जरूरत की खबर- आंखों की रोशनी कैसे बढ़ाएं:रेगुलर करें ये 8 आई एक्सरसाइज, डाइट में शामिल करें ये हेल्दी चीजें, न करें 8 गलतियां
मौजूदा वक्त में मोबाइल, लैपटॉप और टीवी हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा हैं। ये चीजें जिंदगी में इस कदर हावी हो गई हैं कि हम अपनी नींद भी पूरी नहीं कर पाते हैं। इसका सीधा असर आंखों पर पड़ता है। नतीजतन आंखों की रोशनी कम हो रही है। उम्र के साथ नजर कमजोर होना कॉमन है, लेकिन बच्चों और युवाओं में ये समस्या चिंता का विषय है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या आंखों की रोशनी फिर से बढ़ सकती है। क्या इसका कोई नेचुरल तरीका हो सकता है। इसलिए आज ‘जरूरत की खबर’ में ‘विजन हेल्थ’ की बात करेंगे। साथ ही जानेंगे कि- एक्सपर्ट: डॉ. दिग्विजय सिंह, कंसल्टेंट, ऑप्थेल्मोलॉजी, धर्मशिला नारायणा सुपरस्पेशिलिटी हॉस्पिटल, दिल्ली सवाल- उम्र के साथ स्वाभाविक ढंग से आंखों की रोशनी कम होती है। लेकिन क्या उम्र के अलावा खराब लाइफस्टाइल और आदतों से भी आंखों की रोशनी कमजोर हो सकती है? जवाब- एजिंग के अलावा खराब लाइफस्टाइल भी आंखों की रोशनी को प्रभावित करती है। जैसेकि– इन सभी खराब आदतों के कारण नजरें कमजोर हो सकती हैं, ग्राफिक में देखिए- सवाल- क्या आंखों की रोशनी बढ़ाई भी जा सकती है? जवाब- आंखों की रोशनी पूरी तरह बढ़ाना संभव नहीं है, लेकिन इसे बेहतर किया जा सकता है। हेल्दी और संतुलित डाइट आंखों को सपोर्ट करती है। साथ सही लाइफस्टाइल से आंखों की रोशनी को लंबे समय तक हेल्दी रखा जा सकता है। सवाल- आंखों की रोशनी बढ़ाने के लिए क्या करना चाहिए? जवाब- इसके लिए हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाना सबसे जरूरी है, जैसेकि- सवाल- आंखों की रोशनी बढ़ाने के लिए कौन-सी एक्सरसाइज करनी चाहिए? जवाब- आंखों की एक्सरसाइज करने से आई-मसल्स रिलैक्स होती हैं और तनाव कम होता है। हालांकि, एक्सरसाइज से आंखों की रोशनी पूरी तरह नहीं लौटती, लेकिन आई स्ट्रेन और थकान जरूर कम होती है। सभी एक्सरसाइज ग्राफिक में देखिए- सवाल- आंखों की रोशनी बढ़ाने के लिए हमारी डाइट कैसी होनी चाहिए? जवाब- आई हेल्थ के लिए विटामिन A, C, E, जिंक और ओमेगा-3 फैटी एसिड बेहद महत्वपूर्ण हैं। डिटेल पॉइंटर्स से समझें- डिटेल फूड चार्ट ग्राफिक में देखिए- सवाल- किन विटामिन्स की कमी से आंखों की रोशनी कमजोर होती है? उन विटामिन्स को फूड में कैसे शामिल करें? जवाब- इसके लिए कई विटामिन जरूरी होते हैं- सवाल- क्या आंखों की रोशनी बढ़ाने के लिए सप्लीमेंट्स लेना सही है? जवाब- अगर डाइट संतुलित है, तो आमतौर पर सप्लीमेंट्स की जरूरत नहीं होती है। कुछ मामलों में डॉक्टर विटामिन और मिनरल्स के लिए सप्लीमेंट लेने की सलाह दे सकते हैं। लेकिन याद रखें– सवाल- आंखों को हेल्दी रखने के लिए फूड के अलावा लाइफस्टाइल में और कौन से बदलाव करने चाहिए? क्या गलतियां नहीं करनी चाहिए? जवाब- इसके