नेपाल के पीएम बालेन शाह के तेवर पड़े ठंडे; पहले किया था मना, अब खुद भारतीय विदेश सचिव से मिले
विक्रम मिसरी ने गुरुवार को नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह से मुलाकात की और द्विपक्षीय हितों से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की। विदेश सचिव मिसरी की नेपाल यात्रा का मुख्य उद्देश्य प्रधानमंत्री शाह की आगामी भारत यात्रा पर चर्चा करना है।
OBC क्रीमी लेयर पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, पहले से हो चुकी नियुक्तियां सुरक्षित, UPSC 2025 के सेवा आवंटन में लागू होंगे नए मानदंड
अन्य पिछड़ा वर्ग OBC के क्रीमी लेयर निर्धारण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि क्रीमी लेयर की पहचान केवल माता-पिता की वेतन आय के आधार पर नहीं की जा सकती। साथ ही, अदालत ने पहले से पूरी हो चुकी नियुक्तियों और तय हो चुकी वरिष्ठता को सुरक्षित रखते हुए सिविल सेवा परीक्षा 2025 के चयनित अभ्यर्थियों के सेवा आवंटन पर संशोधित मानदंड लागू करने का निर्देश दिया है। इस फैसले से एक ओर आरक्षण के पात्र अभ्यर्थियों के अधिकारों को स्पष्टता मिली है, वहीं दूसरी ओर पहले से नियुक्त अधिकारियों की स्थिति भी सुरक्षित रखी गई है।
यह मामला OBC वर्ग के उन अभ्यर्थियों से जुड़ा है, जिनके माता-पिता सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, बैंकों और अन्य संस्थानों में कार्यरत हैं। विवाद इस बात पर था कि ऐसे अभ्यर्थियों की क्रीमी लेयर स्थिति तय करते समय माता-पिता की वेतन आय को किस तरह देखा जाना चाहिए।
क्या था पूरा विवाद?
केंद्र सरकार ने 8 सितंबर 1993 को एक कार्यालय ज्ञापन जारी किया था। इसमें OBC वर्ग के सामाजिक और आर्थिक रूप से संपन्न लोगों को आरक्षण के दायरे से बाहर रखने के लिए क्रीमी लेयर के मानदंड तय किए गए थे। इन नियमों में केवल आय को आधार नहीं बनाया गया था, बल्कि माता-पिता के पद और सामाजिक स्थिति को भी महत्वपूर्ण माना गया था।
इसके बाद 14 अक्टूबर 2004 को जारी एक स्पष्टीकरण ने विवाद खड़ा कर दिया। इसके तहत कुछ परिस्थितियों में PSU और निजी क्षेत्र में काम करने वाले माता-पिता की वेतन आय को भी क्रीमी लेयर निर्धारित करने के लिए शामिल किया जाने लगा। इससे सरकारी कर्मचारियों और सार्वजनिक उपक्रमों में काम करने वाले कर्मचारियों के बच्चों के लिए अलग-अलग तरीके से नियम लागू होने लगे।
मामला अदालत पहुंचा तो सवाल उठा कि जब सरकारी कर्मचारियों और PSU कर्मचारियों के पद समान स्तर के हो सकते हैं, तब केवल वेतन के आधार पर उनके बच्चों के साथ अलग व्यवहार कैसे किया जा सकता है?
11 मार्च के फैसले को फिर स्पष्ट किया
सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च 2026 को यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रोहित नाथन मामले में इस विवाद पर महत्वपूर्ण निर्णय दिया था। न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने कहा था कि केवल वेतन आय को आधार बनाकर किसी उम्मीदवार को OBC क्रीमी लेयर में नहीं रखा जा सकता। इसके लिए संबंधित माता-पिता के पद, सेवा श्रेणी और सामाजिक स्थिति को भी देखना जरूरी है।
अदालत ने यह भी माना था कि 2004 के स्पष्टीकरण के जरिए 1993 के मूल नियमों में ऐसी शर्त नहीं जोड़ी जा सकती, जिसका उल्लेख मूल नीति में नहीं था। इस व्यवस्था से अलग-अलग वर्गों के कर्मचारियों के बच्चों के बीच असमानता पैदा हो रही थी।
केंद्र सरकार की मांग पर अदालत का रुख
मार्च के फैसले के बाद केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में आवेदन दाखिल कर उसके क्रियान्वयन को लेकर कुछ स्पष्टीकरण मांगे थे। सरकार का तर्क था कि फैसले को लागू करने से पहले से हो चुकी भर्तियों, नियुक्तियों और वरिष्ठता पर असर पड़ सकता है। केंद्र ने नए मानदंडों को लागू करने के लिए दो साल का समय भी मांगा था।
सरकार की एक प्रमुख मांग यह थी कि UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2025 के अभ्यर्थियों को पहले से लागू व्यवस्था के आधार पर सेवाएं आवंटित करने की अनुमति दी जाए। इस परीक्षा का अंतिम परिणाम 6 मार्च 2026 को घोषित हुआ था, लेकिन सेवा आवंटन की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई थी। सुप्रीम कोर्ट ने 6 नवंबर 2026 को इन मांगों पर विचार करते हुए कहा कि जब 2025 की सेवा आवंटन प्रक्रिया अभी लंबित है, तो उस पर मार्च के फैसले में तय सिद्धांत लागू होंगे। केवल परिणाम पहले घोषित हो जाने से पुराने मानदंड लागू रखने का आधार नहीं बनता।
पहले से नियुक्त अधिकारियों को राहत
अदालत ने अपने फैसले में यह भी साफ किया कि 11 मार्च 2026 से पहले पूरी हो चुकी नियुक्तियों और चयन प्रक्रियाओं को केवल इस फैसले के आधार पर दोबारा नहीं खोला जाएगा। किसी दूसरे व्यक्ति की वरिष्ठता को भी स्वतः प्रभावित नहीं किया जा सकेगा। हालांकि, जिन अभ्यर्थियों के समान प्रकृति के मामले पहले से अदालतों, न्यायाधिकरणों या सक्षम मंचों के सामने लंबित हैं, उनके दावों पर संबंधित मंच कानून के अनुसार विचार कर सकेंगे।
फैसले का व्यापक महत्व
इस फैसले का महत्व केवल UPSC परीक्षा तक सीमित नहीं है। यह सरकारी आरक्षण व्यवस्था में समानता और निष्पक्षता के सिद्धांत को भी मजबूत करता है। अदालत ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि क्रीमी लेयर का निर्धारण करते समय नियमों की सही व्याख्या जरूरी है और केवल आय के आंकड़ों के आधार पर किसी वर्ग को आरक्षण से बाहर नहीं किया जा सकता।
साथ ही, फैसले में पुराने मामलों और पहले से पूरी हो चुकी नियुक्तियों को सुरक्षित रखने का संतुलन भी बनाया गया है। इससे प्रशासनिक स्थिरता और पात्र उम्मीदवारों के अधिकारों, दोनों को ध्यान में रखने की कोशिश दिखाई देती है। अब केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या के अनुसार व्यवस्था लागू करनी होगी।
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