राजनीति में आरोप प्रत्यारोप लगना कोई नई बात नहीं है, लेकिन जब बिना किसी ठोस तथ्य के संवैधानिक संस्थानों और शिक्षण संस्थानों पर कीचड़ उछालकर उनकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किये जाते हैं, तो यह स्वस्थ लोकतांत्रिक राजनीति नहीं बल्कि लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करने की सोची समझी और खतरनाक राजनीति नजर आती है। देश में इस तरह की राजनीति को बढ़ावा दे रहे राहुल गांधी से पूछा जाना चाहिए कि आखिर उनके इरादे क्या हैं? सवाल यह भी उठता है कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी आखिर हर जगह तनाव का माहौल क्यों पैदा करना चाहते हैं? सवाल यह भी उठता है कि आरोपों के तथ्यहीन साबित होने पर वह माफी क्यों नहीं मांगते?
सवाल उठता है कि जब देश के विश्वविद्यालयों में छात्र शांति से पढ़ाई कर अपने भविष्य को संवारने में जुटे हैं, तब उनके बीच जातिगत बीज बोने की कोशिश आखिर किस मकसद से की जा रही है? संभव है कि ऐसी राजनीति से कांग्रेस को कुछ राजनीतिक लाभ मिल जाये, लेकिन इसका सबसे बड़ा नुकसान समाज की समरसता को होता है। यहां यह सवाल भी उठता है कि खुद को मुहब्बत की दुकान चलाने वाला बताने वाले राहुल गांधी आखिर बार बार नफरत और विभाजन की भाषा क्यों बोलते नजर आते हैं?
हम आपको बता दें कि दिल्ली विश्वविद्यालय ने छात्रों के प्रवेश को लेकर लगाए गए जाति आधारित भेदभाव के आरोपों का कड़ा खंडन करते हुए विस्तृत आंकड़े जारी किये हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन ने विपक्ष के नेता राहुल गांधी के बयान को आधारहीन बताते हुए उनसे ऐसे गैरजिम्मेदाराना आरोप लगाने से बचने की अपील की है। साथ ही यह भी कहा गया है कि ऐसे बयान न केवल विश्वविद्यालय की छवि को नुकसान पहुंचाते हैं बल्कि शैक्षणिक वातावरण को भी दूषित करते हैं।
हम आपको बता दें कि दिल्ली विश्वविद्यालय ने रविवार को शैक्षणिक सत्र 2025-26 के प्रवेश आंकड़े सार्वजनिक किये। यह प्रवेश साझा विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा यानि सीयूईटी के माध्यम से हुए हैं। विश्वविद्यालय का कहना है कि उसकी प्रवेश प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी है और संविधान में तय प्रावधानों के अनुरूप सभी वर्गों को न्यायपूर्ण अवसर प्रदान किये जाते हैं।
विश्वविद्यालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार परास्नातक पाठ्यक्रमों में कुल दस हजार चार सौ बयालीस विद्यार्थियों का प्रवेश हुआ। इनमें चार हजार बाईस विद्यार्थी सामान्य वर्ग से हैं जो लगभग 38.59 प्रतिशत हैं। अन्य पिछड़ा वर्ग के तीन हजार एक सौ पंद्रह विद्यार्थी यानी करीब 29.88 प्रतिशत छात्र शामिल हैं। अनुसूचित जाति के एक हजार चार सौ अठासी विद्यार्थी यानि 14.27 प्रतिशत हैं जबकि अनुसूचित जनजाति के छह सौ चौदह विद्यार्थी 5.89 प्रतिशत हैं। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के एक हजार दो सौ तीन विद्यार्थियों को भी प्रवेश मिला जो 11.54 प्रतिशत हैं।
स्नातक पाठ्यक्रमों के आंकड़े भी इसी तस्वीर को स्पष्ट करते हैं। विश्वविद्यालय के अनुसार स्नातक स्तर पर कुल सत्तर हजार तीन सौ पचानवे विद्यार्थियों का प्रवेश हुआ। इनमें बत्तीस हजार सात सौ सतहत्तर विद्यार्थी सामान्य वर्ग से हैं जो 46.56 प्रतिशत हैं। अन्य पिछड़ा वर्ग के सत्रह हजार नौ सौ इकहत्तर विद्यार्थी यानि 25.52 प्रतिशत हैं। अनुसूचित जाति के दस हजार पांच सौ सत्रह विद्यार्थी यानि 14.93 हैं जबकि अनुसूचित जनजाति के तीन हजार दो सौ इक्यावन विद्यार्थी यानि 4.62 प्रतिशत हैं। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के पांच हजार आठ सौ उनहत्तर विद्यार्थियों को भी अवसर मिला जो 8.35 प्रतिशत हैं।
