नेतन्याहू के बाद अब ट्रंप की बारी, चुनाव हारे तो क्या होगा? समझिए
अमेरिका में मिड टर्म इलेक्शन होने जा रहे हैं और इस चुनाव पर सिर्फ अमेरिका ही नहीं भारत समेत पूरी दुनिया की नजरें हैं। इसकी वजह है कि इस चुनाव से तय होगा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अगले 2 साल तक संसद का साथ मिलेगा या फिर उनके सामने विपक्ष की ऐसी दीवार खड़ी हो जाएगी जिसे पार करना आसान नहीं होगा। ट्रंप ने अपनी रिपब्लिकन पार्टी को जिताने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है। लेकिन मुकाबला दिलचस्प है। एक तरफ रिपब्लिकन पार्टी अपना बहुमत बचाने में जुटी है तो दूसरी तरफ डेमोक्रेटिक पार्टी संसद के दोनों सदनों में वापसी की कोशिश कर रही है। अब सवाल है कि आखिर अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव 4 साल में होता है। दरअसल अमेरिका में राष्ट्रपति का कार्यकाल 4 साल का होता है। लेकिन वहां संसद यानी कांग्रेस के चुनाव हर 2 साल में होते हैं। जब यह चुनाव राष्ट्रपति के 4 साल के कार्यकाल के बीच में होते हैं तो इन्हें मिड टर्म इलेक्शन कहा जाता है। अमेरिका की संसद के दो सदन हैं। पहला हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स दूसरा सीनेट। हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स को आप भारत की लोकसभा की तरह समझ सकते हैं और सीनेट को राज्यसभा की तरह। लेकिन दोनों देशों के चुनावी सिस्टम में एक बड़ा अंतर है।
इसे भी पढ़ें: पाँच राज्यों में बड़ा उलटफेर: वोटर्स की नाराजगी से ट्रंप को झटका, सीनेट में डेमोक्रेट्स को बढ़त
भारत में लोकसभा सांसद 5 साल के लिए चुने जाते हैं। जबकि अमेरिका में हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स के सदस्यों का कार्यकाल सिर्फ 2 साल का होता है। इसलिए इस बार हाउस की सभी 435 सीटों पर चुनाव होगा। वहीं सीनेट में कुल 100 सीटें होती हैं। यहां सेटर 6 साल के लिए चुने जाते हैं। लेकिन सभी सीटों पर एक साथ चुनाव नहीं होता। हर 2 साल में लगभग 1/3 सीटों पर चुनाव होता है। इस बार 33 नियमित और दो विशेष चुनावों के जरिए कुल 35 सीटों पर वोटिंग होगी। यानी 3 अक्टूबर को अमेरिकी जनता यह तय करेगी कि कांग्रेस के दोनों सदनों में किस पार्टी का दबदबा रहेगा और यही वजह है कि यह चुनाव डोनाल्ड ट्रंप के लिए बेहद अहम है। फिलहाल रिपब्लिकन पार्टी के पास हाउस और सीनेट दोनों में बहुमत है लेकिन यह बहुमत बहुत मामूली है और हाउस में रिपब्लिकन पार्टी के पास 218 सीटें हैं। जबकि सीनेट में उसके पास 53 सीटें हैं। अब अगर डेमोक्रेटिक पार्टी इन दोनों सदनों में से किसी एक में भी बहुमत हासिल कर लिया, तो ट्रंप के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं। क्योंकि अमेरिका में कानून बनाने का काम कांग्रेस करती है। राष्ट्रपति अपनी योजनाएं जरूर पेश कर सकते हैं, लेकिन उन्हें लागू करने के लिए कई मामलों में संसद का समर्थन जरूरी होता है।
इसे भी पढ़ें: Pakistan में अमेरिकी कंपनियों का LNG प्रोजेक्ट पर 4.4 अरब डॉलर निवेश का प्लान
ऐसे में अगर डेमोक्रेटिक हाउस या सीनेट पर नियंत्रण आसानी से कर लेते हैं, तो वह ट्रंप के प्रस्तावों को रोक सकते हैं। सरकारी बजट पर सवाल उठा सकते हैं और उनकी पॉलिसीज को लेकर भी जांच शुरू कर सकते हैं। यहां तक कि ट्रंप प्रशासन के फैसलों की जांच के लिए संसदीय कमेटियों का इस्तेमाल किया जा सकता है। भ्रष्टाचार के आरोप हो, वाइट हाउस में बाल रूम बनाने का विवाद हो या आईसी एजेंट्स की कारवाई विपक्ष इन मुद्दों पर ट्रंप प्रशासन से जवाब मांग सकता है। डेमोक्रेटिक पार्टी में ट्रंप के खिलाफ महाभियोग की मांग को लेकर भी बहस होती रही है। हालांकि महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करना और राष्ट्रपति को पथ हटाना दो अलग-अलग संवैधानिक प्रक्रियाएं हैं। लेकिन अगर रिपब्लिकन पार्टी दोनों सदनों में अपना बहुमत बचा लेती है तो ट्रंप को अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने में संसदीय स्तर पर ज्यादा सहयोग मिलेगा। अब बात करते हैं उन मुद्दों की जिन पर इस बार अमेरिकी जनता वोट करेगी। अमेरिका में क्या है चुनावी मुद्दे? पहला महंगाई और अर्थव्यवस्था। अमेरिका में आम लोगों के लिए रोजमर्रा की चीजों की कीमतें, घर का खर्च और रोजगार जैसे सवाल अहम बन गए हैं। दूसरा ट्रंप की टेरिफ पॉलिसी। ट्रंप दूसरे देशों से आने वाले सामान पर टेरिफ लगाने की नीति अपना रहे हैं।
