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सिर्फ स्वाद बढ़ाने के लिए नहीं, सेहत का खजाना हैं मसाले; जानें असली और नकली की पहचान

नई दिल्ली, 14 मार्च (आईएएनएस)। स्वाद और सेहत का संबंध सिर्फ आहार से ही नहीं बल्कि शुद्ध आहार से भी जुड़ा है। अच्छी सेहत के लिए अच्छे आहार ही नहीं बल्कि उसमें इस्तेमाल होने वाली सही चीजों की पहचान पर भी निर्भर करती है, खासकर मसालों में।

आज के समय में प्राचीन पद्धति से पीसे गए मसालों की बजाय मिलावट से भरे मसाले बाजारों में जगह बना चुके हैं। बाज़ार में मिलने वाले मसालों में अक्सर खतरनाक मिलावट होती है, चाहे वो हल्दी में लेड क्रोमेट हो या मिर्च में ईंट का चूरा। ये सभी मसाले स्वास्थ्य के लिए जहर हैं और ऐसे में असली और नकली मसालों की पहचान रखना सभी के लिए जरूरी है।

पहले बात करते हैं धनिया पाउडर की। इसकी पहचान के लिए कांच के गिलास में पानी लें। पानी में धनिया पाउडर की दो चम्मच डालें और आधे घंटे के लिए छोड़ दें। अगर पाउडर गिलास की तली में बैठ जाता है, तो धनिया पाउडर शुद्ध है, और अगर यह ऊपर तैरता है या पानी के साथ घुलने की कोशिश करता है, तो यह अशुद्ध है।

सेंधा नमक को शुद्धि का प्रतीक माना जाता है और हर घर में सेंधा नमक का इस्तेमाल सदियों से होता आया है, लेकिन आज के समय में इसमें मिलावट की संभावना रहती है। इसके लिए आलू को बीच से काट लें और उस पर सेंधा नमक रख दें। सेंधा नमक पर कुछ बूंदे नींबू की डालें और छोड़ दें। अगर सेंधा नमक असली है तो सेंधा नमक के रंग में कोई बदलाव नहीं होगा, वहीं इसके विपरीत अगर मिलावट है तो आलू काला या नीला पड़ने लगेगा।

अब जानते हैं लाल मिर्च के बारे में। इसके लिए कांच के गिलास में पानी लें। पानी में लाल मिर्च की दो चम्मच डालें। अगर मिर्च पानी के ऊपर ही तैर रही है तो मिर्च शुद्ध है और वहीं अगर वो पानी में डूब रही है और पानी को लाल कर रही है तो समझ लीजिए की यह अशुद्ध है। वहीं काली मिर्च के पाउडर में भी मिलावट की जाने लगी है। इसकी जांच के लिए भी पानी का सहारा ले। एक गिलास पानी में काली मिर्च का पाउडर लें। अगर डूब जाए तो अशुद्ध है और पानी के ऊपर तैरने लगे तो पूर्णता शुद्ध है।

हल्दी पाउडर के बिना सब्जी का स्वाद और रंग दोनों ही प्रभावित होते हैं। ऐसे में कांच के गिलास में पानी लेकर हल्दी पाउडर डालें। शुद्ध हल्दी बिना अपना गाढ़ा रंग दिखाए धीरे-धीरे बैठने लगती है, वहीं मिलावटी हल्दी पानी में जाते ही अपना रंग छोड़ देती है और पानी में घुल जाती है। मसालों का काम सिर्फ स्वाद बढ़ाना ही नहीं, बल्कि सेहत का ध्यान भी रखना है। इसलिए स्वास्थ्य से समझौता न करें।

--आईएएनएस

पीएस/पीएम

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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जब इंटरनेट को मिला पहला कमर्शियल डोमेन नाम, ‘सिंबॉलिक्स डॉट कॉम’ से शुरू हुई डिजिटल दुनिया की दास्तान