इन आंकड़ों को सामने रखते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय ने स्पष्ट किया कि प्रवेश की प्रक्रिया में किसी प्रकार के जाति आधारित साक्षात्कार की अनिवार्यता नहीं है। अधिकांश पाठ्यक्रमों में प्रवेश साझा विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा के अंकों के आधार पर होता है। विश्वविद्यालय ने कहा कि इस व्यवस्था में व्यक्तिगत पक्षपात या जाति आधारित भेदभाव की गुंजाइश बहुत कम रह जाती है।
हम आपको बता दें कि राहुल गांधी ने गत शुक्रवार को लखनऊ में बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम की जयंती पर आयोजित एक कार्यक्रम में दावा किया था कि दिल्ली विश्वविद्यालय में साक्षात्कार के जरिये विद्यार्थियों को बाहर किया जाता है। उन्होंने कहा था कि साक्षात्कार के दौरान विद्यार्थियों से उनकी जाति पूछी जाती है और फिर उन्हें असफल कर दिया जाता है।
राहुल गांधी का यह बयान सामने आते ही विश्वविद्यालय प्रशासन ने कड़ा प्रतिवाद किया। विश्वविद्यालय ने कहा कि ऐसा दावा तथ्यों से पूरी तरह परे है। प्रशासन का कहना है कि यदि देश की सबसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थाओं में से एक पर इस प्रकार के आरोप लगाए जायेंगे तो इससे विद्यार्थियों और शिक्षकों के बीच अविश्वास का वातावरण बनेगा।
यही नहीं, दिल्ली विश्वविद्यालय ने शिक्षकों की नियुक्तियों के आंकड़े भी साझा किये। वर्ष 2021 से पंद्रह मार्च 2025 तक कुल पांच हजार छप्पन नियुक्तियां हुईं। इनमें दो हजार एक सौ तेईस नियुक्तियां सामान्य वर्ग से हुईं जो 41.99 प्रतिशत हैं। अनुसूचित जाति के सात सौ सत्रह शिक्षक यानी 14.18 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति के 349 शिक्षक यानि 6.90 प्रतिशत तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के एक हजार दो सौ बयासी शिक्षक यानि 25.35 प्रतिशत हैं। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के चार सौ बाईस शिक्षक और दिव्यांग वर्ग के एक सौ तिरसठ लोगों को भी नियुक्ति दी गयी।
देखा जाये तो इन आंकड़ों ने राहुल गांधी के आरोपों पर कई सवाल खड़े कर दिये हैं। आलोचकों का कहना है कि बिना ठोस प्रमाण के इस प्रकार के बयान देना जिम्मेदार राजनीति नहीं कहलाता। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या राहुल गांधी हर मुद्दे को केवल जाति के चश्मे से देखने की कोशिश कर रहे हैं?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में जाति का आरोप लगाना बेहद गंभीर बात है। तथ्यहीन आरोप लगाने से सामाजिक तनाव बढ़ेगा। ऐसे में अपेक्षा की जाती है कि देश के वरिष्ठ नेता सार्वजनिक मंचों पर बोलते समय तथ्यों की जांच अवश्य करें।
हम आपको यह भी बता दें कि दिल्ली विश्वविद्यालय ने अंत में स्पष्ट कहा है कि वह संविधान की भावना के अनुरूप सभी वर्गों को समान अवसर देने के लिये प्रतिबद्ध है। विश्वविद्यालय ने राहुल गांधी से अपील की है कि वह बिना प्रमाण के आरोप लगाने से बचें और देश की शिक्षा व्यवस्था को अनावश्यक विवाद में न घसीटें।
बहरहाल, यह स्पष्ट है कि दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा जारी किये गये आंकड़े एक अलग ही तस्वीर पेश करते हैं और राहुल गांधी के आरोपों की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा देते हैं। अब देखना यह होगा कि इन तथ्यों के सामने आने के बाद कांग्रेस नेता अपने बयान पर क्या स्पष्टीकरण देते हैं।
-नीरज कुमार दुबे
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