लिए लाइफस्टाइल में ये जरूरी बदलाव करें- ग्राफिक में देखिए, किस तरह की गलतियां नहीं करनी चाहिए- आंखों की रोशनी से जुड़े कुछ कॉमन सवाल-जवाब सवाल- किन बीमारियों के कारण आई-साइट कमजोर हो सकती है? जवाब- डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर से आंखों की नर्व्स और रेटिना को नुकसान हो सकता है। इन बीमारियों में समय पर इलाज और नियमित आई-चेकअप न हो तो नजर कमजोर हो सकती है। सवाल- क्या चश्मा लगाने से आंखें ज्यादा कमजोर होती हैं? जवाब- चश्मा लगाने से आंखें कमजोर नहीं होतीं, बल्कि साफ देखने में मदद मिलती है। गलत नंबर का चश्मा या जरूरत होने पर भी चश्मा न पहनने से आंखों पर ज्यादा जोर पड़ता है। इससे आंखें कमजोर हो सकती हैं। सवाल- क्या कॉन्टेक्ट लेंस लगाने से नजर कमजोर हो सकती है? जवाब- आमतौर पर कॉन्टेक्ट लेंस चश्मे की तरह साफ देखने में मदद करते हैं। लेकिन अगर लेंस साफ न रखा जाए तो आंखों में इन्फेक्शन और जलन का कारण बन सकता है। सवाल- क्या जेनेटिक कारणों से नजर कमजोर हो सकती है? जवाब- ग्लूकोमा या मैक्युलर डिजेनरेशन जैसी समस्याएं जेनेटिक हो सकती हैं। इसलिए अगर परिवार में किसी को ऐसी समस्या है, तो नियमित आई-चेकअप जरूरी है। ……………… ये खबर भी पढ़िए जरूरत की खबर- क्या है ‘EAT लैंसेट’ डाइट: किडनी डिजीज का रिस्क कम करने में मददगार, 9 हेल्थ बेनिफिट्स, जानें किन्हें नहीं खाना चाहिए कैनेडियन मेडिकल एसोसिएशन जर्नल में पब्लिश एक स्टडी के मुताबिक, ये डाइट क्रॉनिक किडनी डिजीज के रिस्क को काफी हद तक कम कर सकती है। भारत में हार्ट डिजीज के बाद क्रॉनिक किडनी डिजीज दूसरी सबसे बड़ी बीमारी बन चुकी है। हेल्थ जर्नल ‘द लैंसेट’ में पब्लिश एक ग्लोबल स्टडी के मुताबिक, साल 2023 में भारत में करीब 13.8 करोड़ लोग क्रॉनिक किडनी डिजीज से पीड़ित थे। आगे पढ़िए…
पेरेंटिंग- बेटा मैथ्स से बहुत डरता है:हर टेस्ट से पहले उसका पेट दर्द करने लगता है, उसका ये गणित का डर कैसे दूर करूं?
सवाल- मैं उत्तर प्रदेश से हूं। मेरा 11 साल का बेटा छठवीं क्लास में पढ़ता है। वह पढ़ाई में अच्छा है, लेकिन मैथ्स से बहुत डरता है। कहता है, मैथ समझ में नहीं आती है। हमेशा मैथ टेस्ट से पहले उसे पेट दर्द, घबराहट होने लगती है। एक मां के रूप में मैं उसे कैसे समझाऊं, कैसे सपोर्ट करूं कि उसका डर कम हो और आत्मविश्वास बढ़े? एक्सपर्ट: डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर जवाब- सवाल पूछने के लिए शुक्रिया। अच्छी बात यह है कि आपका बेटा अन्य विषयों में अच्छा है। इसका मतलब है कि उसकी सीखने की क्षमता अच्छी है। समस्या केवल मैथ्स को लेकर बने डर की है। साइकोलॉजी में इसे ‘मैथ एंग्जाइटी’ कहते हैं। दरअसल इस उम्र में बच्चों पर ग्रेड्स, टेस्ट और परफॉर्मेंस का दबाव बढ़ने लगता है। ऐसे में अगर किसी कारण से बच्चे को कोई विषय कठिन लगता है तो ये धीरे-धीरे उसके कॉन्फिडेंस को भी प्रभावित करता है। यही वजह है