लोकसभा में 'टैक्सेशन एंड अदर लॉज अमेंडमेंट बिल' पास, ग्लोबल ट्रेड व सप्लाई चेन की दिक्कतों को ऐसे करेगा दूर
लोकसभा ने गुरुवार को 'टैक्सेशन एंड अदर लॉज (अमेंडमेंट) बिल, 2026' को जारी कर दिया गया है. इस बिल का उद्देश्य पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम एक्ट, 2007, इनकम-टैक्स एक्ट, 2025 और फाइनेंस एक्ट, 2026 में बदलाव करना है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की ओर से पेश किए गए इस बिल को बिना किसी चर्चा के ध्वनि मत से पास कर दिया गया. इस दौरान विपक्षी सदस्यों ने 20 जुलाई को प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई से जुड़ी अपनी मांगों को लेकर विरोध-प्रदर्शन किया. इस बिल में निवेश को बढ़ावा देने, मैन्युफैक्चरिंग को सपोर्ट करने और टैक्स से जुड़ी निश्चितता प्रदान करने को लेकर कई टैक्स बदलावों का प्रस्ताव सामने आया है. यह इनकम-टैक्स (अमेंडमेंट) ऑर्डिनेंस, 2026 की जगह लेगा.
टैक्स से जुड़ी निश्चितता भी मिलेगी
यह बिल बदलते जियो-पॉलिटिकल हालात और ग्लोबल ट्रेड व सप्लाई चेन आ रही समस्याओं को ध्यान में रखकर तैयार किया गया था. सरकार के अनुसार, इन बदलावों का लक्ष्य बाहरी आर्थिक झटकों को कम करना, घरेलू आर्थिक स्थिरता बनाए रखना और मौजूदा ग्लोबल हालात से प्रभावित सेक्टर के सहायता देना है. इसके साथ ही, इससे 'ईज ऑफ़ डूइंग बिजनेस' (कारोबार करने में आसानी) और टैक्स से जुड़ी निश्चितता भी मिलेगी.
बिल में टैक्स से जुड़े अहम प्रस्ताव तय किए गए हैं. इसमें एक है योग्य ऑफ़शोर इन्वेस्टमेंट फंड और योग्य फंड मैनेजरों से जुड़ी शर्तों को तर्कसंगत बनाना. बिल का मकसद भारत में फंड मैनेजमेंट गतिविधियों को बढ़ावा देना और ग्लोबल निवेशकों को टैक्स से जुड़ी अधिक निश्चितता देना है. इसके लिए, मुख्य सुरक्षा उपायों को बनाए रखते हुए अनुपालन (compliance) की शर्तों को कम करके इनकम-टैक्स एक्ट, 2025 के ढांचे को आसान बनाने का प्रस्ताव है.
टैक्स छूट को बढ़ाना भी है
इस बिल में इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग के लिए टैक्स इंसेंटिव (टैक्स में छूट या प्रोत्साहन) को बढ़ाने का प्रस्ताव है. इसका लक्ष्य उन विदेशी कंपनियों को मिलने वाली टैक्स छूट को बढ़ाना भी है. खास इलेक्ट्रॉनिक सामानों के लिए भारतीय कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरर्स को कैपिटल गुड्स, इक्विपमेंट या टूलिंग सप्लाई भी करती है.
इलेक्ट्रॉनिक सामानों की परिभाषा का दायरा बढ़ाया
यह छूट पहले 2030-31 में खत्म होने वाली थी. मगर अब इसे 31 मार्च, 2041 तक बढ़ाने का प्रस्ताव रखा है. इसके साथ ही इसमें खास इलेक्ट्रॉनिक सामानों की परिभाषा का दायरा बढ़ाया जाएगा. इससे लैपटॉप, टैबलेट, सर्वर, हियरेबल्स, वियरेबल्स और उनसे जुड़े एक्सेसरीज जैसे प्रोडक्ट्स को शामिल किया जा जाएगा.
कैपिटल गेन्स पर टैक्स छूट का प्रस्ताव
इस बिल में एक और अहम प्रस्ताव सरकारी सिक्योरिटीज में विदेशी निवेशकों को लेकर नई टैक्स छूट देना है. बिल में विदेश संस्थागत निवेशकों (FIIs) और 'बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स' को लेकर सरकारी सिक्योरिटीज की बिक्री, एक्सचेंज या ट्रांसफर से होने वाले ब्याज आय और कैपिटल गेन्स पर टैक्स छूट का प्रस्ताव है. चाहे वे तय रिपोर्टिंग नियमों का पालन करें.
2041 तक टैक्स छूट देने का प्रस्ताव
ग्लोबल डायमंड ट्रेड में भारत की स्थिति को मजबूत करने के लिए, बिल में योग्य विदेशी डायमंड माइनिंग कंपनियों, साइट होल्डर्स, ब्रोकर्स, एग्रीगेटर्स और नीलामी करने वाली संस्थाओं को 31 मार्च, 2041 तक टैक्स छूट देने का प्रस्ताव है. यह छूट नोटिफाइड स्पेशल जोन के माध्य से कच्चे हीरों (रफ़ डायमंड्स) की बिक्री से होने वाली आय पर मिलेगी. बिजनेस ट्रस्ट के केस में, बिल एक मौजूदा पाबंदी को हटाने का प्रस्ताव करता है. इस पाबंदी के तहत यूनिट होल्डर्स को मिलने वाले डिविडेंड पर टैक्स छूट नहीं मिलती थी, अगर स्पेशल पर्पस व्हीकल (SPV) ने नई टैक्स व्यवस्था को चुना हो.
