ईरान की 'Mosaic Defence Strategy': अमेरिका के लिए बनी अभेद्य पहेली, जानिए कौन है इस मास्टर प्लान के पीछे का शातिर दिमाग
तेहरान : मिडिल ईस्ट में जारी भीषण संघर्ष के बीच ईरान की सेना जिस मजबूती से अमेरिका और इजरायल का सामना कर रही है, उसके पीछे दशकों पुरानी एक खास सैन्य रणनीति है, जिसे 'मोजैक डिफेंस' (Mosaic Defence) कहा जाता है।
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज डब्लू बुश ने जिस तरह 2003 में इराक की सेना को मात्र 26 दिनों में घुटनों पर ला दिया था, वैसी ही उम्मीद शायद वर्तमान नेतृत्व को ईरान से भी थी। लेकिन हकीकत में ईरान को कमजोर करना पेंटागन के लिए नामुमकिन साबित हो रहा है।
इसकी मुख्य वजह वह शख्स है जिसने इराक युद्ध के दौरान ही तय कर लिया था कि वह ईरान को सद्दाम हुसैन की तरह ढहने नहीं देगा और वह शख्स हैं ईरान की एलीट फोर्स IRGC के पूर्व चीफ मेजर जनरल मोहम्मद अली जाफरी।
कौन हैं मोहम्मद अली जाफरी: मोजैक डिफेंस के असली सूत्रधार
मेजर जनरल मोहम्मद अली जाफरी एक अनुभवी पूर्व सैन्य अधिकारी हैं, जो 2007 से 2019 तक इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के कमांडर-इन-चीफ रहे हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद खुफिया इकाई से की थी और 1979 से 1989 तक चले लंबे ईरान-इराक युद्ध में सक्रिय रूप से भाग लिया था।
2005 में 'सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज' के निदेशक बनने के बाद उन्होंने इराक पर अमेरिकी आक्रमण से मिले सबक का उपयोग करते हुए 'मोजैक डिफेंस' सिद्धांत का खाका तैयार किया, जिसने आज अमेरिका की नाक में दम कर रखा है।
क्या है मोजैक डिफेंस थ्योरी? हार को असंभव बनाने का मंत्र
मोजैक डिफेंस कोई साधारण सैन्य नीति नहीं, बल्कि हार को टालने और दुश्मन को थकाने की एक कला है। इस रणनीति के तहत जाफरी ने ईरान की पूरी सैन्य शक्ति को 31 स्वायत्त प्रांतीय कमानों में बांट दिया। इसका अर्थ यह है कि ईरान का डिफेंस सिस्टम एक जगह से केंद्रित होने के बजाय बंटा हुआ है।
हर प्रांत की अपनी स्वतंत्र मिसाइल यूनिट, ड्रोन बेड़े और 'बसीज' लड़ाकों की फौज है। यह किसी निर्णायक जीत की योजना नहीं है, बल्कि ऐसी संरचना है जो ईरान की हार को लगभग 'असंभव' बना देती है।
डिकैपिटेशन स्ट्राइक का तोड़: नेतृत्व के बिना भी लड़ने की क्षमता
अमेरिका और इजरायल जैसी बड़ी ताकतें अक्सर 'डिकैपिटेशन स्ट्राइक' का उपयोग करती हैं, जिसमें दुश्मन के शीर्ष नेतृत्व या केंद्रीय कमांड सेंटर को नष्ट कर दिया जाता है ताकि पूरी सेना पंगु हो जाए। लेकिन जाफरी का मोजैक मॉडल इसी का सबसे बड़ा तोड़ है।
यदि किसी हमले में तेहरान का केंद्रीय संपर्क टूट जाता है या वरिष्ठ नेता मारे जाते हैं, तो भी सेना की ये 31 स्वतंत्र टुकड़ियां अपने दम पर कार्रवाई जारी रखने का अधिकार और क्षमता रखती हैं।
यही वजह है कि अली खामेनेई की मौत और मोजतबा खामेनेई की नाजुक स्थिति के बावजूद ईरान का डिफेंस सिस्टम आज भी पूरी ताकत से काम कर रहा है।
थकाऊ युद्ध और 'सैलामी स्लाइसिंग' रणनीति
