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अमेरिकी विश्वविद्यालयों में चीन के प्रभाव की सीनेट कर रही है गहन जांच

वॉशिंगटन, 13 मार्च (आईएएनएस): अमेरिकी सांसदों ने चेतावनी दी कि चीन संवेदनशील शोध और तकनीक तक पहुंच पाने के लिए अमेरिकी विश्वविद्यालयों का दुरुपयोग कर सकता है। यह चेतावनी उस समय दी गई जब सीनेट की एक सुनवाई में अमेरिकी परिसरों से जुड़े विदेशी फंडिंग के अरबों डॉलर और शैक्षणिक साझेदारियों की जांच की गई।

अमेरिकी सीनेट की स्वास्थ्य, शिक्षा, श्रम और पेंशन समिति ने उच्च शिक्षा में सांसदों द्वारा बताए गए “हानिकारक विदेशी प्रभाव” की जांच के लिए एक सुनवाई आयोजित की। इस दौरान गवाही मुख्य रूप से अमेरिकी विश्वविद्यालयों के साथ चीन के शोध संबंधों व बौद्धिक संपदा की चोरी, तकनीक के हस्तांतरण तथा बिना घोषित विदेशी फंडिंग के जोखिमों पर केंद्रित रही।

समिति के अध्यक्ष सीनेटर बिल कैसिडी ने कहा कि अमेरिकी विश्वविद्यालय देश की सबसे बड़ी रणनीतिक संपत्तियों में से एक हैं, लेकिन उनकी खुली प्रकृति कमजोरियां भी पैदा कर सकती है।

उन्होंने कहा, “हमारे देश में दुनिया के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय हैं और कैंसर शोध, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सैन्य तकनीक, बायोमेडिकल इंजीनियरिंग सहित कई बड़े नवाचार हमारे विश्वविद्यालयों में ही होते हैं।”

कैसिडी ने कहा कि अमेरिकी परिसरों में आने वाली विदेशी फंडिंग के पैमाने ने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चिंताएं पैदा कर दी हैं।

उन्होंने बताया, “पिछले साल विदेशी उपहारों और अनुबंधों के रूप में 9.7 अरब डॉलर की रिपोर्ट की गई।” यह आंकड़ा केवल उन्हीं फंडों को दर्शाता है जिनकी जानकारी दी गई थी। यह केवल रिपोर्ट किए गए पैसों को ही दर्शाता है, और इसके लिए लगभग कोई जवाबदेही नहीं रही है।”

कैसिडी ने कहा कि विश्वविद्यालयों से जुड़े विदेशी उपहारों और अनुबंधों के लिए पारदर्शिता की आवश्यकताओं को कांग्रेस को और मजबूत करना होगा। उन्होंने कहा, “आपने पुरानी कहावत सुनी होगी—पैसे के पीछे चलो—और यही हम करना चाहते हैं।”

फाउंडेशन फॉर डिफेंस ऑफ डेमोक्रेसीज़ के वरिष्ठ फेलो क्रेग सिंगलटन ने पैनल को बताया कि अमेरिकी विश्वविद्यालय अमेरिका की नवाचार प्रणाली के केंद्र में हैं, इसलिए वे विदेशी प्रतिद्वंद्वियों के लिए आकर्षक लक्ष्य बन जाते हैं।

उन्होंने कहा, “अमेरिकी विश्वविद्यालय दुनिया के सबसे गतिशील शोध वातावरण का आधार हैं। इसी कारण उनकी ये ताकतें उन्हें विदेशी प्रतिद्वंद्वियों, खासकर चीन, के शोषण के लिए आकर्षक लक्ष्य भी बनाती हैं।”

सिंगलटन ने संघीय रिपोर्टिंग डेटा का हवाला देते हुए कहा कि समय के साथ चीन ने अमेरिकी विश्वविद्यालयों को उपहार और अनुबंधों के रूप में लगभग 6.8 अरब डॉलर का योगदान दिया है।

उन्होंने कहा कि शिक्षा विभाग के विदेशी फंडिंग पोर्टल में लगभग 40 करोड़ डॉलर के ऐसे लेनदेन दर्ज हैं जो उन संस्थाओं से जुड़े प्रतीत होते हैं जो अमेरिकी सरकार की निगरानी या प्रतिबंध सूची में हैं।

