रिपोर्ट: पाकिस्तान के युवाओं के सामने दो विकल्प, चुप रहो या देश छोड़ो
इस्लामाबाद, 5 मार्च (आईएएनएस)। पाकिस्तानी अधिकारी युवाओं की नाराजगी को आर्थिक विफलता के बजाय सुरक्षा समस्या के रूप में पेश करते रहे हैं। यहां युवा सड़कों पर या ऑनलाइन खुलकर बोलने या विरोध करने के बजाय देश छोड़कर विदेश जाने को अधिक सुरक्षित और व्यावहारिक विकल्प मानते हैं। वर्षों से चले आ रहे दमन ने युवा प्रदर्शनकारियों के बीच एकता को कमजोर कर दिया है। यह दावा गुरुवार को प्रकाशित एक रिपोर्ट में किया गया।
गैर-लाभकारी समाचार एजेंसी द न्यू ह्यूमैनिटेरियन की रिपोर्ट में कहा गया, “पिछले दो वर्षों में 8 लाख से अधिक युवा पाकिस्तान छोड़ चुके हैं। इसके पीछे केवल गंभीर आर्थिक अस्थिरता ही नहीं, बल्कि सड़कों पर होने वाले विरोध प्रदर्शनों और डिजिटल माध्यमों पर असहमति व्यक्त करने पर राज्य का कड़ा नियंत्रण भी एक बड़ा कारण है।”
रिपोर्ट में आगे कहा गया कि लगभग 25 करोड़ की आबादी वाले देश के लिए यह चिंताजनक आंकड़ा है, जिसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्रों में से एक होना चाहिए। पाकिस्तान की करीब 75 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम उम्र की है, जबकि युवाओं में बेरोजगारी दर लगभग 10 प्रतिशत के आसपास है, इसलिए यह स्थिति आश्चर्यजनक नहीं है।
रिपोर्ट के अनुसार, जब भी पाकिस्तान में युवा बदलाव के लिए संगठित होते हैं, तो उन्हें हिंसा और सरकार के लगाए गए सेंसरशिप का सामना करना पड़ता है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि अक्टूबर 2025 में पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के मुजफ्फराबाद क्षेत्र में युवाओं ने नागरिक अधिकार संगठन अवामी एक्शन कमेटी (एएसी) के नेतृत्व में प्रदर्शन किया था। प्रदर्शनकारियों ने सरकारी अधिकारियों की आलीशान जीवनशैली की आलोचना की, जबकि स्थानीय लोग गेहूं और बिजली जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे थे। पाकिस्तानी अधिकारियों की हिंसक कार्रवाई में 10 लोगों की मौत हो गई और सरकार ने इंटरनेट बंद कर दिया।
रिपोर्ट में कहा गया, “मुजफ्फराबाद में युवाओं के विरोध प्रदर्शन पर इतनी कठोर प्रतिक्रिया पाकिस्तान में कोई असामान्य बात नहीं है। यह दरअसल एक बड़े मुद्दे का संकेत है। नेताओं को वास्तविक डर है कि पूरे महाद्वीप में फैल रहे तथाकथित जेन-ज़ी के विरोध प्रदर्शनों की लहर पाकिस्तान तक भी पहुंच सकती है।”
रिपोर्ट के अनुसार, दशकों से पाकिस्तान में छात्र संघों पर प्रतिबंध लगा हुआ है, जो संगठित छात्र आंदोलनों के प्रति राज्य के गहरे डर को दर्शाता है।
रिपोर्ट में कहा गया, “बांग्लादेश और नेपाल के उलट, जहां स्टूडेंट्स पॉलिटिकली अवेयर और एक्टिव हैं, पाकिस्तानी कैंपस पर कड़ी नज़र रखी जाती है, जहां बोलने की आज़ादी या पॉलिटिकल राय के लिए कोई प्लेटफ़ॉर्म नहीं है। पाकिस्तानी यूनिवर्सिटीज़ में भी स्टूडेंट्स के गायब होने की लहर आई है, खासकर बलूच स्टूडेंट्स, जिन्होंने लंबे समय से सरकार पर बलूचिस्तान के अमीर रिसोर्सेज़ का इस्तेमाल करने और लोकल आबादी को अलग-थलग करने का आरोप लगाया है।”
रिपोर्ट में कहा गया कि पाकिस्तान के कई शिक्षित और कुशल युवा देश में किसी सार्थक बदलाव की उम्मीद नहीं देखते। जिंदा रहने के लिए चुप रहना या अपना देश छोड़ देना ही अब उनके पास बचे दो विकल्प बन गए हैं।
--आईएएनएस
एवाई/डीएससी
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
बौद्ध कूटनीति के जरिए श्रीलंका में पकड़ मजबूत कर रहा चीन : रिपोर्ट