ईरान की इस रणनीति का एक मुख्य हिस्सा दुश्मन को धीरे-धीरे आर्थिक और सैन्य रूप से कमजोर करना है। इसे 'थकाऊ युद्ध' कहा जाता है, जहाँ लक्ष्य आमने-सामने की जंग जीतना नहीं, बल्कि युद्ध को इतना लंबा खींचना है कि हमलावर देश की लागत बेहिसाब बढ़ जाए।
इसी के साथ ईरान 'सैलामी स्लाइसिंग' रणनीति का भी उपयोग करता है, जिसमें छोटे-छोटे लेकिन लगातार कदमों से दुश्मन को नुकसान पहुँचाया जाता है। अंततः यह युद्ध अमेरिका या इजरायल की जनता के लिए गले की फांस बन जाता है, जैसा कि फिलहाल अमेरिकी सैन्य नुकसानों के बाद देखने को मिल रहा है।
अभ्युदय और अनुभव: जाफरी का IRGC में बढ़ता कद
मोहम्मद अली जाफरी ने IRGC में लगातार अपनी योग्यता साबित की। 1992 में उन्हें IRGC की ग्राउंड फोर्सेज का कमांडर बनाया गया और तेहरान की रक्षा के लिए जिम्मेदार स्पेशल यूनिट 'सरल्लाह' का नेतृत्व सौंपा गया। उनके लंबे युद्ध अनुभव और रणनीतिक कौशल ने ही उन्हें 2007 में कमांडर-इन-चीफ के पद तक पहुँचाया।
उनकी पूरी योजना का केंद्र यह रहा है कि अमेरिकी सैन्य कमजोरियों का लगातार अध्ययन किया जाए और अपनी रक्षा प्रणाली को उसी के अनुसार लचीला बनाया जाए।
ईरान का अजय सुरक्षा घेरा: क्यों फेल हो रहे हैं पश्चिमी देशों के प्लान?
पश्चिमी देशों की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उनके पास इस वितरित रक्षा प्रणाली का कोई आसान काउंटर नहीं है। चूंकि फैसले एक जगह से नहीं लिए जाते, इसलिए किसी एक रडार या कमांड सेंटर को तबाह करना पर्याप्त नहीं होता।
ईरान ने जानबूझकर ऐसे हथियार विकसित किए हैं, जैसे नई '359' मिसाइल, जो बिना रडार के काम करती हैं और अमेरिकी ड्रोनों को भनक लगे बिना उन्हें आसमान में ही ढेर कर देती हैं। सस्ते हथियारों से अमेरिका के अरबों डॉलर के डिफेंस सिस्टम को नष्ट करना इसी मोजैक रणनीति का एक सफल हिस्सा है।
भविष्य की जंग: लंबी लड़ाई के लिए तैयार है तेहरान
ईरान ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वह किसी भी दबाव में झुकने वाला नहीं है। जाफरी द्वारा तैयार किया गया यह 'आत्मनिर्भर रक्षा मॉडल' न केवल वर्तमान युद्ध में ढाल बना हुआ है, बल्कि भविष्य की किसी भी बड़ी आक्रामकता के लिए ईरान को तैयार रखता है। जब तक अमेरिका अपनी सैन्य रणनीति में बुनियादी बदलाव नहीं करता, तब तक मोजैक डिफेंस की इस दीवार को लांघना उसके लिए नामुमकिन बना रहेगा।
Middle East Conflict: एयर इंडिया-इंडिगो के बाद एक और कंपनी ने बढ़ाया किराया, 1300 रुपये तक महंगा होगा टिकट
Middle East Conflict: हवाई यात्रा करने वालों के लिए किराया अब और महंगा होने वाला है। कम कीमत वाली एयरलाइन अकासा एयर ने शनिवार को घोषणा की कि वह टिकटों पर नया फ्यूल सरचार्ज लगाएगी। यह सरचार्ज 199 रुपये से लेकर 1300 रुपये तक होगा और 15 मार्च 2026 से लागू होगा।
एयरलाइन के मुताबिक यह अतिरिक्त शुल्क घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों तरह की उड़ानों पर लगेगा। 15 मार्च की रात 12 बजकर 1 मिनट के बाद की गई हर नई बुकिंग पर यह सरचार्ज लागू रहेगा। कंपनी ने कहा है कि यह शुल्क हर फ्लाइट के लिए अलग-अलग होगा और यात्रा की दूरी के आधार पर तय किया जाएगा।
