ईरान के पास समंदर में चीन का एक जहाज आखिर क्या कर रहा है? युवांग वंग फाइव नाम के इस जहाज की मौजूदगी अमेरिका और इजराइल दोनों को बहुत ही खल रही है। अमेरिका की लाख आपत्ति और विरोध दर्ज कराने के बाद भी चीन ने इस जहाज की लोकेशन को बिल्कुल नहीं बदला। चीनी इस जहाज का नाम है युवान बैंग फाइव। चीन इसे एक साधारण रिसर्च वेसल बताता है। लेकिन कई देशों के लिए यह सिर्फ रिसर्च जहाज नहीं है बल्कि एक हाईटेक स्पाईशिप है। और सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि यह जहाज श्रीलंका क्यों जा रहा है? सवाल बड़ा है कि क्या चीन हिंद महासागर में अपनी रणनीतिक ताकत बढ़ाकर अपने सहयोगियों को खासकर कि ईरान को अप्रत्यक्ष सैन्य और तकनीकी सपोर्ट देने की कोशिश कर रहा है। सबसे पहले आपको बताते हैं कि यह पूरा विवाद आखिर शुरू कैसे हुआ। तो दरअसल चीनी जहाज युवान बैंग फाइव को श्रीलंका के हमेंडोटा पोर्ट पर रुकना था। पहले इसकी एंट्री को टाल दिया गया था क्योंकि भारत ने सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता जताई। लेकिन बाद में श्रीलंका सरकार ने इसे 16 से 22 अगस्त तक बंदरगाह पर आने की अनुमति दे दी। श्रीलंका के हार्बर मास्टर निर्मल पी सिलवा ने यह साफ कह दिया है कि विदेश मंत्रालय से आधिकारिक क्लीयरेंस मिल चुका है और जहाज के लिए पोर्ट पर जरूरी व्यवस्थाएं की जाएंगी।
दूसरा सवाल यह उठता है कि आखिर जहाज इतना बता दें कि आधिकारिक तौर पर युवान वंग फाइव को एक रिसर्च और सर्वे वेसल बताया जाता है। लेकिन कई रक्षा एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह एक ड्यूल यूज़ प्लेटफार्म है। यानी इसका इस्तेमाल वैज्ञानिक रिसर्च के साथ-साथ सैन्य निगरानी के लिए भी करते हैं। कुछ सरकारी सूत्रों के मुताबिक यह जहाज सेटेलाइट ट्रैकिंग, स्पेस मॉनिटरिंग और तो और इंटरकॉन्टिनेंटल बैलस्टिक मिसाइल लॉन्चेस के लिए गतिविधियों पर नजर रखने के लिए किया जाता है। यही कारण है कि भारत इसे सिर्फ एक रिसर्च मिशन नहीं मानता। हालांकि हैंबनटोटा पोर्ट की स्ट्रेटेजिकेंस जिस बंदरगाह पर यह जहाज रुकने वाला है वो खुद एक बड़ा रणनीतिक मुद्दा है। दरअसल हैबनटोटा पोर्ट को श्रीलंका ने चीन को 99 साल की लीज़ पर दिया था। यह वही पोर्ट है जिसे बनाने के लिए श्रीलंका ने चीन से भारी कर्ज लिया था।
आर्थिक संकट गहराने के बाद जब कर्ज चुकाने की मुश्किल आई तो आखिरकार यह बंदरगाह चीन के नियंत्रण में चला गया था। इससे हिंद महासागर में चीन को एक स्थाई स्ट्रेटेजिक फुट होल्ड मिल गया था। हालांकि भारत के लिए चिंता का विषय इसलिए भी है क्योंकि भारत लंबे समय से हिंद महासागर को अपने स्ट्रेटेजिक इन्फ्लुएंस ज़ोन के रूप में देखता आया है। लेकिन चीन की यह बढ़ती मौजूदगी चाहे वो बंदरगाह निवेश हो, नौसैनिक गतिविधियां हो या फिर ऐसे निगरानी जहाज नई दिल्ली के लिए चिंता का कारण बन रहे हैं। भारत के विदेश मंत्रालय ने साफ कह दिया है कि वह इस जहाज की गतिविधियों पर करीबी से नजर रख रहा है और अपनी सिक्योरिटी और तो और इसके साथ ही इकोनॉमिक इंटरेस्ट की रक्षा के लिए भी जरूरी कदम उठाएगा। लेकिन चीन ईरान का साथ आखिर दे क्यों रहा है? क्या है चीन और ईरान का बड़ा समीकरण? अब यहां एक बड़ा जियोपॉलिटिकल एंगल सामने आता है।