कोलंबो, 5 मार्च (आईएएनएस)। श्रीलंका में बौद्ध मूल्यों को व्यवस्थित रूप से कमजोर करने और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) के एजेंडे को गहराई से स्थापित करने की एक सोची-समझी रणनीति चल रही है। ये दिखने में सांस्कृतिक कूटनीति लगती है, पर वास्तव में है वैचारिक घुसपैठ। श्रीलंका को सावधानी से आगे बढ़ना होगा, ताकि आर्थिक निर्भरता के बदले अपनी सदियों पुरानी बौद्ध विरासत को दांव पर न लगाना पड़े। यह दावा गुरुवार को प्रकाशित एक रिपोर्ट में किया गया।
श्रीलंकाई मीडिया आउटलेट सीलोन वायर न्यूज की एक रिपोर्ट में कहा गया, “श्रीलंका, जिसे लंबे समय से थेरवाद बौद्ध धर्म की जन्मस्थली के रूप में सम्मानित किया जाता रहा है, अब अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान के एक सूक्ष्म लेकिन गहरे नुकसान का सामना कर रहा है। इस परिवर्तन के केंद्र में चीन द्वारा बौद्ध धर्म को एक सॉफ्ट-पावर उपकरण के रूप में इस्तेमाल करना है, जिसे उसकी व्यापक कम्युनिस्ट पार्टी की रणनीति के साथ सावधानीपूर्वक जोड़ा गया है। भले ही बीजिंग की पहले मित्रता और साझा विरासत की भाषा में प्रस्तुत की जाती हो, लेकिन वास्तविकता में इसके पीछे वैचारिक घुसपैठ और सांस्कृतिक हेरफेर छिपा है।”
रिपोर्ट के अनुसार, चीन ने लंबे समय से धर्म को कूटनीति के एक उपकरण के रूप में पहचाना है। श्रीलंका में जहां बौद्ध धर्म की गहरी आध्यात्मिक जड़ें हैं, बीजिंग के लिए यह स्वाभाविक प्रवेश द्वार बन जाता है। चीन मंदिरों के पुनर्निर्माण, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और तीर्थ यात्राओं को प्रायोजित करता है। साथ ही खुद को बौद्ध विरासत के संरक्षक के रूप में प्रस्तुत करता है।
रिपोर्ट के अनुसार, फिर भी इस दिखावे के पीछे एक सुनियोजित प्रयास छिपा है, जिसका उद्देश्य श्रीलंका की बौद्ध संस्थाओं को कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ चाइना (सीसीपी) के विश्वदृष्टिकोण के साथ जोड़ना है। विद्वानों ने नोट किया है कि चीन की बौद्ध कूटनीति केवल सांस्कृतिक समानता तक सीमित नहीं है; यह सीसीपी की विदेश नीति की एक आवश्यकता है, जिसका उद्देश्य उसकी छवि को नरम बनाना है और साथ ही राज्य-से-राज्य संबंधों के साथ पार्टी-से-पार्टी संबंधों को भी मजबूत करना है।”
इसमें कहा गया, “हंबनटोटा पोर्ट जैसे महंगे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की वजह से श्रीलंका को लोन चुकाने में मुश्किल हो रही है, जिससे उसे ऐसी रियायतें देनी पड़ रही हैं जिनसे चीनी कंट्रोल और गहरा हो गया है। हाल ही में, समझौते ईंट-पत्थर से आगे बढ़ गए हैं, जो श्रीलंका के डिजिटल इकॉनमी प्लान को साफ तौर पर चीनी इन्वेस्टमेंट से जोड़ते हैं। यह सिर्फ फाइनेंशियल मदद के बारे में नहीं है, यह चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के आइडियोलॉजिकल फ्रेमवर्क को देश के शासन में शामिल करने के बारे में है।”
रिपोर्ट में आगे कहा गया, “आर्थिक सहयोग को सामूहिक समृद्धि और आज्ञाकारिता से जुड़े सीसीपी के नैरेटिव के साथ जोड़कर, बीजिंग यह सुनिश्चित करता है कि उसका राजनीतिक एजेंडा श्रीलंका की संस्थाओं में गहराई तक प्रवेश करे। इस आर्थिक पकड़ के साथ-साथ चीन की बौद्ध सॉफ्ट-पावर रणनीति आध्यात्मिक कथाओं को भी इस तरह ढालती है कि वे उसके अधिनायकवादी दृष्टिकोण के अनुरूप हों। इस तरह भौतिक और आध्यात्मिक निर्भरता मिलकर प्रभाव का दोहरा मोर्चा बनाती हैं, जो श्रीलंका की संप्रभुता को कमजोर करता है और उसकी सांस्कृतिक पहचान को धीरे-धीरे पुनर्परिभाषित करता है।”
रिपोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि इस वैचारिक घुसपैठ को रोका नहीं गया, तो यह सदियों पुरानी आध्यात्मिक विरासत को कमजोर कर सकती है और “श्रीलंका की बौद्ध संस्थाओं को विदेशी प्रचार का साधन बना सकती है, बजाय इसके कि वे शाश्वत ज्ञान की संरक्षक बनी रहें।”
--आईएएनएस
एवाई/डीएससी
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