6जी तकनीक 2040 तक वैश्विक अर्थव्यवस्था में 1.24 ट्रिलियन डॉलर का योगदान कर सकती है: उद्योग जगत
नई दिल्ली, 5 नवंबर (आईएएनएस)। छठी पीढ़ी की मोबाइल संचार तकनीक यानी 6जी वर्ष 2040 तक वैश्विक अर्थव्यवस्था में 1.24 ट्रिलियन डॉलर का अतिरिक्त योगदान कर सकती है। हालांकि यदि सरकारें पर्याप्त स्पेक्ट्रम उपलब्ध नहीं कराती हैं तो इस संभावित आर्थिक लाभ का बड़ा हिस्सा जोखिम में पड़ सकता है। यह जानकारी गुरुवार को उद्योग संगठन जीएसएमए की एक रिपोर्ट में दी गई।
रिपोर्ट के अनुसार, अगली पीढ़ी के मोबाइल नेटवर्क आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), औद्योगिक स्वचालन, इमर्सिव डिजिटल सेवाओं और उन्नत कनेक्टिविटी के माध्यम से 2040 तक वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में लगभग 0.7 प्रतिशत के बराबर योगदान दे सकते हैं।
हालांकि रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि बड़े पैमाने पर 6जी नेटवर्क तैनाती के लिए पर्याप्त स्पेक्ट्रम उपलब्ध नहीं कराया गया, तो अनुमानित आर्थिक मूल्य का करीब 42 प्रतिशत, यानी लगभग 520 अरब डॉलर, हासिल नहीं हो सकेगा।
जीएसएमए के मुख्य नियामक अधिकारी जॉन जिउस्ती ने कहा कि आने वाले कुछ वर्षों में स्पेक्ट्रम नीति से जुड़े फैसले यह तय करेंगे कि 6जी तकनीक से मिलने वाली आर्थिक संभावनाओं का कितना लाभ वास्तव में प्राप्त किया जा सकेगा।
रिपोर्ट के अनुसार, 6जी से सबसे अधिक लाभ विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) और वित्तीय सेवाओं क्षेत्रों को मिलने की संभावना है। अनुमान है कि कुल आर्थिक योगदान में मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की हिस्सेदारी 20 प्रतिशत और वित्तीय सेवाओं की 19 प्रतिशत होगी। इसके अलावा निर्माण क्षेत्र 13 प्रतिशत और सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) क्षेत्र 12 प्रतिशत योगदान दे सकता है।
यह रिपोर्ट 2027 में आयोजित होने वाले विश्व रेडियो संचार सम्मेलन से पहले जारी की गई है। इस सम्मेलन में उभरती तकनीकों के लिए भविष्य के स्पेक्ट्रम आवंटन पर महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय निर्णय लिए जाने की उम्मीद है।
जीएसएमए का कहना है कि 6जी तकनीक पिछले मोबाइल नेटवर्क संस्करणों से काफी अलग होगी। इसका विकास एआई केंद्रित क्षमताओं के आधार पर किया जा रहा है, जिससे नेटवर्क बुद्धिमान निर्णय लेने, एकीकृत सेंसिंग कार्यों और स्थलीय तथा उपग्रह-आधारित नेटवर्कों के बीच सहज कनेक्टिविटी प्रदान करने में सक्षम होंगे।
रिपोर्ट में बताया गया है कि एआई-आधारित कनेक्टिविटी, औद्योगिक रोबोटिक्स, उन्नत ब्रॉडबैंड सेवाएं, एकीकृत सेंसिंग तकनीकें और गैर-स्थलीय नेटवर्क भविष्य की आर्थिक वृद्धि के प्रमुख चालक होंगे।
