मिलिए भारत के आयरनमैन जज से, 57 साल की उम्र में 1.9 km स्विमिंग, 90 Km साइकिलिंग और 21 किमी दौड़ लगाकर रचा इतिहास
जस्टिस बेचू कुरियन थॉमस ने आयरनमैन 70.3 ट्रायथलॉन प्रतियोगिता को पूरा कर इतिहास रच दिया है। उन्होंने समुद्र में 1.9 किलोमीटर स्वीमिंग की, 90 किलोमीटर साइकिल चलाई और 21.1 किलोमीटर की हाफ मैराथन दौड़ लगाई।
Explainer: बंगाल की खाड़ी में ही क्यों उठते हैं चक्रवात? क्या अल नीनो भी है इसके लिए जिम्मेदार?
Explainer: भारत में जब भी चक्रवात का खतरा मंडराता है, तो अक्सर बंगाल की खाड़ी का नाम सामने आता है. देश के पूर्वी तट पर बसे राज्यों पश्चिम बंगाल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु को समुद्री तूफानों का खतरा लगातार बना रहता है. अरब सागर की तुलना में बंगाल की खाड़ी में चक्रवात ज्यादा बनते हैं. यही वजह है कि मौसम विभाग की चेतावनी जारी होते ही इस क्षेत्र पर विशेष नजर रखी जाती है.
लेकिन स वाल है कि आखिर बंगाल की खाड़ी में ही इतने चक्रवात क्यों पैदा होते हैं? क्या इसकी वजह सिर्फ समुद्र के पानी का ज्यादा गर्म होना है या इसके पीछे भौगोलिक स्थिति, हवाओं और मानसून की भी भूमिका है? इसके साथ ही यह सवाल भी उठता है कि क्या अल नीनो जैसी जलवायु घटना चक्रवातों की संख्या और उनकी तीव्रता को प्रभावित करती है? आइए समझते हैं पूरा विज्ञान...
बंगाल की खाड़ी में चक्रवात ज्यादा बनने की वजह क्या है?
बंगाल की खाड़ी हिंद महासागर का उत्तर-पूर्वी हिस्सा है. इसके उत्तर में भारतीय उपमहाद्वीप, पश्चिम में भारत और पूर्व में म्यांमार एवं थाईलैंड की ओर जमीन है. इस भौगोलिक बनावट के चलते यहां समुद्री और वायुमंडलीय परिस्थितियां चक्रवात बनने के लिए अनुकूल हो सकती हैं.
इस क्षेत्र में नदियों के जरिए बड़ी मात्रा में मीठा पानी और गाद पहुंचती है. गंगा, ब्रह्मपुत्र और इरावदी जैसी नदियां बंगाल की खाड़ी में पानी का संतुलन बदलती हैं. मीठे पानी की परत अपेक्षाकृत हल्की होती है और समुद्र के भीतर गहरे पानी के साथ आसानी से नहीं मिलती. इससे समुद्र की ऊपरी सतह का पानी गर्म बना रह सकता है.
हालांकि सिर्फ तीन तरफ से चमीन से घिरा होना चक्रवात बनने की पूरी वजह नहीं है. समुद्र का तापमान, हवा में नमी, वायुमंडलीय दबाव और हवाओं की दिशा जैसे कई कारक मिलकर तूफान के विकास में भूमिका निभाते हैं.
26.5 डिग्री से ज्यादा तापमान क्यों है जरूरी?
समुद्र में उष्णकटिबंधीय चक्रवात बनने के लिए समुद्र की सतह का तापमान सामान्य तौर पर कम से कम 26.5 डिग्री सेल्सियस होना जरूरी माना जाता है. यह कोई पक्का नियम नहीं है, बल्कि चक्रवात बनने के लिए अनुकूल परिस्थितियों का एक सामान्य संकेतक है.