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Breakout और Breakdown क्या हैं, जानें ट्रेडिंग में इनका क्या है मतलब?
Share Market में ट्रेडिंग करते समय आपने शायद शेयर की कीमतों का अंदाजा लगाने के लिए इस्तेमाल होने वाले अलग-अलग टेक्निकल एनालिसिस कॉन्सेप्ट्स के बारे में सुना होगा. अगर आप स्टॉक मार्केट में नए हैं, तो आपको इस आर्टिकल में Breakout और Breakdown के बारे में जानकारी मिल रही है. ये ऐसे कॉन्सेप्ट्स हैं, जो आपकी ट्रेडिंग गतिविधियों के लिए बहुत काम के साबित हो सकते हैं. ट्रेडर्स अक्सर किसी स्टॉक की कीमत की संभावित दिशा और ट्रेंड को समझने के लिए ब्रेकआउट और ब्रेकडाउन का इस्तेमाल करते हैं. हालांकि, सिर्फ ब्रेकआउट या ब्रेकडाउन के आधार पर ट्रेडिंग का फैसला लेना सही नहीं है. इसलिए, इन कॉन्सेप्ट्स की पूरी समझ होना जरूरी है, जैसा कि यहां बताया गया है.
Breakout क्या होता है?
जब किसी स्टॉक की कीमत एक अहम रेजिस्टेंस लेवल से ऊपर जाती है, तो इसे ब्रेकआउट कहा जाता है. रेजिस्टेंस वह लेवल है जहां स्टॉक की कीमत बार-बार ऊपर जाने में मुश्किल का सामना करती है. इसे बेहतर ढंग से समझने के लिए एक उदाहरण लेते हैं. मान लीजिए कि किसी स्टॉक की कीमत बार-बार ₹500 तक पहुंचती है लेकिन हर बार किसी वजह से नीचे गिर जाती है तो ऐसे में, ₹500 उसका रेजिस्टेंस लेवल होगा. हालांकि, अगर जबरदस्त खरीदारी की वजह से स्टॉक ₹500 के लेवल को तोड़कर ऊपर चला जाता है, तो इसे ब्रेकआउट माना जा सकता है. ऐसी स्थिति को बुलिश सिग्नल माना जाता है.
Breakdown क्या होता है?
आसान शब्दों में कहें तो, ब्रेकडाउन, ब्रेकआउट का उल्टा होता है. ब्रेकडाउन तब होता है जब किसी स्टॉक की कीमत एक अहम सपोर्ट लेवल से नीचे गिर जाती है. आइए इसे एक उदाहरण से समझते हैं मान लीजिए कि कोई स्टॉक बार-बार ₹400 के आसपास तक गिरता है और फिर वापस ऊपर आ जाता है तो ऐसे में, ₹400 उसका सपोर्ट लेवल बन जाता है. अगर इसके बाद स्टॉक ₹400 से नीचे गिर जाता है और वहीं बना रहता है, तो इसे ब्रेकडाउन माना जाता है. ब्रेकडाउन को गिरावट का संकेत माना जाता है.
Breakout की पहचान कैसे करें?
ब्रेकआउट की पहचान करने के कई संकेत होते हैं. उदाहरण के लिए जाने तो आपको ट्रेडिंग वॉल्यूम पर ध्यान देना चाहिए. जब कोई स्टॉक ऊपर जाता है और रेजिस्टेंस लेवल को तोड़ता है, तो इसे बाजार में खरीदारी के लिए एक सकारात्मक संकेत माना जाता है. कई ट्रेडर्स सिर्फ इंट्राडे प्राइस के रेजिस्टेंस लेवल को पार करने से आगे बढ़कर यह भी देखते हैं कि क्या स्टॉक असल में उस स्तर के ऊपर बंद होता है. आपको भी क्लोजिंग प्राइस पर विचार करना चाहिए. कभी-कभी स्टॉक वापस उस पिछले रेजिस्टेंस लेवल के आस-पास आ जाता है इसलिए ऐसी स्थितियों में आपको रीटेस्ट पर भी नजर रखनी चाहिए.
False Breakout क्या होता है?
अक्सर कोई स्टॉक रेजिस्टेंस लेवल से ऊपर तो जाता है लेकिन कुछ समय बाद वापस उसके नीचे आ जाता है इसे False Breakout या Fakeout कहा जाता है. इसी तरह कोई स्टॉक सपोर्ट लेवल से नीचे गिर सकता है और तुरंत वापस ऊपर आ सकता है, जिससे ब्रेकडाउन फ़ॉल्स साबित होता है. इसी वजह से कुछ ट्रेडर्स किसी प्राइस लेवल के टूटने पर तुरंत ट्रेड करने के बजाय कन्फर्मेशन का इंतजार करना पसंद करते हैं.
क्या केवल Breakout देखकर ट्रेड करना चाहिए?
नहीं, एक समझदार निवेशक कभी भी सिर्फ ब्रेकआउट या ब्रेकडाउन के आधार पर ट्रेडिंग का जोखिम नहीं उठाता है. वे पुष्टि के लिए अन्य टेक्निकल इंडिकेटर्स जैसे वॉल्यूम, RSI, MACD, मूविंग एवरेज, कैंडलस्टिक पैटर्न और प्राइस एक्शन का भी इस्तेमाल करते हैं. इसके अलावा, वे स्टॉप-लॉस रणनीतियों और रिस्क मैनेजमेंट पर भी पूरा ध्यान देते हैं.
डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश बाजार के जोखिमों के अधीन है. किसी भी शेयर में पैसा लगाने से पहले अपने सर्टिफाइड फाइनेंशियल एडवाइजर से सलाह जरूर लें.
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