ईरान के साथ अमेरिका और इजराइल की जंग 15 दिन से ज्यादा समय से चल रही है। ईरान ने स्टेट ऑफ हरमूज पर नाकेबंदी कर पूरी दुनिया में कोहराम मचा दिया था। यह अलग बात है कि उसने अमेरिका और इजराइल के साथ-साथ युद्ध में उसके सहयोगी देशों को छोड़कर बाकी देशों के लिए होरमूज का रास्ता खोल दिया है। जाहिर है इससे दूसरे देशों को बहुत कम आर्थिक नुकसान होगा। वैसे यह बात बार-बार सामने आती रही है कि युद्ध सिर्फ विनाश और तबाही लाता है। इससे किसी का भला नहीं होता। नुकसान ही होता है। कभी सोचा है आपने कि ट्रंप की सनक पर ईरान पर हमला करते हुए अमेरिका अब तक कितने पैसे गवा चुका होगा? पैसे का तो जो नुकसान अमेरिका को हो रहा है, सो हो ही रहा है। उसने अब तक कम से कम अपने 11 सैनिक खो दिए। युद्ध के दौरान फ्यूल भरने वाले पांच विमान भी उसके क्रैश हो चुके हैं। इन सब के अलावा वह तेहरान से लेकर इसफानम तक भी B52 बमबर से लगातार बम बरसा रहा है।
इस बमबारी से ईरान तो तबाह है ही लेकिन तबाही मचाने में अमेरिका ने कितने रुपए बहा दिए? इसका अंदाजा है आपको? अमेरिका राष्ट्रीय आर्थिक परिषद के निदेशक केविन हैट ने यह जानकारी साझा की। ईरान के साथ जारी युद्ध पर अमेरिका अब तक लगभग 12 अरब अमेरिकी डॉलर खर्च कर चुका है। यह बात राष्ट्रीय आर्थिक परिषद के निदेशक केविन हैसेट ने कही। वह सीबीएस न्यूज के फेस द नेशन कार्यक्रम में बोल रहे थे। हैसेट ने कहा कि मुझे जो नवीनतम संख्या बताई गई है, वह 12 (अरब अमेरिकी डॉलर) है। यह पूछे जाने पर कि क्या अमेरिका को कांग्रेस (अमेरिकी संसद) से और अधिक धन का अनुरोध करने की आवश्यकता होगी, हैसेट ने जवाब दिया मुझे लगता है कि अभी हमारे पास वह सबकुछ है जिसकी हमें आवश्यकता है, क्या हमें और अधिक धन के लिए कांग्रेस के पास वापस जाना होगा, यह एक ऐसा विषय है जिसकी पड़ताल रसेल वॉट और ओएमबी करेंगे। ओएमबी अमेरिका का प्रबंधन और बजट कार्यालय है तथा रसेल वॉट इसके निदेशक हैं।
बता दें कि ओएमबी अमेरिका का प्रबंधन और बजट ऑफिस है और रसेल वाट इसके डायरेक्टर हैं। लेकिन इस खर्च और तबाही के हिसाब के बाद भी यह सवाल बचा रह जाता है कि इन सबका हासिल क्या है? शांति दूत बनने की चाह में अमेरिकी प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप कब अशांति के दूत बन गए? इसका एहसास उन्हें आखिर कब होगा? इंसानियत की हत्या करने वाली यह जंग आखिर कब तक चलेगी?
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वो कहावत है ना जब घर में आग लगती है तो सबसे ताकतवर इंसान भी पड़ोसियों से मदद मांगने लगता है। कुछ ऐसा ही हाल अमेरिका का दिखाई दे रहा है। पश्चिम एशिया में बढ़ती टेंशन और स्टेट ऑफ हॉर्मोज में जारी संकट अब सिर्फ सैन्य या राजनीतिक मामला नहीं रह गया। यह अब दुनिया की सबसे ताकतवर आर्थिक व्यवस्था पेट्रो डॉलर सिस्टम के लिए सीधी चुनौती बन चुका है। ताजा रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कई देशों से मदद की अपील की है। अमेरिका ने यूके, फ्रांस, जापान, साउथ कोरिया और यहां तक कि चाइना से भी कहा कि वह होम जलडमरू मध्य में गुजरने वाले तेल टैंकरों की सुरक्षा में मदद करें। दरअसल यह इलाका दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में से एक है।
दुनिया के लगभग 20% तेल का व्यापार इसी रास्ते से होकर गुजरता है। लेकिन इसी बीच ईरान ने एक नई शर्त रख दी। ईरान का कहना है कि तेल टैंकरों को तो रास्ता दिया जाएगा लेकिन तेल का भुगतान अमेरिकी डॉलर में नहीं बल्कि चीन की मुद्रा युवान में किया जाएगा। यहीं से यह संघर्ष एक नई दिशा ले चुका है। पेट्रो डॉलर बनाम पेट्रो युवान। अब रिपोर्ट्स के मुताबिक फरवरी के अंत तक होरमू जलडमरूमध्य मध्य से रोजाना लगभग 20 मिलियन बैरल तेल गुजर रहा है। लेकिन बढ़ते तनाव के बाद यह मात्रा काफी कम हो गई है। स्थिति तब और गंभीर हो गई जब अमेरिका ने ईरान के प्रमुख तेल निर्यात केंद्र खार्क आइसलैंड पर हमला किया। ईरान ने इसे अपनी रेड लाइन बताते हुए चेतावनी दी कि अगर हमला जारी रहा तो पूरे खाड़ी क्षेत्रों के ऊर्जा ढांचे को निशाना बनाया जा सकता है। अब यहीं से सवाल उठता है कि अगर होरमूद जलडमरूमध्य मध्य से गुजरने वाले तेल का बड़ा हिस्सा युवान में कारोबार होने लगेगा तो इसका असर सिर्फ तेल बाजार तक सीमित नहीं रहेगा। यह सीधे-सीधे अमेरिकी डॉलर की वैश्विक ताकत को चुनौती देगा।
पिछले कई दशकों से दुनिया का ज्यादातर तेल डॉलर में खरीदा और बेचा जाता है जिससे डॉलर की अंतरराष्ट्रीय ताकत बनी रहती है। लेकिन अगर पेट्रो युवान का दायरा बढ़ता है तो दुनिया धीरे-धीरे बहु मुद्रा आधारित वैश्विक आर्थिक व्यवस्था की ओर बढ़ सकती है। ऐसे में भारत जैसे देशों के सामने भी एक बड़ा सवाल खड़ा होता है कि क्या अब समय आ गया है कि भारत पेट्रोल रुपया जैसी व्यवस्था पर गंभीरता से विचार करें क्योंकि दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक लड़ाई अब शुरू हो चुकी है।
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