BITS Pilani प्रवेश परीक्षा के शीर्ष 1,000 छात्रों की पूरी फीस करेगा माफ
नयी दिल्ली, एक नवंबर ‘बिरला प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान संस्थान’ (बिट्स) पिलानी 2027 से प्रवेश परीक्षा में शीर्ष 1,000 स्थान हासिल करने वाले छात्रों को पूरी छात्रवृत्ति देगा। संस्थान के समूह कुलपति वी. रामगोपाल राव ने यह जानकारी दी। राव ने बताया कि शीर्ष 1,000 स्थान हासिल करने वाले जिन छात्रों की वार्षिक पारिवारिक आय 20 लाख रुपये तक है, उन्हें चार साल तक शिक्षण शुल्क में पूरी छूट मिलेगी।
हालांकि, इसके लिए छात्रों को न्यूनतम 7.5 सीजीपीए (संचयी ग्रेड अंक औसत) बनाए रखना होगा। बिट्स पिलानी के परिसरों में एकीकृत प्रथम डिग्री स्नातक पाठ्यक्रमों (बीई, एमएससी और बीफार्मा) में प्रवेश के लिए कंप्यूटर आधारित ऑनलाइन प्रवेश परीक्षा ‘बिट्स एडमिशन टेस्ट’ (बिटसैट) आयोजित की जाती है। राव ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘छात्रवृत्ति का प्रावधान प्रवेश प्रस्ताव में ही शामिल होगा और छात्रों को संस्थान में दाखिला लेने के बाद इसके लिए अलग से आवेदन नहीं करना पड़ेगा।
इससे प्रवेश परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन करने वाले छात्र आर्थिक स्थिति के बजाय अपनी आकांक्षाओं और अवसरों के आधार पर बिट्स पिलानी को चुन सकेंगे।’’ उन्होंने कहा, ‘‘वर्ष 2026 में बिट्स पिलानी में दाखिला लेने वाले छात्रवृत्ति के पात्र शीर्ष 500 छात्रों की संख्या में 50 प्रतिशत की वृद्धि हुई। वहीं, प्रवेश परीक्षा में शीर्ष 500 में स्थान पाने के लिए आवश्यक अंक भी 314 से बढ़कर 324 हो गए।’’ बिट्स पिलानी ने शैक्षणिक वर्ष 2025-26 में अपने प्रथम डिग्री, उच्च डिग्री और पीएचडी पाठ्यक्रमों के छात्रों को छात्रवृत्ति, शुल्क में छूट और फेलोशिप के रूप में लगभग 190 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता प्रदान की।
Kerala High Court स्थापना दिवस पर बोले Arjun Ram Meghwal, केरल ने दिखाया महिला नीत विकास का रास्ता
कोच्चि, एक नवंबर केंद्रीय राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने रविवार को कहा कि केरलम की जनता ने देश को महिला नीत विकास का मार्ग दिखाया है। केंद्रीय विधि एवं न्याय और संसदीय कार्य राज्य मंत्री मेघवाल यहां केरल उच्च न्यायालय के स्थापना दिवस समारोह को संबोधित कर रहे थे। मंत्री ने कहा कि उच्च न्यायालय अपनी स्थापना के 70 साल पूरे होने का जश्न मना रहा है और यह सफर ‘दिलचस्प’ रहा है, क्योंकि इसने महिला सशक्तीकरण और महिलाओं के नेतृत्व वाले विकास के सिद्धांत दिए हैं।
उन्होंने कहा कि भारत में उच्च न्यायालय की पहली महिला न्यायाधीश न्यायमूर्ति अन्ना चांडी और उच्चतम न्यायालय की पहली महिला न्यायाधीश न्यायमूर्ति एम. फातिमा बीबी ने यह दिखाया कि सतत विकास के लक्ष्य को हासिल करने के लिए महिलाओं का सशक्तीकरण एक मुख्य सिद्धांत है। मेघवाल ने कहा, ‘‘केरलम की जनता ने देश को महिला नीत विकास का मार्ग दिखाया है।’’ प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने भी कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए दो महिला न्यायाधीशों का जिक्र किया और कहा कि उच्च न्यायालय ने अक्सर इतिहास से आगे रहकर अपनी एक अलग पहचान बनाई है। उन्होंने कहा कि ऐसे समय में जब उच्च न्यायपालिका में काफी हद तक पुरुषों का वर्चस्व था, केरल उच्च न्यायालय ‘‘एक ऐसा उदाहरण पेश कर रहा था जिसका अनुसरण अंततः पूरा देश करेगा।’’ न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने बताया कि सीजेआई का पद संभालने के बाद, कॉलेजियम ने - संभवतः ‘‘केरल उच्च न्यायालय के व्यावहारिक और प्रगतिशील दृष्टिकोण’’ से प्रभावित होकर - हाल ही में दो प्रतिष्ठित महिला न्यायाधीशों को सर्वोच्च न्यायालय में पदोन्नत किया।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि वे भी शायद उच्च न्यायालय के ‘‘दूरदर्शी दृष्टिकोण’’ से प्रभावित थे, क्योंकि उन्होंने न्यायिक पक्ष में एक आदेश पारित किया और साथ ही राज्यों के बार काउंसिल, बार काउंसिल ऑफ इंडिया तथा जिला और उच्च न्यायालय बार एसोसिएशनों के बहुमत को इस बात के लिए राजी किया कि बार की महिला सदस्यों को 30 प्रतिशत प्रतिनिधित्व मिले। सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि वह इन ‘ऐतिहासिक कदमों’ का श्रेय केरल उच्च न्यायालय को देंगे, क्योंकि उनके प्रयासों से बार की महिला सदस्यों को एक मजबूत, निष्पक्ष और प्रभावी प्रतिनिधित्व मिला। यह उस समय हुआ जब वकीलों के संगठनों या परिषदों को - हल्के-फुल्के अंदाज में ही सही - ‘पुरुषों का क्लब’ (मेन्स क्लब) कहा जाता था।
केरल उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सौमेन सेन ने कार्यक्रम को संबोधित हुए बताया कि किस तरह इस संस्थान का इतिहास उन लोगों की अभूतपूर्व उपलब्धियों में झलकता है, जिन्होंने न्यायपालिका में लैंगिक समानता और प्रतिनिधित्व की बाधाओं को तोड़कर नई मिसाल कायम की। उन्होंने कहा, ‘‘न्यायमूर्ति अन्ना चांडी भारत में किसी भी उच्च न्यायालय की पहली महिला न्यायाधीश बनीं। उनकी यह उपलब्धि न्याय प्रशासन में महिलाओं की भागीदारी के इतिहास में एक मील का पत्थर थी।
न्यायमूर्ति एम. फातिमा बीबी 1989 में उच्चतम न्यायालय की पहली महिला न्यायाधीश बनीं और उन्होंने इस ऐतिहासिक सफर को और आगे बढ़ाया।’’
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