स्पेक्ट्रम के संदर्भ में रिपोर्ट ने मिड-बैंड स्पेक्ट्रम को सबसे महत्वपूर्ण बताया है। अनुमान है कि 6जी से होने वाले कुल आर्थिक लाभ में इसकी हिस्सेदारी लगभग 70 प्रतिशत होगी। वहीं लो-बैंड स्पेक्ट्रम ग्रामीण क्षेत्रों, इनडोर लोकेशन और कम सेवा प्राप्त इलाकों तक पहुंच बढ़ाने में मदद करेगा और कुल आर्थिक योगदान में लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा देगा।
जीएसएमए ने सरकारों से आग्रह किया है कि 2030 तक कम से कम 2 गीगाहर्ट्ज़ मिड-बैंड स्पेक्ट्रम उपलब्ध कराया जाए, जिसमें ऊपरी 6 गीगाहर्ट्ज बैंड का कुछ हिस्सा भी शामिल हो। साथ ही 600 मेगाहर्ट्ज बैंड को भी उपलब्ध कराने की सिफारिश की गई है, ताकि कवरेज बढ़ाई जा सके और अधिक कनेक्टेड डिवाइसों को समर्थन दिया जा सके।
उद्योग संगठन ने नियामकों से स्पष्ट राष्ट्रीय स्पेक्ट्रम रोडमैप तैयार करने की भी मांग की है, जिससे दूरसंचार कंपनियों को भविष्य के नेटवर्क विस्तार और निवेश योजनाओं के लिए आवश्यक नीति स्थिरता मिल सके।
--आईएएनएस
डीबीपी
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धनतेरसः धन की पूजा नहीं, धन के शुद्ध संस्कारों का पर्व
पंच पर्वों से जुड़े दीपावली महापर्व का दूसरा महत्वपूर्ण पर्व है धनतेरस। धनतेरस के दिन भगवान धनवंतरी और मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है और इस दिन खरीदारी और दान-पुण्य करना भी शुभ माना जाता है। इस दिन को धन त्रयोदशी और धन्वंतरि जयंती के नाम से भी जाना जाता है। धनतेरस केवल दीपावली के आरंभ का पर्व नहीं, बल्कि धन के प्रति हमारी दृष्टि को परखने का अवसर है। यह वह दिन है जब भारतीय संस्कृति धन की पूजा के साथ मनुष्य को यह स्मरण कराती है कि धन साधन है, साध्य नहीं, समृद्धि जीवन का अलंकार है, जीवन का आधार नहीं। दुर्भाग्य यह है कि आधुनिक समय में धन की परिभाषा इतनी संकुचित हो गई है कि धन का अर्थ संवेदना, सदाचार और संतोष से नहीं, बल्कि संग्रह, सुविधा, प्रतिष्ठा और शक्ति से जोड़ा जाने लगा है। आज दुनिया में आर्थिक समृद्धि बढ़ी है, लेकिन क्या उसी अनुपात में मनुष्य समृद्ध हुआ है? चंद हाथों में सिमटती संपदा और बढ़ती आर्थिक विषमता ने समाज में एक विचित्र असुरक्षा पैदा की है। भौतिक सुविधाएं बढ़ी हैं, पर विश्वास घटा है। साधन बढ़े हैं, लेकिन साधना कमजोर हुई है। घर बड़े हुए, मगर हृदय छोटे होते गए। परिणामतः हिंसा, छल, भ्रष्टाचार, चोरी, शोषण, दुराचार और असीम संग्रह जैसी प्रवृत्तियां केवल समाज में नहीं, हमारे भीतर भी जगह बनाने लगी हैं। चेहरों की पहचान बची है, लेकिन चरित्र की पहचान धुंधली पड़ रही है।