कि आपका बेटा टेस्ट से पहले पेट दर्द व घबराहट जैसे लक्षण महसूस कर रहा है। मैथ एंग्जाइटी के कारणों को करें आइडेंटिफाई जब बच्चा पढ़ाई से बचने के लिए बहाने बनाता है तो उसके पीछे कोई-न-कोई कारण छिपा होता है। ऐसे में समस्या का हल जानने से पहले उस कारण को आइडेंटिफाई करना जरूरी है। जब तक यह क्लीयर नहीं होगा कि उसे किस बात से सबसे ज्यादा डर लग रहा है, तब तक सही समाधान मिलना मुश्किल है। बच्चे की बहानेबाजी या डर के पीछे कई कारण हो सकते हैं। ग्राफिक में देखिए- ग्राफिक में दिए कारणों से समझें कि आखिर आपके बेटे के डर और एंग्जाइटी के पीछे कौन-सी वजहें हो सकती हैं। आइए, अब इसके आधार पर बच्चे की मैथ एंग्जाइटी के समाधान पर बात करते हैं। बच्चों में मैथ के प्रति इंटरेस्ट कैसे जगाएं? याद रखिए, बच्चों को अगर कोई भी चीज सिखानी है तो वह मजेदार होनी चाहिए। बच्चों को जो चीजें मजेदार लगती हैं, उसे वे इंटरेस्ट के साथ पढ़ते व समझते हैं। वहीं दबाव और जबरदस्ती करने से बच्चे उससे दूर भागते हैं। इसके लिए कुछ बातों का खास ख्याल रखें। आइए अब इन पॉइंट्स के बारे में थोड़ा विस्तार से बात करते हैं। मैथ को मजेदार बनाएं मैथ्स को बोरिंग बनाने के बजाय एक 'गेम' की तरह पेश करें। जब बच्चा इसे ‘टेस्ट का विषय’ मानता है तो डर बढ़ता है। लेकिन जब वही चीज गेम, क्विज या चैलेंज बन जाती है तो बच्चे का नजरिया बदलता है। इसके लिए आप घर पर टाइमर लगाकर 5 सवाल हल करने का छोटा गेम बना सकती हैं या सही जवाब पर स्टार सिस्टम रख सकती हैं। इससे बच्चा मैथ को बोझ नहीं, मजेदार एक्टिविटी के रूप में देखेगा। मैथ को रियल लाइफ से जोड़ें बच्चा जब तक यह नहीं समझेगा कि वह मैथ्स क्यों पढ़ रहा है, तब तक उसे इसमें दिलचस्पी नहीं आएगी। उसे बताएं कि मैथ कैसे हमारे रोजमर्रा के जीवन से जुड़ा हुआ है। इसके लिए उसे साथ बाजार ले जाएं और छोटे-छोटे हिसाब कराएं। इससे बच्चा मैथ का महत्व समझेगा। बच्चा तब तेजी से सीखता है, जब उसे समझ आता है कि मैथ रोजमर्रा की जिंदगी में काम आती है। बाजार में खरीदारी करते समय उसे बिल जोड़ने दें, जेब खर्च में बचत का हिसाब खुद करने दें। खेल के मैदान में स्कोर, टाइम और डिस्टेंस की काउंटिंग कराएं। जब उसे महसूस होगा कि मैथ ‘जिंदगी का हिस्सा’ है, तो उसका जुड़ाव अपने-आप बढ़ेगा। प्रेशर बिल्कुल न डालें और छोटे गोल सेट करें एक साथ पूरे सवाल खत्म करने का दबाव न बनाएं। उसे कहें, "आज हम सिर्फ 2 सवाल करेंगे, लेकिन उसे अच्छे से समझेंगे।" जब बच्चा छोटा लक्ष्य हासिल करता है, तो उसके ब्रेन में डोपामिन (हैप्पी हॉर्मोन) रिलीज होता है, जिससे उसका आत्मविश्वास बढ़ता है। याद रखें, धीमी लेकिन निरंतर गति पहाड़ जैसे सिलेबस को भी छोटा कर देती है। रिजल्ट नहीं, एफर्ट पर फोकस करें अक्सर हम बच्चे की तारीफ तभी करते हैं, जब उसके 10 में से 10 नंबर आते हैं। ऐसा न करके उसकी हर छोटी–छोटी कोशिश की तारीफ करें। अगर उसने एक कठिन सवाल को हल करने में 15 मिनट मेहनत की, भले ही उत्तर गलत आया हो, तो कहें, "मुझे खुशी है कि तुमने हार नहीं मानी और इसे हल करने का पूरा प्रयास किया।" इससे उसका 'फेल होने का डर' खत्म होगा। गलतियों को सीखने का हिस्सा बताएं जब वह गलती करे, तो उसे डांटने के बजाय कहें, ‘’कोई बात नहीं, हम गलतियों से ही सीखते हैं।’’ जब हम गलतियों को 'नॉर्मलाइज' कर देते हैं, तो बच्चा क्लास में सवाल पूछने से नहीं डरता है। विजुअल मेथड का इस्तेमाल करें आजकल यूट्यूब पर कई ऐसे चैनल्स हैं, जो एनिमेशन के जरिए मैथ समझाते-सिखाते हैं। साथ में बैठकर इसे बच्चे को दिखाएं। जो चीज दिखती है, वह जल्दी समझ में आती है। टीचर से मिलकर बात करें चूंकि बच्चा क्लास में बैठने से डर रहा है, इसलिए स्कूल का माहौल भी ठीक होना जरूरी है। इसके लिए टीचर से मिलें और उन्हें बताएं कि बच्चा 'मैथ एंग्जाइटी' से जूझ रहा है। उनसे कहें कि वे क्लास में उसे प्रोत्साहित करें और अचानक सबके सामने सवाल पूछकर उसे असहज न करें। टीचर बच्चे का डर आधा कर सकता है। जरूरत पड़ने पर ट्यूटर रखें कई बार स्कूल टीचर से बच्चे डरते हैं। इसके लिए एक शांत और इंटेलिजेंट ट्यूटर की मदद लें। ट्यूटर ऐसा होना चाहिए, जो सिलेबस पूरा करवाने के बजाय बच्चे के 'बेसिक्स' और 'कॉन्फिडेंस' पर काम करे। कभी-कभी बच्चे अपनों के बजाय किसी तीसरे व्यक्ति से ज्यादा शांति से सीखते हैं। मैथ्स को 'इंटेलिजेंस' का पैमाना न बनाएं अगर आपका बेटा बाकी विषयों में अच्छा है, तो इसका मतलब है कि वह होनहार है। हर बच्चे का दिमाग अलग होता है। कोई साइंस में अच्छा होता है तो कोई आर्ट में। जरूरी नहीं कि हर बच्चा 'मैथ्स जीनियस' ही बने। उसे यह भरोसा दिलाएं कि गणित में औसत रहना कोई अपराध नहीं है। जब उसके सिर से 'परफेक्ट' होने का बोझ उतरेगा तो उसका डर अपने आप कम होने लगेगा और वह रिलैक्स होकर सीखना शुरू कर देगा। अंत में यही कहूंगी कि एक मां के तौर पर आपका सबसे बड़ा काम उसे यह भरोसा दिलाना है कि अभ्यास से सबकुछ संभव है। जब उसे घर पर 'सेफ जोन' मिलेगा तो वह मैथ के डर से भी लड़ना सीख जाएगा। याद रखें, मैथ का डर एक दिन में नहीं बनता और एक दिन में खत्म भी नहीं होता है। लेकिन धैर्य, सकारात्मक माहौल और निरंतर सपोर्ट से बच्चे में धीरे-धीरे आत्मविश्वास वापस आ सकता है। ………………….. पेरेंटिंग से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए पेरेंटिंग- 6 साल का बेटा खूब तेज, होनहार है: लेकिन लोगों के सामने एकदम चुुप, बात ही नहीं करता, उसका ये शर्मीलापन कैसे दूर करूं? अक्सर पेरेंट्स मेहमानों के सामने बच्चे की प्रतिभा का प्रदर्शन करके 'गुड पेरेंटिंग' का सर्टिफिकेट चाहते हैं। वे चाहते हैं कि लोग कहें, "वाह! आपका बच्चा कितना टैलेंटेड है।" लेकिन इस दिखावे की दौड़ में हम यह भूल जाते हैं कि बच्चा कोई 'परफॉर्मिंग आर्टिस्ट' नहीं है। पूरी खबर पढ़िए…
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