उन्होंने कहा, “इनमें ऐसी कंपनियां शामिल हैं जो निर्यात नियंत्रण उल्लंघन, राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं और चीन के ‘मिलिट्री-सिविल फ्यूजन’ कार्यक्रम से जुड़ी हैं।”

नेशनल एसोसिएशन ऑफ स्कॉलर्स के अध्यक्ष पीटर वुड ने कहा कि विश्वविद्यालयों को मिलने वाले विदेशी दान अक्सर पारदर्शी नहीं होते और इससे प्रभाव व उद्देश्य को लेकर सवाल उठते हैं। अमेरिकी विश्वविद्यालयों को कतर से अरबों डॉलर का बड़ा विदेशी योगदान मिला है।

वुड ने कहा, “असल में पैसा कहां से आ रहा है? इसे किस पर खर्च किया जा रहा है? कतर के मामले में तो ज्यादातर हमें पता ही नहीं है।” चीन पहले अमेरिकी परिसरों में कन्फ्यूशियस इंस्टीट्यूट्स के जरिए अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर चुका है।

उन्होंने इस कार्यक्रम को “चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की प्रचार एजेंसी हानबान द्वारा चलाया जाने वाला प्रभाव संचालन का एक माध्यम” बताया।

एशिया सोसाइटी के वरिष्ठ फेलो रॉबर्ट डेली ने कहा कि विदेशी प्रभाव को लेकर चिंताएं उचित हैं, लेकिन खतरे के पैमाने को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने से बचना चाहिए। हमारे परिसरों पर विदेशी हानिकारक प्रभाव, खासकर चीनी प्रभाव, को लेकर अमेरिकी संदेह उचित और जरूरी दोनों है।

उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों और सरकारी एजेंसियों ने सुरक्षा जोखिमों से निपटने के लिए सहयोग को मजबूत किया है। अमेरिकी विश्वविद्यालयों ने वाशिंगटन की चिंताओं को गंभीरता से लिया है और अब वे चिंता वाले देशों की गतिविधियों का अनुमान लगाने और उनका मुकाबला करने के लिए मेहनत और काफी खर्च कर रहे हैं।

डेली ने यह भी कहा कि चीनी प्रभाव को लेकर चिंताओं के बावजूद विश्वविद्यालय कर्मियों से जुड़ा जासूसी का कोई दोषसिद्ध मामला सामने नहीं आया है।

उन्होंने समिति से कहा, “अब तक अमेरिकी परिसरों में चीन की ओर से जासूसी करने के लिए किसी विश्वविद्यालय से जुड़े व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया गया है।”

सांसदों ने कहा कि नीति-निर्माताओं के सामने चुनौती यह है कि संवेदनशील शोध की रक्षा करते हुए उस खुलेपन को भी बनाए रखा जाए जिसने लंबे समय से अमेरिकी विश्वविद्यालयों को विज्ञान और नवाचार में वैश्विक नेता बनाया है।

सुनवाई में हायर एजुकेशन एक्ट की धारा 117 के तहत विदेशी उपहारों और अनुबंधों के लिए खुलासा आवश्यकताओं को मजबूत करने के प्रस्तावों पर भी चर्चा की गई। इस प्रावधान के तहत विश्वविद्यालयों को बड़े विदेशी दान की रिपोर्ट देना अनिवार्य है।

गवाहों ने कहा कि अधिक पारदर्शिता और निगरानी से राष्ट्रीय सुरक्षा जोखिमों को कम करने में मदद मिल सकती है जबकि अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक सहयोग भी बना रह सकता है।

--आईएएनएस

पीएम

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों को सुरक्षा देने के लिए पूरी तरह तैयार अमेरिका: व्हाइट हाउस

वाशिंगटन, 13 मार्च (आईएएनएस)। मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले कमर्शियल जहाजों को नौसैनिक सुरक्षा (एस्कॉर्ट) देने के लिए पूरी तरह तैयार है। संभावनाएं हैं कि इससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर बड़ा असर पड़ सकता है।

व्हाइट हाउस की डिप्टी प्रेस सेक्रेटरी अन्ना केली ने आईएएनएस को बताया, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अगर जरूरी लगा, तो होर्मुज से अमेरिकी नौसेना के एस्कॉर्ट उपलब्ध कराने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं। हमारी सेना ने 20 से अधिक निष्क्रिय माइन-बिछाने वाली नावों को नष्ट कर दिया है और आगे भी नष्ट की जाएंगी।