धनतेरस का वास्तविक संदेश इसी विसंगति को दूर करने में छिपा है। धन का विरोध भारतीय चिंतन कभी नहीं करता, वह धन के अंधे संग्रह और उसके अनुचित उपयोग का विरोध करता है। सनातन दृष्टि में लक्ष्मी तभी मंगलकारी है, जब वह धर्म और लोकमंगल से जुड़ी हो। भगवान महावीर का अपरिग्रह हमें बताते हैं कि आवश्यकता से अधिक संग्रह अंततः मनुष्य को वस्तुओं का स्वामी नहीं, वस्तुओं का दास बना देता है। जैन दर्शन का संयम और अल्पीकरण केवल साधु जीवन की साधना नहीं, बल्कि गृहस्थ जीवन के लिए भी एक महत्वपूर्ण जीवन-दृष्टि है। महात्मा गांधी ने धन के इसी प्रश्न को ट्रस्टीशिप के सिद्धांत से जोड़ा। उनके लिए संपत्ति का अधिकार केवल निजी उपभोग का अधिकार नहीं था, बल्कि समाज के प्रति उत्तरदायित्व भी था। धन हमारे पास हो सकता है, लेकिन उसका अंतिम अर्थ तभी है जब उससे किसी और के जीवन में आशा, सम्मान और अवसर पैदा हों। इसलिए प्रश्न यह नहीं कि हमारे पास कितना धन है, प्रश्न यह है कि हमारे धन का हमारे चरित्र पर कितना अधिकार है और हमारे धन से समाज को कितना अधिकार मिलता है।
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धनतेरस धन की कामना का पर्व है। इस दृष्टि से यह अर्थव्यवस्था का पर्व है। अर्थ से अर्थ-व्यवस्था का सम्यक् एवं गुणात्मक संधान। इस दिन घर एवं बाजारों में आशा के दीप सजते हैं, मुद्रा का आदान-प्रदान होता है। मान्यता है कि इस दिन खरीदी गई चीजों में कई गुना वृद्धि हो जाती है। शास्त्रों में बताया गया है कि इस दिन कुछ उपाय करने से घर में धन-धान्य के भंडार भर जाते हैं और मां लक्ष्मी की कृपा सदैव बनी रहती है। तम मिटाती धनतेरस और प्रकाश बांटती लक्ष्मी यानी भारतीय पद्धति के अनुसार प्रत्येक आराधना, उपासना व अर्चना में आधिभौतिक, आध्यात्मिक और आधिदैविक इन तीनों रूपों का समन्वित व्यवहार होता है। इस तरह इस उत्सव में उपरोक्त तीनों प्रकार से लक्ष्मी की उपासना यानी धन एवं सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति के जनक धन्वंतरि देव समुद्र मंथन से प्रकट हुए थे और प्रकट होते समय उनके हाथ में अमृत से भरा कलश था। यही कारण है कि इस दिन बर्तन खरीदे जाते हैं। हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, धन संपदा की देवी मां लक्ष्मी धनतेरस के दिन ही समुद्र मंथन के दौरान प्रकट हुईं थीं इसीलिए ऐसा माना जाता है कि इस दिन सोना-चांदी घर लाने से मां लक्ष्मी प्रसन्न होती है, घर में सुख-शांति, समृद्धि एवं खुशहाली आती है और अच्छा भाग्य भी घर लाते हैं। सोना खरीदने से बुरी शक्तियां और नकारात्मक ऊर्जा घर से दूर होती है। कई परिवार इस दिन सोना-चांदी खरीदकर अपनी सैकड़ों साल पुरानी परंपरा का पालन करते हुए इस दिन दिव्यता एवं धन की देवी लक्ष्मी देवी की पूजा करते हैं।
