पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच भारत में एलपीजी संकट की स्थिति ने देशभर में आम लोगों से लेकर उद्योगों तक को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। हालांकि सरकार द्वारा घबराहट में की जा रही बुकिंग को रोकने के लिए चलाए गए अभियान का असर अब दिखने लगा है, लेकिन गैस आपूर्ति को लेकर चिंता अभी भी बनी हुई है।
पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार, हाल के दिनों में एलपीजी सिलिंडर की घबराहट में की जा रही बुकिंग में कमी आई है। शुक्रवार को जहां घरेलू एलपीजी की बुकिंग करीब अठासी लाख अस्सी हजार तक पहुंच गई थी, वहीं शनिवार को यह घटकर लगभग सतहत्तर लाख रह गई। सरकार का कहना है कि लोगों से अनावश्यक बुकिंग नहीं करने की अपील का सकारात्मक असर दिखाई दे रहा है।
इसी के साथ ऑनलाइन बुकिंग में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। पहले जहां लगभग चौरासी प्रतिशत बुकिंग ऑनलाइन हो रही थी, वहीं अब यह बढ़कर करीब सत्तासी प्रतिशत हो गई है। हम आपको बता दें कि पिछले कुछ दिनों में अत्यधिक कॉल आने के कारण बुकिंग व्यवस्था प्रभावित हो गई थी और कई उपभोक्ताओं को गैस एजेंसियों के बाहर लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ा था। हालांकि मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि देश में किसी भी गैस वितरक के पास पूरी तरह गैस खत्म होने की स्थिति सामने नहीं आई है और नियमित आपूर्ति बनाए रखने के लिए व्यवस्था की जा रही है।
हम आपको बता दें कि एलपीजी की सीमित उपलब्धता को देखते हुए सरकार ने एक बड़ा कदम उठाते हुए उन उपभोक्ताओं पर सख्ती की है जिनके पास पाइप गैस और एलपीजी दोनों कनेक्शन हैं। सरकार ने ऐसे उपभोक्ताओं को अपना एलपीजी कनेक्शन सरेंडर करने का निर्देश दिया है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि जिन घरों में पाइप गैस उपलब्ध है उन्हें अब सार्वजनिक तेल कंपनियों से घरेलू एलपीजी सिलिंडर नहीं दिया जाएगा। यह निर्णय आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत अधिसूचना जारी कर लागू किया गया है। सरकार का मानना है कि इससे घरेलू एलपीजी की उपलब्धता उन परिवारों तक सुनिश्चित की जा सकेगी जिन्हें वास्तव में इसकी जरूरत है।
इस बीच, सभी घरेलू एलपीजी उपभोक्ताओं के लिए आधार आधारित जैविक सत्यापन यानी ई-केवाईसी भी अनिवार्य कर दिया गया है। उपभोक्ता अपने तेल विपणन कंपनी के मोबाइल एप और आधार एप के माध्यम से घर बैठे यह प्रक्रिया पूरी कर सकते हैं। जरूरत पड़ने पर उपभोक्ता अपने गैस वितरक से भी संपर्क कर सकते हैं।
उधर, एलपीजी संकट का असर केवल घरों तक सीमित नहीं है बल्कि होटल, भोजनालय और उद्योग भी इससे बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। सरकार ने व्यावसायिक सिलिंडर की आपूर्ति को घटाकर केवल बीस प्रतिशत कर दिया है। इसके कारण कई शहरों में होटल और रेस्तरां को संचालन में कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है। कई बड़े होटल और रेस्तरां अब लकड़ी का उपयोग कर खाना बना रहे हैं, जबकि छोटे भोजनालयों के लिए ऐसा करना संभव नहीं है। कई जगह मेन्यू में से व्यंजनों की सूची घटा दी गई है और कम समय में बनने वाले व्यंजन पर जोर दिया जा रहा है।
