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पुडुचेरी विधानसभा चुनाव 2026: क्या फिर खिलेगा कमल या कांग्रेस करेगी वापसी? एक ही दिन में तय होगा 30 सीटों का भविष्य

नई दिल्ली : केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में सत्ता की सबसे बड़ी जंग का आधिकारिक बिगुल बज गया है। चुनाव आयोग ने विधानसभा चुनावों की तारीखों का ऐलान कर दिया है, जिससे राजनीतिक गलियारों में सस्पेंस और सरगर्मी दोनों बढ़ गई हैं।

सबसे कम सीटों वाली इस विधानसभा में मुकाबला बेहद रोचक होने वाला है क्योंकि यहा की सभी 30 सीटों पर महज एक ही चरण में मतदान संपन्न होगा। चुनाव आयोग के इस कार्यक्रम के साथ ही पुडुचेरी में चुनावी बिसात बिछ गई है और अब सबकी नजरें 4 मई को आने वाले नतीजों पर टिकी हैं।

​एक ही दिन में 'आर या पार' का मुकाबला

​पुडुचेरी की राजनीति में इस बार का सस्पेंस एक ही तारीख पर आकर ठहर गया है। चुनाव आयोग के अनुसार, पुडुचेरी की सभी 30 विधानसभा सीटों पर 9 अप्रैल को एक साथ वोट डाले जाएंगे। आयोग ने स्पष्ट कर दिया है कि चुनावी प्रक्रिया को एक ही चरण में समेटकर सुरक्षा और व्यवस्था को कड़ा रखा जाएगा।

एन रंगासामी की अगुवाई वाली मौजूदा एनडीए सरकार के लिए जहा अपनी सत्ता बचाने की चुनौती है, वहीं विपक्ष के लिए यह अस्तित्व की लड़ाई बन गई है।

​क्या रंगासामी बचा पाएंगे अपना किला?

​पुडुचेरी में वर्तमान में एन रंगासामी की ऑल इंडिया एनआर कांग्रेस (AINRC) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के गठबंधन की सरकार है। पिछले चुनाव में इस गठबंधन ने बहुमत का जादुई आंकड़ा पार करते हुए 16 सीटों पर जीत दर्ज की थी।

इस बार सस्पेंस इस बात पर है कि क्या रंगासामी और बीजेपी का यह समीकरण दोबारा काम करेगा या फिर कांग्रेस और डीएमके का गठबंधन सत्ता की चाबी छीनने में सफल होगा। 15 जून को खत्म हो रहे कार्यकाल से पहले यह चुनाव तय करेगा कि पुडुचेरी की जनता को नया नेतृत्व मिलेगा या पुराना भरोसा कायम रहेगा।

​चुनावी शेड्यूल: नामांकन से नतीजों तक का पूरा सफर

​चुनाव आयोग ने नामांकन से लेकर मतगणना तक की पूरी समय-सारणी जारी कर दी है। 16 मार्च को राजपत्र अधिसूचना जारी होने के साथ ही नामांकन की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। नामांकन दाखिल करने की आखिरी तारीख 23 मार्च रखी गई है, जबकि 26 मार्च तक नाम वापस लिए जा सकेंगे।

मतदान के बाद सभी उम्मीदवारों की किस्मत ईवीएम में कैद हो जाएगी, जिसका खुलासा 4 मई को होगा। यह पूरा शेड्यूल राजनीतिक दलों को अपनी रणनीति बनाने के लिए बहुत कम समय दे रहा है, जिससे मुकाबला और भी आक्रामक होने की उम्मीद है।

​सत्ता का गणित: मुख्य गठबंधन और पुरानी हार का डर

​पुडुचेरी की चुनावी फाइट मुख्य रूप से दो बड़े गुटों के बीच सिमटी हुई है। एक तरफ एनआर कांग्रेस की अगुवाई वाला एनडीए है, जिसमें बीजेपी और एआईएडीएमके शामिल हैं। दूसरी तरफ कांग्रेस का गठबंधन है, जिसे डीएमके और लेफ्ट पार्टियों का साथ मिला है। पिछले चुनाव में कांग्रेस के कई कद्दावर नेताओं जैसे एवी सुब्रमण्यम और डीएमके के एसपी शिवकुमार को हार का स्वाद चखना पड़ा था।

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1968 का माई लाई नरसंहार: वियतनाम युद्ध की वह घटना जिसने दुनिया को झकझोर दिया

नई दिल्ली, 15 मार्च (आईएएनएस)। वियतनाम युद्ध के दौरान दक्षिण वियतनाम के एक छोटे से गांव माई लाई में जो हुआ, उसने दुनिया को युद्ध का क्रूर चेहरा दिखाया। इस घटना को इतिहास में माई लाई नरसंहार के नाम से जाना जाता है और इसे 20वीं सदी के सबसे विवादास्पद युद्ध अपराधों में गिना जाता है।

16 मार्च 1968 को वियतनाम युद्ध के दौरान अमेरिकी सेना को यह सूचना मिली थी कि माई लाई गांव में वियतकांग विद्रोही छिपे हुए हैं। इसी आधार पर अमेरिकी सेना की एक यूनिट, जिसे “चार्ली कंपनी” कहा जाता था, को वहां तलाशी अभियान चलाने के लिए भेजा गया। इस यूनिट का नेतृत्व विलियम कैले कर रहे थे।

जब सैनिक गांव पहुंचे तो उन्हें वहां कोई संगठित प्रतिरोध नहीं मिला। इसके बावजूद सैनिकों ने गांव के लोगों को घरों से बाहर निकालना शुरू किया और धीरे-धीरे स्थिति भयावह होती चली गई। प्रत्यक्षदर्शियों और बाद की जांच रिपोर्टों के अनुसार, सैनिकों ने महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों समेत सैकड़ों निहत्थे ग्रामीणों पर गोलियां चला दीं। कई घरों को जला दिया गया और ग्रामीणों को समूहों में खड़ा कर गोली मारी गई।

बाद में सामने आए आंकड़ों के अनुसार इस घटना में लगभग 500 तक नागरिकों की मौत हुई। यह नरसंहार उस समय तुरंत सार्वजनिक नहीं हुआ। शुरुआत में अमेरिकी सेना ने इसे एक सफल सैन्य अभियान बताया, लेकिन कुछ सैनिकों और पत्रकारों की कोशिशों से सच्चाई धीरे-धीरे सामने आने लगी।

इस घटना को दुनिया के सामने लाने में अमेरिकी सैनिक ह्यू थॉमसन जूनियर की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। वे हेलीकॉप्टर से इलाके का निरीक्षण कर रहे थे और उन्होंने देखा कि निहत्थे ग्रामीणों पर गोलीबारी हो रही है। उन्होंने हस्तक्षेप किया और कुछ ग्रामीणों को बचाने की कोशिश भी की।

1969 में अमेरिकी पत्रकार सेमोर हेर्ष की रिपोर्ट के बाद यह घटना वैश्विक स्तर पर सुर्खियों में आई। इसके बाद अमेरिका में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए और वियतनाम युद्ध को लेकर जनता की नाराजगी और बढ़ गई।

जांच के बाद कई सैनिकों के खिलाफ मुकदमा चलाया गया, लेकिन अंततः केवल विलियम कैली को दोषी ठहराया गया। उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई, हालांकि बाद में सजा कम कर दी गई और वे कुछ वर्षों के भीतर ही रिहा हो गए।

--आईएएनएस

केआर/

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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