बांग्लादेश में हिंसा के बढ़ते आंकड़ों के बीच भारत ने अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर जताई चिंता
ढाका, 15 मार्च (आईएएनएस)। भारत ने बांग्लादेशी अधिकारियों से अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा को लेकर बार-बार चिंता जाहिर की है। एक रिपोर्ट के अनुसार, बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर भारत ने बांग्लादेश के अधिकारियों से गहन जांच और जवाबदेही की अपेक्षा की कि सभी नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी बांग्लादेश सरकार की है।
रिपोर्ट में मानवाधिकार समूहों का हवाला देते हुए कहा गया है कि बार-बार होने वाली हिंसा को रोकने के लिए केवल प्रतिक्रियात्मक पुलिस कार्रवाई से काम नहीं चलेगा। इसके लिए निरंतर कानूनी सुरक्षा, अपराधियों पर त्वरित मुकदमा और सामुदायिक सुलह के प्रयास आवश्यक हैं।
द मॉर्निंग वॉइस अखबार ने विस्तार से बताया कि पारदर्शी, स्वतंत्र रूप से सत्यापित आंकड़ों के अभाव में, पूरी स्थिति स्पष्ट नहीं है। फिर भी, ये आरोप अकेले ही एक व्यापक चिंता को उजागर करते हैं। जब किसी भी देश में अल्पसंख्यक लगातार असुरक्षा का सामना करते हैं, तो यह क्षेत्र की बहुलवाद, कानून के शासन और मूलभूत मानवीय गरिमा के प्रति प्रतिबद्धता को चुनौती देता है।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत की संसद में हाल ही में हुए एक खुलासे से पता चला है कि अगस्त 2024 से फरवरी 2026 के बीच बांग्लादेश में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों को निशाना बनाकर हिंसा की लगभग 3,100 घटनाएं हुईं, जिससे पड़ोसी देश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा हो गई हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि हमलों में कथित तौर पर घरों, व्यवसायों और पूजा स्थलों को निशाना बनाया गया, जिनमें हत्या और आगजनी की खबरें हैं। अगर ये तथ्य सही हैं, तो ऐसे कृत्य न केवल सांप्रदायिक हिंसा को बढ़ावा देते हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त मानवाधिकार सिद्धांतों का भी गंभीर उल्लंघन हैं, जिनमें धर्म की स्वतंत्रता, कानून के सामने समानता और जीवन एवं सुरक्षा का अधिकार शामिल हैं।
रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि यह मुद्दा भारत के लिए विशेष रूप से संवेदनशील है, क्योंकि बांग्लादेश के साथ इसकी लंबी और खुली सीमा है और इसके साथ गहरे ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और जनसांख्यिकीय संबंध हैं। सीमा पार अल्पसंख्यकों को प्रभावित करने वाली अस्थिरता के मानवीय, राजनयिक और सुरक्षा संबंधी गंभीर परिणाम हो सकते हैं, जिनमें विस्थापन का दबाव और सीमा पार तनाव शामिल हैं।
रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि अगर इसकी पुष्टि हो जाती है, तो अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा महज एक घरेलू समस्या नहीं बल्कि एक मानवाधिकार संबंधी चिंता का विषय बन जाएगी, जिस पर निरंतर वैश्विक ध्यान देने की आवश्यकता है। बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदुओं पर हमले बढ़ते गए, जिससे मानवाधिकार संबंधी गंभीर चिंताएं पैदा हुईं, जो मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अठारह महीने की अंतरिम सरकार के कार्यकाल के दौरान और भी तेज हो गईं थीं।
--आईएएनएस
एसडी/एएस
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
अपान से नाग-धनंजय तक, जानें शरीर की 10 वायु का महत्व और विज्ञान
नई दिल्ली, 15 मार्च (आईएएनएस)। आयुर्वेद और योग के अनुसार, मानव शरीर में 10 प्रकार की वायु (प्राण) प्रवाहित होती है। ये प्राण जीवन ऊर्जा के रूप में काम करते हैं और सभी शारीरिक क्रियाओं को नियंत्रित करते हैं। आयुर्वेद में इन प्राणों को वायु तत्व का हिस्सा माना जाता है। इन्हें दो मुख्य भागों में विभाजित किया गया है, जिनमें मुख्य प्राण और उप प्राण शामिल है।
मुख्य प्राण 5 होते हैं, जिन्हें पंचप्राण भी कहा जाता है और 5 उप-प्राण होते हैं। ये वायु श्वास लेना-छोड़ना, पाचन, रक्त संचार, बोलना, सोना-जागना, छींकना, जम्हाई लेना, पलक झपकाना जैसी क्रियाओं का संचालन करती हैं। इनका संतुलन स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है।
मोरारजी देसाई नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ योगा के अनुसार, मुख्य प्राण या पंचप्राण शरीर की बुनियादी क्रियाओं के लिए जिम्मेदार हैं।
पहला है प्राण जिसका स्थान हृदय या छाती क्षेत्र है और इसका कार्य श्वसन (सांस लेना-छोड़ना), जीवन ऊर्जा का प्रवाह, हृदय और फेफड़ों के कार्य पर नियंत्रण है। दूसरा है अपान, जिसका स्थान गुदा या पेल्विक क्षेत्र होता है। इसका कार्य रेचक-कुम्भक, मल-मूत्र त्याग, शरीर के निचले हिस्से की ओर ऊर्जा का संचालन, उत्सर्जन प्रक्रिया को नियंत्रित करना। तीसरा है समान और इसका स्थान नाभि क्षेत्र है। इसका कार्य पाचन, भोजन का अवशोषण, पोषक तत्वों का वितरण, अग्नि (पाचन शक्ति) का संतुलन करना होता है।
उदान का स्थान गला होता है और यह निगलने, वमन, वाणी और ऊपर की ओर ऊर्जा का प्रवाह, मस्तिष्क कार्य को देखता है। व्यान का स्थान नेत्र और पूरे शरीर में व्याप्त होता है। इसका कार्य रक्त संचार, पलक झपकाना, शरीर की सभी गतिविधियां, शरीर में ऊर्जा का विस्तार करना होता है।
उप-प्राण छोटी-छोटी विशिष्ट क्रियाओं को नियंत्रित करते हैं। इनमें पहला है नाग जिसका स्थान समस्त शरीर में व्याप्त होता है और कार्य मोचक जैसे डकार, चालक या गति प्रदान करना होता है। दूसरा कूर्म है जो कंठ के साथ ही पूरे शरीर में व्याप्त होता है। इसका काम अवशोषण, वृद्धि, पलक झपकाना जैसी संकुचन क्रियाएं करना है। वहीं, कृकर या कृकल का स्थान भी कंठ होता है और यह भूख-प्यास का संकेत, उद्गार या छींकना, खांसना करना है।
उप प्राण में देवदत्त भी शामिल है, जिसका स्थान मुख और कार्य उबासी लेना है। साथ ही धनंजय भी है, जिसका स्थान सम्पूर्ण शरीर में है और काम अनाहत नाद यानी मृत्यु के बाद भी शरीर में रहना, विघटन रोकना है।
ये प्राण वायु शरीर के लिए बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। इनका संतुलन प्राणायाम, योगासन और ध्यान से किया जा सकता है, जिससे पाचन, श्वास, मानसिक शांति और समग्र स्वास्थ्य बेहतर होता है। असंतुलन से गैस, श्वास रोग, थकान जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
--आईएएनएस
एमटी/वीसी
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