Bangladesh में Garment कर्मचारियों का हिंसक प्रदर्शन, पुलिस वाहनों में तोड़फोड़ और आगजनी
बांग्लादेश में कपड़ा उद्योग के कर्मचारी पिछले तीन दिनों से उग्र प्रदर्शन कर रहे हैं। उन्होंने राजमार्गों को जाम कर दिया, पुलिस की गाड़ियों समेत कई वाहनों में तोड़फोड़ की, पुलिस के साथ झड़पें कीं, एक गोदाम को जला दिया और एक फैक्ट्री में तोड़फोड़ की। वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर हो रहे इन हिंसक प्रदर्शनों के कारण देश के महत्वपूर्ण विनिर्माण क्षेत्र का बड़ा हिस्सा ठप हो गया है। सोमवार को लगातार तीसरे दिन भी जारी रहे ये प्रदर्शन ऐसे समय में हो रहे हैं जब देश लंबे समय से आर्थिक मंदी से जूझ रहा है। साथ ही, ये प्रदर्शन पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के भारत में निर्वासन से बांग्लादेश लौटने की घोषणा के ठीक पहले हो रहे हैं। विश्व बैंक ने वित्त वर्ष 2025-26 में बांग्लादेश के लिए GDP ग्रोथ का अनुमान महज 3.4% लगाया है, जो 2020 (कोविड के साल) के बाद से सबसे धीमी विकास दर है। बढ़ती महंगाई और स्थिर वेतन के बीच जब मजदूर सड़कों पर उतरे, तो सरकार ने शेख हसीना की अवामी लीग और "सीमा पार के कुछ लोगों" पर हिंसा भड़काने का आरोप लगाया।
इसे भी पढ़ें: Bangladesh: NCP नेता नाहिद इस्लाम ने भारतीय ट्रांजिट कॉरिडोर के खिलाफ दी चेतावनी
कई विशेषज्ञों का मानना है कि 5 अगस्त 2024 को शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था नीचे की ओर जाने लगी। हसीना के कार्यकाल में ही रेडीमेड गारमेंट उद्योग - जो बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। उसने जबरदस्त तरक्की की थी। रॉयटर्स के आंकड़ों के अनुसार, इस सेक्टर में लगभग 40 लाख (4 मिलियन) लोग काम करते हैं, बांग्लादेश की कुल निर्यात कमाई का 80% हिस्सा यहीं से आता है, और देश की GDP में इसका योगदान लगभग 10% है। हालाँकि, रेडीमेड गारमेंट सेक्टर को अब भारी उथल-पुथल का सामना करना पड़ रहा है; सप्ताहांत में सैकड़ों कारखाने बंद हो गए, जिससे लगभग दस लाख कर्मचारी प्रभावित हुए हैं। सोमवार को कुछ कारखाने फिर से खुल गए, लेकिन ढाका और अन्य प्रमुख गारमेंट केंद्रों में विरोध-प्रदर्शन जारी रहे। सरकार ने अवामी लीग (जिस पर अब प्रतिबंध लग चुका है) पर इस अशांति को भड़काने का आरोप लगाया है—यह सब हसीना की प्रस्तावित वापसी से ठीक एक महीने पहले हुआ है।
इसे भी पढ़ें: Bangladesh में परिधान श्रमिकों के हिंसक प्रदर्शन के बाद सरकार ने बनाया Wage Board
बांग्लादेश के गारमेंट हब में विरोध-प्रदर्शनों से हड़कंप
31 अक्टूबर से बांग्लादेश के प्रमुख औद्योगिक केंद्रों में गारमेंट कर्मचारियों और पुलिस के बीच झड़पें, आगजनी और सड़कें जाम करने की घटनाएं हो रही हैं। अक्टूबर के दूसरे हिस्से में कई प्रदर्शनों के बाद, सप्ताहांत (वीकेंड) पर यह अशांति और बढ़ गई। 'प्रोथोम आलो' की रिपोर्ट के अनुसार, बांग्लादेश के सबसे बड़े रेडीमेड गारमेंट केंद्रों में से एक, गाजीपुर में 31 अक्टूबर को कर्मचारियों ने ढाका-तंगेल राजमार्ग को जाम कर दिया और पुलिस के साथ कई बार उनकी झड़पें हुईं। प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज किया और आंसू गैस के गोले छोड़े, जिसमें कम से कम 30 लोग घायल हो गए। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस की एक गाड़ी समेत 15 वाहनों में तोड़फोड़ की। अगले दिन ढाका के मीरपुर में हिंसा और तेज हो गई, जहां कर्मचारियों ने मीरपुर-10 चौराहे को जाम कर दिया और पुलिस से भिड़ गए। 'प्रोथोम आलो' और 'यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ़ बांग्लादेश' की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षाकर्मियों पर ईंट-पत्थर फेंके, जिसके जवाब में पुलिस ने आंसू गैस, वॉटर कैनन और लाठीचार्ज का इस्तेमाल किया। मीरपुर-11 मेट्रो स्टेशन के नीचे पुलिस की एक गाड़ी में आग लगा दी गई, जबकि मीरपुर और पल्लबी के स्टेशनों को कुछ समय के लिए बंद कर दिया गया।
होम
जॉब
पॉलिटिक्स
बिजनेस
ऑटोमोबाइल
गैजेट
लाइफस्टाइल
फोटो गैलरी
Others 
prabhasakshi