उधर, विजयवाड़ा में गैस की कमी के कारण होटल और छोटे भोजनालयों ने खाने की कीमतें बढ़ा दी हैं क्योंकि उन्हें ब्लैक मार्केट से महंगे दाम पर सिलिंडर खरीदने पड़ रहे हैं। बेंगलुरु में भी होटल उद्योग को बड़ा झटका लगा है। होटल संघ के अनुसार शहर में होटल और रेस्तरां के कारोबार में लगभग पच्चीस से तीस प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई है। कई स्थानों पर तले हुए व्यंजन और स्नैक्स को मेन्यू से हटा दिया गया है तथा काम के घंटे भी कम कर दिए गए हैं।
भोपाल में स्ट्रीट फूड कारोबार भी इस संकट से प्रभावित हुआ है। पानी पूरी और अन्य ठेले लगाने वाले विक्रेताओं का कारोबार लगभग चालीस प्रतिशत तक घट गया है क्योंकि व्यावसायिक गैस सिलिंडर मिलना मुश्किल हो गया है। कई विक्रेता अस्थायी रूप से अपना काम बंद करने को मजबूर हो गए हैं।
बिहार की राजधानी पटना में काम करने वाले मजदूरों के लिए यह संकट और भी गंभीर हो गया है। किराए के कमरों में रहने वाले कई मजदूर अब लकड़ी या अन्य अस्थायी ईंधन का सहारा लेकर खाना बना रहे हैं। निर्माण स्थलों से बची लकड़ियों का उपयोग ईंधन के रूप में किया जा रहा है। कई मजदूरों का कहना है कि उन्हें घंटों कतार में खड़े रहने के बाद भी गैस सिलिंडर नहीं मिल पा रहा है और कई बार ब्लैक मार्केट से बहुत महंगे दाम पर खरीदना पड़ता है।
उधर, उद्योग जगत भी इससे प्रभावित हुआ है। परिधान निर्यात संवर्धन परिषद ने तमिलनाडु सरकार से मांग की है कि वस्त्र निर्यात उद्योग को भी बीस प्रतिशत व्यावसायिक गैस आवंटन में शामिल किया जाए। परिषद का कहना है कि रंगाई, धुलाई और फिनिशिंग जैसे कई उत्पादन चरण एलपीजी पर निर्भर हैं और गैस की कमी से छोटे तथा मध्यम उद्योगों की उत्पादन प्रक्रिया बाधित हो रही है। इसके साथ ही एलपीजी संकट का असर सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियों तक भी पहुंच गया है। कई बड़ी कंपनियों के कार्यालय परिसरों में कैंटीन का मेन्यू घटा दिया गया है। कुछ स्थानों पर कर्मचारियों से घर से भोजन लाने की सलाह दी गई है।
इसी बीच, पश्चिम एशिया में तनाव के कारण कच्चे तेल की आपूर्ति को लेकर भी चिंता बनी हुई है। हालांकि फुजैराह तेल टर्मिनल पर हमले के दौरान एक भारतीय ध्वज वाले तेल टैंकर ने सुरक्षित रूप से लगभग अस्सी हजार आठ सौ मीट्रिक टन कच्चा तेल लेकर भारत के लिए प्रस्थान किया और उसके सभी भारतीय चालक दल सुरक्षित बताए गए हैं। उधर, कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर विमान यात्रा पर भी दिख रहा है। कई विमान कंपनियों ने ईंधन अधिभार बढ़ा दिया है जिससे हवाई किराए में तेजी आई है और यात्री भविष्य की यात्राओं के लिए पहले ही टिकट बुक करने लगे हैं।
मोदी सरकार का कहना है कि स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है और देश में गैस की नियमित आपूर्ति बनाए रखने के लिए हर संभव कदम उठाए जा रहे हैं। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबे समय तक जारी रहता है तो एलपीजी संकट और गहरा सकता है।