लक्ष्मीजी का स्वरूप त्रिगुणात्मक है। उनका वास तन, मन और धन तीनों में है। पांच प्रकार के सुख कहे गये हैं- तन, मन, धन, पत्नी और संतान। देवी भगवती कमला यानी लक्ष्मीजी के आठ रूप कहे गये हैं। आद्य लक्ष्मी या महालक्ष्मी (कन्या), धन लक्ष्मी (धन, वैभव, निवेश, अर्थव्यवस्था), धान्य लक्ष्मी (अन्न), गजलक्ष्मी (पशु व प्राकृतिक धन), सनातना लक्ष्मी (सौभाग्य, स्वास्थ्य, आयु व समृद्धि), वीरा लक्ष्मी (वीरोचित लक्ष्मी अर्थात रक्षा, सुरक्षा), विजया लक्ष्मी (दिगदिगंत विजय), विद्या लक्ष्मी (विद्या, ज्ञान, कला विज्ञान), इन आठों स्वरूपों को मिलाकर महालक्ष्मी का पर्व बना दिवाली। दिवाली अर्थात दीप पर्व। जहां इन आठों स्वरूपों का प्रकाश हो, वहां दिवाली निश्चित रूप से होती है। प्रकाश, पुष्टि, प्रगति की प्रार्थना के साथ। दूसरे अर्थ में समझिए। लक्ष्मीजी का वास एक लघु इकाई में है। एक माटी के दीपक में है। उसके प्रकाश में है। एक फकीर की भी दिवाली है तो एक अमीर की भी। एक कुम्हार की भी दिवाली है, तो एक सर्राफ की भी। यही लक्ष्मी है। मन की लक्ष्मी। सबकी लक्ष्मी। इसका आशय यह है कि तन, मन, धन, परिवार और संतान की पुष्टि एक दीप की तरह प्रकाशवान रहें। धनवर्षा के साथ, अमृतवर्षा के साथ।
आज आवश्यकता धन कमाने की नहीं, धन कमाने की शुद्ध पद्धति और उसके शुद्ध उपयोग की है। यदि साध्य समृद्धि है तो साधन भी शुद्ध होने चाहिए। बेईमानी, शोषण, छल और भ्रष्टाचार से अर्जित धन चाहे कितनी भी बड़ी संपत्ति क्यों न बना दे, वह जीवन में शांति और समाज में सम्मान नहीं ला सकता। इसके विपरीत परिश्रम, ईमानदारी और नैतिकता से अर्जित सीमित धन भी जीवन को गरिमा प्रदान करता है। धनतेरस हमें संग्रह के साथ विसर्जन की चेतना देता है। जिस धन का प्रवाह समाज तक नहीं पहुँचता, वह अंततः जड़ हो जाता है। दान, सेवा, शिक्षा, चिकित्सा, जरूरतमंदों की सहायता, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक उत्थान में धन का उपयोग उसकी सार्थकता बढ़ाता है। दीपक की तरह धन भी तभी प्रकाश देता है, जब वह स्वयं जलकर दूसरों के जीवन में उजाला फैलाए।
इसलिए धनतेरस पर हमें केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि इस वर्ष हमारी संपत्ति कितनी बढ़ी, बल्कि यह भी पूछना चाहिए कि हमारा संतोष कितना बढ़ा, हमारा चरित्र कितना मजबूत हुआ, हमारी करुणा कितनी गहरी हुई और हमारे धन से कितने जीवनों में उजाला आया। हमारे पास कार न हो, कोठी न हो, ऊँची कुर्सी न हो-कोई बात नहीं, लेकिन हमारे पास ईमान, इंसानियत, आत्मसम्मान, संयम और चरित्र अवश्य होना चाहिए। यही वह संपदा है जिसे न बाजार खरीद सकता है, न समय छीन सकता है। धनतेरस का दीप तभी सच्चे अर्थों में जलेगा, जब हमारे भीतर धन के साथ धर्म, समृद्धि के साथ संवेदना, भोग के साथ संयम और अधिकार के साथ उत्तरदायित्व का प्रकाश भी जले। धन की समृद्धि जीवन को सुविधापूर्ण बना सकती है, लेकिन चरित्र की समृद्धि ही जीवन को महान बनाती है। यही धनतेरस का सनातन संदेश है और यही आधुनिक समाज की सबसे बड़ी आवश्यकता भी।
- ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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