राज्यसभा की संरचना और इसकी चुनाव प्रक्रिया भारतीय लोकतंत्र का एक अनूठा हिस्सा है। जहाँ लोकसभा का चुनाव हर पाँच साल में पूरे देश में एक साथ होता है, वहीं राज्यसभा की प्रक्रिया पूरी तरह अलग है। भारत के चुनाव आयोग ने 10 राज्यों की 37 राज्यसभा सीटों के लिए 16 मार्च, 2026 को मतदान की घोषणा की है। यह चुनाव भारतीय संसदीय प्रणाली की उस निरंतरता को दर्शाता है, जो राज्यसभा को 'स्थायी सदन' (Permanent House) बनाती है।
16 मार्च का चुनावी शेड्यूल
मतदान का समय: सुबह 9:00 बजे से शाम 4:00 बजे तक
मतगणना: उसी दिन शाम 5:00 बजे से शुरू।
प्रक्रिया पूर्ण होने की तिथि: 20 मार्च, 2026 तक।
ये चुनाव इसलिए हो रहे हैं क्योंकि कई मौजूदा सदस्यों का कार्यकाल इस साल खत्म हो रहा है।
राज्यसभा चुनाव हर दो साल में क्यों होते हैं?
लोकसभा के उलट, जिसका चुनाव पाँच साल के लिए होता है और जिसे भंग किया जा सकता है, राज्यसभा एक स्थायी सदन है। इसका मतलब है कि यह कभी काम करना बंद नहीं करता। राज्यसभा के हर सदस्य का कार्यकाल छह साल का होता है, लेकिन सभी सदस्यों का कार्यकाल एक ही समय पर शुरू या खत्म नहीं होता। इसके बजाय, हर दो साल में एक-तिहाई सदस्य रिटायर हो जाते हैं। जब उनका कार्यकाल खत्म होता है, तो उन सीटों को भरने के लिए चुनाव होते हैं। यह व्यवस्था यह पक्का करती है कि सदन में हमेशा अनुभवी सदस्य रहें और उसका काम बिना किसी रुकावट के चलता रहे। आने वाले चुनाव 10 राज्यों में होंगे: महाराष्ट्र, ओडिशा, तेलंगाना, तमिलनाडु, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, असम, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और बिहार। सबसे ज़्यादा सीटें महाराष्ट्र में हैं, जहाँ 7 सीटों पर चुनाव होंगे; इसके बाद तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में 6-6 सीटों पर चुनाव होंगे।
जिन नेताओं का कार्यकाल खत्म हो रहा है
इस साल राज्यसभा में कई जाने-माने नेताओं का कार्यकाल पूरा हो रहा है। इनमें शरद पवार, हरिवंश नारायण सिंह, प्रियंका चतुर्वेदी, रामदास अठावले, अभिषेक मनु सिंघवी, साकेत गोखले और तिरुचि शिवा जैसे नेता शामिल हैं।
राज्यसभा एक 'स्थायी सदन' है
लोकसभा के विपरीत, राज्यसभा कभी भी भंग (Dissolve) नहीं होती। लोकसभा का कार्यकाल 5 साल का होता है और उसके बाद सभी सदस्य एक साथ हट जाते हैं, लेकिन राज्यसभा हमेशा अस्तित्व में रहती है। इसे 'निरंतरता का सदन' भी कहा जाता है। राज्यसभा के एक सदस्य का कार्यकाल 6 साल का होता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 83(1) के अनुसार, रोटेशन की प्रक्रिया इस प्रकार काम करती है: सदन के कुल सदस्यों में से एक-तिहाई (1/3) सदस्य हर दो साल में रिटायर हो जाते हैं। जो सदस्य रिटायर होते हैं, केवल उन्हीं की सीटों पर दोबारा चुनाव होते हैं। इस तरह, हर दो साल में खाली हुई 1/3 सीटों को भरने के लिए नई चुनावी प्रक्रिया अपनाई जाती है।
इस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य
संसद के ऊपरी सदन को इस तरह से डिजाइन करने के पीछे दो बड़े कारण हैं:
निरंतरता: देश में कभी ऐसी स्थिति न आए जब संसद का कोई भी सदन काम न कर रहा हो। यदि किसी आपात स्थिति में लोकसभा भंग भी हो जाए, तो राज्यसभा विधायी कार्यों के लिए मौजूद रहती है- अनुभव का संतुलन: हर दो साल में नए सदस्य आने और पुराने सदस्यों के बने रहने से सदन में 'युवा ऊर्जा' और 'वरिष्ठ अनुभव' का संतुलन बना रहता है।
एक उदाहरण से समझें:
यदि राज्यसभा में कुल 245 सीटें हैं, तो:
साल 1: 81 सदस्य रिटायर होंगे और चुनाव होगा।
साल 3: अगले 81 सदस्य रिटायर होंगे और चुनाव होगा।
साल 5: शेष 81 सदस्य रिटायर होंगे और चुनाव होगा।
साल 7: वही सिलसिला फिर से शुरू हो जाएगा जो साल 1 में हुआ था।
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