जब समुद्र का पानी गर्म होता है, तो उससे बड़ी मात्रा में पानी वाष्प बनकर ऊपर उठता है. यह गर्म और नम हवा ऊपर जाकर ठंडी होती है और जलवाष्प के संघनन से बादल बनते हैं. इस प्रक्रिया में छिपी हुई ऊष्मा निकलती है, जो आसपास की हवा को और गर्म करके ऊपर उठने में मदद करती है.
इससे सतह के पास हवा का दबाव कम होने लगता है और आसपास की हवा उस कम दबाव वाले क्षेत्र की तरफ बढ़ती है. पृथ्वी के घूमने के कारण हवा में घुमाव पैदा होता है. अगर अन्य परिस्थितियां अनुकूल रहें, तो यह सिस्टम धीरे-धीरे मजबूत होकर चक्रवात बन सकता है.
बंगाल की खाड़ी में मानसून के बाद भी समुद्र का तापमान कई बार 28 डिग्री सेल्सियस या उससे ज्यादा बना रहता है. गर्म पानी और वातावरण में मौजूद नमी चक्रवात के विकास को ऊर्जा दे सकते हैं.
मानसून के बाद क्यों बढ़ जाता है चक्रवातों का खतरा?
भारत में चक्रवातों के लिहाज से अप्रैल-मई और अक्टूबर-नवंबर का समय महत्वपूर्ण माना जाता है. खासतौर पर मानसून की वापसी के बाद बंगाल की खाड़ी में चक्रवात बनने की अनुकूल परिस्थितियां पैदा हो सकती हैं.
मानसून के दौरान हवाओं की दिशा और वायुमंडलीय दबाव का ढांचा अलग रहता है. मानसून कमजोर पड़ने और वापस लौटने के बाद हवाओं के पैटर्न में बदलाव आता है. इस दौरान बंगाल की खाड़ी में कम दबाव के क्षेत्र और डिप्रेशन विकसित हो सकते हैं.
इनमें से कुछ सिस्ट्म अनुकूल परिस्थितियां मिलने पर गहरे दबाव और फिर चक्रवात में बदल जाते हैं. समुद्र से मिलने वाली कमी और गर्मी इन्हें मजबूत कर सकती है. मानसून के बाद का समय इसलिए भी संवेदनशील है, क्योंकि समुद्र में गर्मी बनी रहती है और वायुमंडल में मौसम बदलाव जारी रहता है.
बंगाल की खाड़ी से उठे तूफान पश्चिम की ओर क्यों बढ़ते हैं?
बंगाल की खाड़ी में बनने वाले चक्रवातों की दिशा तय करने में बड़े पैमाने पर बहने वाली हवाओं की भूमिका होती है. उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में चक्रवात आमतौर पर वायुमंडल में मौजूद स्टीयरिंग हवाओं के साथ आगे बढ़ते हैं.
मानसून के बाद कई बार पूर्वी और उत्तर-पूर्वी हवाओं का प्रभाव बढ़ता है. ऐसे मौसम में बंगाल की खाड़ी में बने चक्रवात पश्चिम या उत्तर-पश्चिम दिशा में बढ़कर भारत के पूर्वी तट की ओ आ सकते हैं. हालांकि हर चक्रवात का रास्ता एक जैसा नहीं होता. उसकी दिशा पर उच्च और निम्न दबाव वाले क्षेत्रों, ऊपरी हवाओं और अन्य मौसमी प्रणालियों का असर पड़ता है.
इसी वजह से कुछ तूफान ओडिशा और पश्चिम बंगाल की ओर बढ़ते हैं, जबकि कुछ आंध्र प्रदेश या तमिलनाडु के तट से टकरा सकते हैं.
क्या अल नीनो भी चक्रवातों के लिए जिम्मेदार है?
अल नीनो प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह के तापमान के सामान्य से ज्यादा गर्म होने की जलवायु घटना है. इसका असर दुनिया के कई क्षेत्रों के मौसम पर पड़ता है. भारत में इसका संबंध अक्सर कमजोर मानसून की आशंका से जोड़ा जाता है.