दरअसल चीन और ईरान के बीच पिछले कई सालों में ऊर्जा, रक्षा और रणनीतिक सहयोग तेजी से बढ़े हैं। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच चीन का हिंद महासागर में अपनी सर्विलेंस कैपेसिटी और कैपेबिलिटी बढ़ाना ईरान के लिए भी फायदेमंद हो सकता है। अगर चीन इस क्षेत्र में बेहतर निगरानी नेटवर्क बढ़ाता है तो इससे उसके सहयोगी देशों को भी रणनीतिक जानकारी और समर्थन मिल सकता है। यानी यह सिर्फ समुद्री रिसर्च नहीं बल्कि यह एक व्यापक स्ट्रेटेजिक अलाइनमेंट का हिस्सा भी हो सकता है। तो सवाल सिर्फ एक जहाज के श्रीलंका पहुंचने का नहीं है। यह कहानी है हिंद महासागर में बढ़ती ताकत की राजनीति की जहां चीन अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है। भारत सतर्क नजर बनाए हुए है और मिडिल ईस्ट की उथल-पुथल इस पूरे समीकरण को और जटिल बना रही है। आने वाले समय में यह साफ हो जाएगा युवांग वंग फाइव सिर्फ एक रिसर्च मिशन है या फिर हिंद महासागर में शुरू हो चुके एक बड़े जियोपॉलिटिकल चेस गेम की चाल।
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पिछले हफ्ते इजराइल ने ईरान के सबसे बड़े तेल डिपो को तबाह कर दिया था। ईरान के तेल कारोबार के लिए यह इतना बड़ा नुकसान था कि उसने पलटवार में सबसे बड़ा टारगेट अमेरिका, इजराइल और इसके सहयोगी अरब देशों के तेल ठिकानों को बनाने लगा। ईरानी सेना ने हमलों के साथ यह दावा साबित कर दिया कि अगर उसके ऊर्जा ठिकानों को निशाना बनाया गया तो वह पूरी दुनिया को तेल के लिए तरसा देगा। जिस तरह हमारे मुल्क के सबसे पुराने बैंक पर बमबारी की गई है। उसमें काम कर रहे सैकड़ों लोग मारे गए। अब हम इसका बदला लेंगे। ठीक वैसे ही जैसे हमारे बैंक को निशाना बनाया गया। ईरानी विदेश मंत्री के इस बयान के बाद इजराइल से लेकर सऊदी अरब तक के सेंट्रल बैंक की सुरक्षा बढ़ा दी गई। क्योंकि ईरान अपने बैंक के खजाने और स्टाफ के खात्मे के बाद से तिल मिलाया हुआ है।
खासकर तब जब उसने ऊर्जा, बैंकिंग और कम्युनिकेशन सिस्टम को निशाना नहीं बनाने की अपील की थी। अब ईरान बैंक पर बमबारी का बदला लेगा। तो सोचिए पूरे मिडिल ईस्ट में कैसा मंजर होगा और सिर्फ बैंक ही क्यों? ईरान की हिट लिस्ट में वो तमाम अमेरिकी टेक कंपनियां भी हैं जो मिडिल ईस्ट के अलग-अलग देशों में हैं। ईरान का कहना है कि ये टेक कंपनियां ना सिर्फ ईरानी सेना की मूवमेंट पर नजर रख रही हैं बल्कि ईरान के खिलाफ जंग में अमेरिकी सेना का सपोर्ट कर रही हैं। ईरान का कहना है कि अगर क्षेत्रीय युद्ध और फैलता है तो Google, Amazon, Microsoft और एनवीडिया जैसी अमेरिकी कंपनियों के दफ्तर और टेक इंफ्रास्ट्रक्चर भी हम लोग के दायरे में आ सकते हैं।
ईरान का आरोप है कि इन कंपनियों की क्लाउड और टेक सेवाओं का इस्तेमाल सैन्य ऑपरेशन में किया जा रहा है। इन कंपनियों के कई दफ्तर और टेक इंफ्रास्ट्रक्चर इजराइल के अलग-अलग शहरों में मौजूद हैं। इसके अलावा खाड़ी क्षेत्र के कुछ देशों में भी इन कंपनियों के डाटा सेंटर और टेक सुविधाएं स्थित है। ईरान का दावा है कि अगर युद्ध इंफ्रास्ट्रक्चर स्तर पर पहुंचता है तो इन ठिकानों पर हमले हो सकते हैं।
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