढांचे पर केंद्रित थे। पाकिस्तान के सूचना मंत्री ने दावा किया कि यह “सटीक हवाई कार्रवाई” थी, जिसका उद्देश्य केवल उन ठिकानों को नष्ट करना था जहां से पाकिस्तान के खिलाफ हमलों की योजना बनाई जा रही थी। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के प्रवक्ता ने भी स्पष्ट कहा कि काबुल में किसी अस्पताल को निशाना नहीं बनाया गया।
इस बीच सुरक्षा सूत्रों के अनुसार इस कार्रवाई को “गजब लिल हक” नामक अभियान के तहत अंजाम दिया गया। हम आपको याद दिला दें कि यह अभियान फरवरी के अंत में शुरू हुआ था, जब पाकिस्तान ने सीमा पार से हो रही गोलीबारी और हमलों का जवाब देने का फैसला किया था। इसके बाद से दोनों देशों के बीच संघर्ष लगातार तेज होता गया है।
देखा जाये तो यह टकराव अचानक नहीं हुआ। इसकी जड़ें काफी गहरी हैं। पाकिस्तान लंबे समय से अफगानिस्तान पर आरोप लगाता रहा है कि वह पाकिस्तान विरोधी आतंकी समूहों को पनाह दे रहा है। खासकर पाकिस्तान तालिबान और बलूच अलगाववादी समूहों को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव बना हुआ है। हालांकि अफगानिस्तान इन आरोपों को लगातार खारिज करता रहा है।
स्थिति तब और विस्फोटक हो गई जब पाकिस्तान के राष्ट्रपति ने आरोप लगाया कि अफगान प्रशासन ने ड्रोन हमले कर पाकिस्तान में नागरिकों को घायल किया, जिसे उन्होंने “लाल रेखा” पार करना बताया। इसके बाद दोनों देशों के बीच जवाबी हमलों का सिलसिला शुरू हो गया, जिसने अब खुली जंग का रूप ले लिया है। हम आपको यह भी बता दें कि पाकिस्तान ने खुद को अफगानिस्तान के साथ “खुली जंग” की स्थिति में बताया है। यह बयान बेहद गंभीर है, क्योंकि पाकिस्तान एक परमाणु शक्ति संपन्न देश है। वहीं अफगानिस्तान की तालिबान सरकार भी पीछे हटने के मूड में नहीं दिख रही। उनके प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने इस हमले को मानवता के खिलाफ अपराध बताया और कहा कि यह अंतरराष्ट्रीय नियमों का खुला उल्लंघन है।
उधर, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चिंता बढ़ती जा रही है। चीन ने दोनों देशों के बीच मध्यस्थता की कोशिश और तत्काल युद्धविराम की अपील की है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने भी आतंकवादी गतिविधियों की निंदा करते हुए अफगानिस्तान में अपने मिशन को तीन महीने के लिए बढ़ा दिया है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि दोनों पक्ष किसी भी तरह पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।
इस घटनाक्रम के सामरिक निहितार्थ पर गौर करें तो सामने आता है कि यह संघर्ष केवल दो देशों के बीच की लड़ाई नहीं है, बल्कि इसके दूरगामी और बेहद खतरनाक सामरिक परिणाम हो सकते हैं। सबसे बड़ा खतरा यह है कि इस क्षेत्र में पहले से सक्रिय चरमपंथी संगठन इस स्थिति का फायदा उठा सकते हैं। अगर पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच पूर्ण युद्ध छिड़ता है, तो यह पूरा इलाका अस्थिरता का केंद्र बन सकता है।
दोनों देशों के बीच लगभग दो हजार छह सौ किलोमीटर लंबी सीमा है, जो बेहद संवेदनशील और छिद्रयुक्त मानी जाती है। इस क्षेत्र में लंबे समय से आतंकी गतिविधियां होती रही हैं। युद्ध की स्थिति में यह इलाका पूरी तरह नियंत्रण से बाहर जा सकता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा को गंभीर खतरा पैदा होगा। इसके अलावा पाकिस्तान में रह रहे लाखों अफगान शरणार्थियों की स्थिति भी संकटपूर्ण हो सकती है। यदि संघर्ष लंबा खिंचता है, तो यह दक्षिण एशिया की स्थिरता को भी हिला सकता है और वैश्विक शक्तियों की सीधी दखलअंदाजी की संभावना बढ़ सकती है।
फिलहाल काबुल के उस अस्पताल के मलबे से लाशें निकाली जा रही हैं, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह केवल एक हमला था या आने वाले बड़े युद्ध की भयावह शुरुआत। दुनिया की निगाहें अब इस बारूद के ढेर पर टिकी हैं, जहां एक चिंगारी पूरे क्षेत्र को आग में झोंक सकती है। हालात जिस दिशा में बढ़ रहे हैं, वह बेहद खतरनाक संकेत दे रहे हैं। तालिबान का इतिहास बताता है कि वह अपने खिलाफ हर वार का जवाब कई गुना ज्यादा ताकत और क्रूरता से देता है। ऐसे में आने वाले दिनों में बदले की आग और भी भयावह रूप ले सकती है, जो पूरे क्षेत्र को गहरे संकट में धकेल देगी।
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