वो कहावत है ना जब घर में आग लगती है तो सबसे ताकतवर इंसान भी पड़ोसियों से मदद मांगने लगता है। कुछ ऐसा ही हाल अमेरिका का दिखाई दे रहा है। पश्चिम एशिया में बढ़ती टेंशन और स्टेट ऑफ हॉर्मोज में जारी संकट अब सिर्फ सैन्य या राजनीतिक मामला नहीं रह गया। यह अब दुनिया की सबसे ताकतवर आर्थिक व्यवस्था पेट्रो डॉलर सिस्टम के लिए सीधी चुनौती बन चुका है। ताजा रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कई देशों से मदद की अपील की है। अमेरिका ने यूके, फ्रांस, जापान, साउथ कोरिया और यहां तक कि चाइना से भी कहा कि वह होम जलडमरू मध्य में गुजरने वाले तेल टैंकरों की सुरक्षा में मदद करें। दरअसल यह इलाका दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में से एक है।
दुनिया के लगभग 20% तेल का व्यापार इसी रास्ते से होकर गुजरता है। लेकिन इसी बीच ईरान ने एक नई शर्त रख दी। ईरान का कहना है कि तेल टैंकरों को तो रास्ता दिया जाएगा लेकिन तेल का भुगतान अमेरिकी डॉलर में नहीं बल्कि चीन की मुद्रा युवान में किया जाएगा। यहीं से यह संघर्ष एक नई दिशा ले चुका है। पेट्रो डॉलर बनाम पेट्रो युवान। अब रिपोर्ट्स के मुताबिक फरवरी के अंत तक होरमू जलडमरूमध्य मध्य से रोजाना लगभग 20 मिलियन बैरल तेल गुजर रहा है। लेकिन बढ़ते तनाव के बाद यह मात्रा काफी कम हो गई है। स्थिति तब और गंभीर हो गई जब अमेरिका ने ईरान के प्रमुख तेल निर्यात केंद्र खार्क आइसलैंड पर हमला किया। ईरान ने इसे अपनी रेड लाइन बताते हुए चेतावनी दी कि अगर हमला जारी रहा तो पूरे खाड़ी क्षेत्रों के ऊर्जा ढांचे को निशाना बनाया जा सकता है। अब यहीं से सवाल उठता है कि अगर होरमूद जलडमरूमध्य मध्य से गुजरने वाले तेल का बड़ा हिस्सा युवान में कारोबार होने लगेगा तो इसका असर सिर्फ तेल बाजार तक सीमित नहीं रहेगा। यह सीधे-सीधे अमेरिकी डॉलर की वैश्विक ताकत को चुनौती देगा।
पिछले कई दशकों से दुनिया का ज्यादातर तेल डॉलर में खरीदा और बेचा जाता है जिससे डॉलर की अंतरराष्ट्रीय ताकत बनी रहती है। लेकिन अगर पेट्रो युवान का दायरा बढ़ता है तो दुनिया धीरे-धीरे बहु मुद्रा आधारित वैश्विक आर्थिक व्यवस्था की ओर बढ़ सकती है। ऐसे में भारत जैसे देशों के सामने भी एक बड़ा सवाल खड़ा होता है कि क्या अब समय आ गया है कि भारत पेट्रोल रुपया जैसी व्यवस्था पर गंभीरता से विचार करें क्योंकि दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक लड़ाई अब शुरू हो चुकी है।
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होर्मुज जलडमरूमध्य को पार कर चुका द्रवीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) टैंकर शिवालिक सोमवार को गुजरात के मुंद्रा बंदरगाह पर पहुंचने के लिए पूरी तरह तैयार है। लईरानी अधिकारियों ने एलपीजी ले जा रहे भारतीय ध्वज वाले दो जहाजों को होर्मुज जलडमरूमध्य से पारगमन की अनुमति दी है। इनमें से एक शिवालिक है, जबकि दूसरा नंदा देवी है। इससे पहले, जहाजरानी मंत्रालय के विशेष सचिव राजेश कुमार सिन्हा ने शनिवार को बताया कि शिवालिक और नंदा देवी जहाजों के क्रमशः 16 और 17 मार्च को पहुंचने की उम्मीद है। फारस की खाड़ी क्षेत्र में सभी भारतीय नाविक सुरक्षित हैं और पिछले 24 घंटों में उनसे जुड़ी कोई अप्रिय घटना नहीं हुई है। होर्मुज जलडमरूमध्य के पश्चिम में स्थित फारस की खाड़ी में भारतीय ध्वज वाले 24 जहाज थे। इनमें से दो जहाज - शिवालिक और नंदा देवी - भारतीय ध्वज वाले जहाज हैं और दोनों एलपीजी वाहक हैं। ये जहाज कल देर रात/आज सुबह होर्मुज जलडमरूमध्य से सुरक्षित रूप से गुजर गए और अब भारत की ओर बढ़ रहे हैं। इन जहाजों में लगभग 92,700 मीट्रिक टन एलपीजी है; इनके आगमन बंदरगाह मुंद्रा और कांडला होंगे, जिनके क्रमशः 16 और 17 मार्च को पहुंचने की उम्मीद है। परिणामस्वरूप, अब फारस की खाड़ी में भारतीय ध्वज वाले 22 जहाज बचे हैं, जिनमें कुल 611 नाविक सवार हैं।
इससे पहले, विदेश मंत्री एस जयशंकर ने मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच भारत की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से होर्मुज जलडमरूमध्य से समुद्री यातायात को फिर से शुरू करने के लिए तेहरान के साथ सीधी बातचीत को सबसे कारगर तरीका बताया था। फाइनेंशियल टाइम्स यूके को दिए एक साक्षात्कार में केंद्रीय मंत्री ने कहा कि नई दिल्ली वर्तमान में ईरान के साथ इस महत्वपूर्ण जलमार्ग को फिर से खोलने की प्रक्रिया में लगी हुई है, जिससे वैश्विक तेल व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा संचालित होता है। उन्होंने कहा कि इन चर्चाओं से "कुछ परिणाम मिलने शुरू हो गए हैं, जिससे संकेत मिलता है कि भारत को तेहरान से अलग होने की बजाय "तर्क और समन्वय" करना अधिक प्रभावी लगता है।
जयशंकर ने कहा कि निश्चित रूप से भारत के दृष्टिकोण से, यह बेहतर है कि हम तर्क और समन्वय करें और कोई समाधान निकालें, बजाय इसके कि हम ऐसा न करें। हालांकि यह एक स्वागत योग्य कदम है, लेकिन इस पर निरंतर काम जारी है, इसलिए बातचीत जारी रहेगी। मंत्री ने हाल ही में शिवालिक और नंदा देवी बंदरगाहों से होकर गुजरने वाले जहाजों को इस कूटनीतिक रणनीति की व्यावहारिक सफलता के रूप में रेखांकित किया। लगभग 92,712 मीट्रिक टन द्रवीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) ले जा रहे ये टैंकर वर्तमान में भारत के मुंद्रा और कांडला बंदरगाहों की ओर जा रहे हैं।
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