अकासा एय़र ने बढ़ाया किराया
दरअसल पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के कारण कच्चे तेल और एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) की कीमतों में तेजी आई है। एयरलाइन का कहना है कि ईंधन की कीमतें एयरलाइंस के कुल ऑपरेटिंग खर्च का बड़ा हिस्सा होती हैं, इसलिए इसका सीधा असर टिकट की कीमतों पर पड़ता है।
एयर इंडिया और इंडिगो भी फ्यूल सरचार्ज लगा चुके
इस फैसले के साथ अकासा एयर देश की उन एयरलाइंस में शामिल हो गई है, जिन्होंने हाल में फ्यूल सरचार्ज लागू किया है। इससे पहले एयर इंडिया, एयर इंडिया एक्सप्रेस और इंडिगो भी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय टिकटों पर इसी तरह का अतिरिक्त शुल्क लगाना शुरू कर चुकी हैं।
ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी से बढ़ा किराया
कंपनी ने अपने बयान में कहा कि ईंधन की कीमतों में आई इस तेज बढ़ोतरी के कारण पूरे एविएशन सेक्टर की लागत बढ़ गई है। ऐसे में ऑपरेशनल खर्च को संतुलित करने के लिए यह कदम उठाया गया है। साथ ही एयरलाइन ने यह भी कहा कि वह आगे भी बाजार की स्थिति पर नजर रखेगी और जरूरत पड़ने पर इस फ्यूल सरचार्ज की समीक्षा करती रहेगी।
इस बीच अकासा एयर ने एक और बड़ा ऐलान किया है। एयरलाइन ने उत्तर प्रदेश में बन रहे नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के साथ रणनीतिक साझेदारी की घोषणा की है। इस साझेदारी के तहत एयरलाइन यहां एक अत्याधुनिक मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल यानी एमआरओ सुविधा स्थापित करेगी।
यह MRO केंद्र एयरपोर्ट परिसर के भीतर ही बनाया जाएगा और यहां विमानों की मरम्मत, रखरखाव और तकनीकी जांच से जुड़े कई तरह के काम किए जाएंगे। इसका उद्देश्य भारत के एविएशन इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करना और नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट को देश के प्रमुख MRO हब के रूप में विकसित करना है।
एयरलाइन के अनुसार इस प्रोजेक्ट से क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और एविएशन सेक्टर से जुड़े कौशल विकास को भी बढ़ावा मिलेगा। यह अकासा एयर की पहली एमआरओ सुविधा होगी। कंपनी की शुरुआत अगस्त 2022 में हुई थी और तब से यह तेजी से अपने नेटवर्क का विस्तार कर रही है।
नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के सीईओ क्रिस्टोफ शेनेलमैन ने कहा कि यह साझेदारी भारत की MRO क्षमता को मजबूत करेगी और क्षेत्र में रोजगार और स्किल डेवलपमेंट के अवसर भी बढ़ाएगी। वहीं अकासा एयर के फाउंडर और सीईओ विनय दुबे ने कहा कि कंपनी शुरुआती दौर से ही मजबूत ऑपरेशनल सिस्टम बनाने पर ध्यान दे रही है, ताकि भविष्य में तेजी से बढ़ते एविएशन बाजार में बेहतर तरीके से काम किया जा सके।
गौरतलब है कि 6 मार्च को डीजीसीए ने नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट को एयरोड्रोम लाइसेंस जारी किया था। इसे एयरपोर्ट से जल्द उड़ान संचालन शुरू होने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा।
(प्रियंका कुमारी)
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