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कोल इंडिया लिमिटेड की दूसरी सबसे बड़ी कोयला उत्पादक इकाई साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (एसईसीएल) के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक हरीश दुहान ने सोमवार को कहा कि कंपनी बदलती वैश्विक ऊर्जा परिस्थितियों के बीच देश की कोयला मांग, विशेषकर बिजली क्षेत्र की जरूरतों को पूरा करने के लिए तैयार है।
पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे वैश्विक ऊर्जा मार्ग प्रभावित हुए हैं जिससे आयातित कोयला एवं द्रवीकृत प्राकृतिक गैस की लागत बढ़ गई है।
इसका अप्रत्यक्ष दबाव भारत के कोयला और बिजली क्षेत्रों पर पड़ रहा है।
साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (एसईसीएल) के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक दुहान ने ‘पीटीआई-भाषा’ के साथ बातचीत में कहा कि कंपनी मजबूत परिचालन गति बनाए हुए है।
चालू वित्त वर्ष 2025-26 में कंपनी ने मार्च के मध्य तक करीब 16.5 करोड़ टन कोयले का उत्पादन और 16.9 करोड़ टन से अधिक कोयले का प्रेषण किया है जिससे बिजलीघरों तथा अन्य उपभोक्ताओं को स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित हुई है।
कंपनी एनटीपीसी, राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (आरवीयूएनएल) और मध्य प्रदेश पावर जेनरेटिंग कंपनी लिमिटेड (एमपीपीजीसीएल) जैसे प्रमुख बिजली उत्पादकों को कोयला आपूर्ति करती है।
दुहान ने बताया कि कंपनी के पास फिलहाल करीब 2.3 करोड़ टन कोयले का भंडार है जो बिजली क्षेत्र से मांग बढ़ने की स्थिति में पर्याप्त सहारा प्रदान करेगा। इसके अतिरिक्त कंपनी के पास लगभग 1.2 करोड़ टन कोयला भंडार ऐसा है जिसे तुरंत उत्पादन में बदला जा सकता है जिससे परिचालन में मजबूती बनी रहती है।
उन्होंने बताया कि चालू वित्त वर्ष में खनन कार्यों के लिए कंपनी के पास पर्याप्त भूमि उपलब्ध है और उत्पादन एवं आपूर्ति बनाए रखने के लिए सभी आवश्यक खनन तथा परिवहन अनुबंध पहले से लागू हैं।
इसके साथ ही एसईसीएल से जुड़े बिजली संयंत्रों के पास भी पर्याप्त कोयला भंडार है जिससे बिजली उत्पादन आपूर्ति श्रृंखला में स्थिरता बनी हुई है।
कंपनी की बड़ी खनन परियोजनाएं इस आपूर्ति को बनाए रखने में अहम भूमिका निभा रही हैं।
कंपनी की ‘दीपका मेगा’ खान इस वर्ष 3.5 करोड़ टन उत्पादन का आंकड़ा पार कर चुकी है और अब तक के सबसे अधिक वार्षिक उत्पादन की ओर बढ़ रही है।
इसी तरह एशिया की सबसे बड़ी कोयला खान गेवरा कोयला खान ने पांच करोड़ टन से अधिक उत्पादन का स्तर पार कर लिया है जबकि कुसमुंडा कोयला खान के भी चालू वर्ष में तीन करोड़ टन से अधिक उत्पादन हासिल करने की उम्मीद है।
इसके अलावा एसईसीएल ‘रेक लोडिंग’ बढ़ाने, भारतीय रेल के साथ करीबी समन्वय और देशभर के बिजली संयंत्रों को प्राथमिकता के आधार पर आपूर्ति कर कोयला निकासी तथा आपूर्ति तंत्र को लगातार मजबूत कर रही है।
उन्होंने कहा कि इन उपायों के माध्यम से साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड भारत की ऊर्जा सुरक्षा में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है। विशेषकर मांग बढ़ने के समय बिजली क्षेत्र को निर्बाध कोयला आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए वह प्रतिबद्ध है।
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