नई दिल्ली, 14 मार्च (आईएएनएस)। आज जो हम दुनिया के एक कोने में बैठकर दूसरे कोने की कहानी पल भर में जान जाते हैं, फ्लाइट्स और समुद्र में तैरते जहाजों की स्थिति क्या है इसे एक क्लिक में जान लेते हैं, क्या कभी सोचा कि मुमकिन हुआ तो हुआ कैसे? एक डोमेन नेम से इसकी शुरुआत हुई और देखते ही देखते इंटरनेट ने दुनिया के सामने ज्ञान का पिटारा खोल दिया।

41 साल पहले इंटरनेट के इतिहास में एक अभूतपूर्व बदलाव आया, जिसने आगे चलकर पूरी दुनिया के संचार और कारोबार के तरीके बदल दिए। इसी दिन दुनिया का पहला डोमेन नाम सिंबॉलिक्स डॉट कॉम पंजीकृत हुआ। यह डोमेन अमेरिकी कंप्यूटर कंपनी सिंबॉलिक्स आईएनसी के लिए दर्ज किया गया था। इसकी यात्रा बड़ी रोचक रही।

उस समय इंटरनेट अभी शुरुआती दौर में था और मुख्य रूप से विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों तक सीमित था। डोमेन नेम सिस्टम (डीएनएस) नया-नया बना था, और उस समय कोई सर्च इंजन, ब्राउजर या ई-कॉमर्स नहीं था। यह रजिस्ट्रेशन उनके वर्कस्टेशन के लिए एक डिजिटल पहचान बनाने का एक व्यावहारिक कदम था। यह सेकंड-लेवल डॉट कॉम डोमेन था और इसने कमर्शियल इंटरनेट डोमेन युग की शुरुआत की।

हर खूबसूरत आगाज का अंजाम उतना ही जहीन हो, ये जरूरी तो नहीं! ऐसा ही कुछ सिंबॉलिक्स के लिए भी कहा जा सकता है। बदलाव की हवा बह रही थी। 1980 के दशक के आखिर में पीसी क्रांति का दौर था। लिस्प मशीन युग खत्म होने लगा। सस्ते, आम इस्तेमाल वाले कंप्यूटर और वर्कस्टेशन की पूछ होने लगी, जिससे महंगे, खास लिस्प मशीनें कमर्शियल तौर पर फायदेमंद नहीं रहीं।

मुकाबले और तकनीकी बदलावों का सामना करते हुए, सिंबॉलिक्स समस्याओं के जंजाल में फंसती चली गई। घटती मांग और मैनेजमेंट की दिक्कतों की वजह से इसका ग्राफ तेजी से नीचे गिरने लगा। जिसका नतीजा दिवालिएपन के रूप में सामने आया और मूल सिंबॉलिक्स डॉट आईएनसी 7 मई, 1996 को बंद हो गई।

2005 तक बची हुई मशीनों के लिए सर्विस कॉन्ट्रैक्ट और बाद में 2016 तक यूएस रक्षा विभाग के साथ मेंटेनेंस कॉन्ट्रैक्ट से उसे सहारा मिलता रहा। अगस्त 2009 में, इस डोमेन को एक्सएफ डॉट कॉम इंवेस्टमेंट्स (अब नैपकिन डॉट कॉम) के एरन मायरस्डेट ने खरीद लिया। लेकिन आज भी सिंबॉलिक्स की दुनिया को देखा जा सकता है। नैपकिन डॉट कॉम ने इसे एक ऑनलाइन म्यूजियम के तौर पर जिंदा रखा है।

हो भी क्यों न! आखिर डोमेन नेम सिस्टम के जरिए वेबसाइट्स को आसान पहचान देने की शुरुआत जो इससे हुई थी।

आज अरबों वेबसाइट्स की दुनिया जिस ढांचे पर खड़ी है, उसकी पहली ईंट 15 मार्च 1985 को रखी गई थी।

--आईएएनएस

केआर/

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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