व्हाइट हाउस की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है, जब वाशिंगटन इस संकरे जलमार्ग से जहाजों को सुरक्षित करने के उपायों पर विचार कर रहा है, जिससे वैश्विक ऊर्जा व्यापार का एक बड़ा हिस्सा गुजरता है।

अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने कहा कि जैसे ही हालात सुरक्षित मार्ग की अनुमति देंगे, संभवतः एक अंतरराष्ट्रीय गठबंधन के साथ अमेरिकी नौसेना इस जलडमरूमध्य से जहाजों को एस्कॉर्ट करना शुरू कर सकती है। एक रिपोर्ट के अनुसार, बेसेंट ने कहा कि अमेरिका पहले से ही ऐसी आपात स्थितियों के लिए योजना बना रहा था।

उन्होंने कहा, मेरा मानना ​​है कि जैसे ही सैन्य रूप से संभव होगा, अमेरिकी नौसेना एक अंतरराष्ट्रीय गठबंधन के साथ जहाजों को इस जलडमरूमध्य से एस्कॉर्ट करेगी। बेसेंट ने आगे कहा, हमने महीनों और हफ्तों से इस स्थिति के लिए अलग-अलग परिदृश्यों का विश्लेषण किया है, जिससे यह संकेत मिलता है कि समुद्री सुरक्षा अभियानों की तैयारी पहले से ही चल रही थी।

खाड़ी क्षेत्र में जहाजों पर हुए हमलों और बढ़ती सैन्य झड़पों के कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाली शिपिंग गतिविधियां काफी धीमी हो गई हैं। ईरान और ओमान के बीच स्थित यह जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है, जहां से तेल और गैस का बड़ा व्यापार होता है।

अंतरराष्ट्रीय मीडिया के हवाले से जारी समुद्री अलर्ट के अनुसार, दुबई से लगभग 50 समुद्री मील उत्तर-पश्चिम में एक मालवाहक जहाज पर अज्ञात मिसाइल से हमला हुआ। इससे जहाज में आग लग गई और चालक दल को जहाज खाली करना पड़ा। यूनाइटेड किंगडम मैरीटाइम ट्रेड ऑपरेशंस सेंटर ने बताया कि चालक दल के सभी सदस्य सुरक्षित हैं और जांच चल रही है।

अधिकारियों ने इस क्षेत्र में काम कर रहे जहाजों को सावधानी बरतने और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की सूचना देने की सलाह दी है।

इस व्यवधान ने भारत के लिए चिंताएं भी बढ़ाई हैं, जो इस जलमार्ग से गुजरने वाली ऊर्जा शिपमेंट पर बहुत अधिक निर्भर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान से बात की और इस क्षेत्र में बिगड़ते हालात पर चर्चा की। पीएम मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट में कहा, क्षेत्र में गंभीर स्थिति पर चर्चा करने के लिए मैंने ईरानी राष्ट्रपति डॉ. मसूद पेज़ेशकियन से बातचीत की।

उन्होंने कहा, तनाव बढ़ने, आम नागरिकों की जान जाने और नागरिक इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचने पर मैंने गहरी चिंता जताई। भारतीय नागरिकों की सुरक्षा, साथ ही सामान और ऊर्जा के बिना किसी रुकावट के आवागमन की जरूरत भारत की सबसे बड़ी प्राथमिकताएं हैं। मैंने शांति और स्थिरता के प्रति भारत की प्रतिबद्धता दोहराई और बातचीत व कूटनीति का आग्रह किया।

भारतीय अधिकारियों ने बताया कि पिछले महीने संघर्ष शुरू होने के बाद से दोनों नेताओं के बीच यह पहला सीधा संपर्क था। नई दिल्ली ने हाल के दिनों में पश्चिम एशिया में अपनी कूटनीतिक पहुंच बढ़ाई है। पीएम मोदी ने ओमान, कुवैत, बहरीन, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, जॉर्डन, इजरायल और कतर समेत कई क्षेत्रीय नेताओं से बात की है।

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची के साथ समुद्री सुरक्षा पर चर्चा की है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने एक प्रेस ब्रीफिंग में कहा, भारतीय विदेश मंत्री और ईरान के विदेश मंत्री के बीच हाल के दिनों में तीन बार बातचीत हुई है। आखिरी बातचीत में शिपिंग सुरक्षा और भारत की ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई।

--आईएएनएस

डीसीएच/

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