लेकिन अल नीनो को बंगाल की खाड़ी में चक्रवात बनने की सीधी और अकेली वजह नहीं माना जा सकता. इसका प्रभाव जटलि होता है. यह बड़े पैमाने पर हवाओं, वायुमंडलीय दबाव और समुद्र की परिस्थितियों को प्रभावित कर सकता है. इससे चक्रवात बनने के अनुकूल या प्रतिकूल हालात पैदा हो सकते हैं.
अल नीनो के दौरान कुछ क्षेत्रों में वायुमंडलीय पवन कतरन यानी विंड शीयर बढ़ सकती है. विंड शीयर का मतलब है कि अलग-अलग ऊंचाई पर हवाओं की गति या दिशा में अंतर होना. बहुत ज्यादा विंड शीयर चक्रवात के बनने और मजबूत होने में बाधा डाल सकती है, क्योंकि इससे तूफान की संरचना बिखर सकती है.
इसलिए अल नीनो का असर हर साल और हर समुद्री क्षेत्र में एक जैसा नहीं होता. यह कहना गलत होगा कि अल नीनो आते ही बंगाल की खाड़ी में ज्यादा चक्रवात बनेंगे या उनकी तीव्रता निश्चित रूप से बढ़ जाएगी. इसके लिए समुद्र के तापमान, वायुमंडलीय स्थितियों और अन्य जलवायु कारकों को साथ में देखना जरूरी है.
अरब सागर में चक्रवात कम क्यों बनते हैं?
अरब सागर में भी चक्रवात बनते हैं, लेकिन ऐतिहासिक रूप से बंगाल की खाड़ी में इनकी संख्या अधिक रही है. इसकी एक वजह बंगाल की खाड़ी में समुद्र की ऊपरी सतह का गर्म रहना और नमी की उपलब्धता है.
अरब सागर में कई बार समुद्र के भीतर से ठंडा पानी ऊपर आने और तेज हवाओं के कारण समुद्र की सतहका तापमान कम हो सकता है. इससे चक्रवात बनने के लिए जरूरी ऊर्जा सीमित हो सकती है. हालांकि हाल के दशकों में अरब सागर में भी कुछ शक्तिशाली चक्रवात देखने को मिले हैं. समुद्र के गर्म होने और जलवायु परिवर्तन के कारण इस क्षेत्र की परिस्थितियों पर वैज्ञानिक लगातार नजर रख रहे हैं.
जलवायु परिवर्तन से बढ़ सकती है चुनौती
वैज्ञानिकों के अनुसार समुद्र का तापमान बढ़ना चक्रवातों के लिए उपलब्ध ऊर्जा को प्रभावित कर सकता है. गर्म समुद्र कुछ तूफानों को तेजी से मजबूत होने का मौका दे सकता है. इसके अलावा समुद्र का स्तर बढ़ने से चक्रवात के साथ आने वाली तूफानी लहरों और तटीय बाढ़ का खतरा भी बढ़ सकता है.
हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि हर साल चक्रवातों की संख्या निश्चित रूप से बढ़ेगी. जलवायु परिवर्तन का असर चक्रवातों की तीव्रता, बारिश, तेजी से मजबूत होने की घटनाओं और उनके रास्तों पर अलग-अलग तरीके से पड़ सकता है.
कुल मिलाकर, बंगाल की खाड़ी में ज्यादा चक्रवात बनने के पीछे गर्म समुद्री सतह, नमी, भौगोलिक बनावट और अनुकूल वायुमंडलीय परिस्थितियों का संयुक्त प्रभाव है. अल नीनो इन परिस्थितियों को प्रभावित कर सकता है, लेकिन उसे अकेले जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. इसलिए किसी भी चक्रवात का खतरा समझने के लिए समुद्र और वातावरण की ताजा स्थिति पर नजर रखना सबसे जरूरी है.
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