क्या योगासन केवल उम्रदराज और बीमार लोगों के लिए है? आयुष मंत्रालय से जानें मिथक और तथ्य
नई दिल्ली, 5 मार्च (आईएएनएस)। योग एक प्राचीन भारतीय परंपरा है, जो न केवल शरीर बल्कि मन के लिए भी बेहद जरूरी है। योगासन मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाती है, लेकिन योग को लेकर कई तरह की गलतफहमियां या मिथक फैले हुए हैं, जो लोगों को इससे दूर रखते हैं। ऐसे में भारत सरकार के आयुष मंत्रालय ने ऐसे मिथकों को दूर करने के लिए तथ्यों के साथ जानकारी दी है।
मंत्रालय के अनुसार, एक प्रमुख मिथक यह है कि योग सिर्फ बुजुर्ग लोगों या स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिए है, लेकिन तथ्य यह है कि योग सिर्फ बुजुर्गों या स्वास्थ्य समस्याओं वाले लोगों के लिए नहीं है। यह एक सार्वभौमिक और बहुमुखी अभ्यास है जो सभी उम्र के लोगों और हर फिटनेस स्तर के व्यक्तियों के लिए फायदेमंद है। बच्चे, युवा, मध्यम आयु वर्ग और बुजुर्ग – सभी योग से लाभ उठा सकते हैं। योग किसी धर्म या उम्र से बंधा नहीं है। यह एक स्वस्थ जीवनशैली का हिस्सा है।
योग के लिए यह भी धारणा है कि इसके लिए बहुत लचीला होना जरूरी है। तथ्य यह है कि नियमित अभ्यास से लचीलापन खुद बढ़ता है। योग को लेकर ये भी एक गलत धारणा है कि योग महिलाओं या धीमे व्यायाम पसंद करने वालों के लिए है, लेकिन ऐसा नहीं है, पुरुष, एथलीट और सभी योग से फिटनेस बढ़ा सकते हैं।
एक्सपर्ट के अनुसार, योग का अभ्यास शरीर में ऑक्सीजन युक्त रक्त के संचार को बेहतर बनाता है, इंद्रियों को नियंत्रित करता है और मन-आत्मा में शांति लाता है। यह तनाव, चिंता, हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटिज जैसी समस्याओं की रोकथाम और प्रबंधन में भी उपयोगी है।
योग के आठ अंग – यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि है, जो जीवन के हर पहलू को संतुलित करने में कारगर हैं। योग को लेकर अन्य आम मिथक भी हैं, जैसे- योग सिर्फ शारीरिक व्यायाम या स्ट्रेचिंग है– जबकि यह मन और आत्मा का भी अभ्यास है।
दिनचर्या में योगासन को शामिल करने से तन को लचीलापन, ताकत, संतुलन तो मन को तनाव कम करने, बेहतर नींद और शांति में मदद करता है। यह किसी भी उम्र में शुरू किया जा सकता है और व्यक्ति की क्षमता के अनुसार आसन, प्राणायाम और ध्यान का अभ्यास किया जा सकता है।
--आईएएनएस
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हॉर्मुज में सिर्फ चीन की 'एंट्री' और भारत की 'नो-एंट्री', ईरान के इस दांव पर क्या है दिल्ली का मास्टरप्लान?
ईरान और इजरायल-अमेरिका के बीच चल रही जंग अब समंदर के उस रास्ते तक पहुंच गई है जिसे दुनिया की 'तेल की नस' कहा जाता है. ईरान की सेना (IRGC) ने आधिकारिक तौर पर एलान कर दिया है कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) अब अमेरिका, इजरायल, यूरोप और उनके साथ देने वाले किसी भी देश के जहाजों के लिए बंद है. ईरान ने दो टूक शब्दों में चेतावनी दी है कि अगर इस रास्ते में इनका कोई भी जहाज दिखा, तो उसे फौरन निशाना बनाया जाएगा.
सिर्फ चीन को 'वीआईपी' ट्रीटमेंट क्यों?
इस पूरे तनाव के बीच ईरान ने एक बड़ा कूटनीतिक कार्ड खेला है. उसने कहा है कि इस रास्ते से सिर्फ चीन के झंडे वाले जहाजों को ही निकलने की इजाजत होगी. ईरान का कहना है कि यह चीन के लिए एक 'तोहफा' है क्योंकि जंग शुरू होने के बाद से ही बीजिंग ने तेहरान का साथ दिया है. इस फैसले ने दुनिया को दो हिस्सों में बांट दिया है. एक तरफ चीन जिसे छूट मिली है, और दूसरी तरफ बाकी दुनिया जिसके लिए तेल का संकट खड़ा हो गया है.
दुनिया के तेल की नस पर कब्जा
हॉर्मुज की खाड़ी कितनी अहम है, इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि सऊदी अरब, यूएई, कुवैत, इराक और कतर जैसे बड़े तेल उत्पादक देश इसी रास्ते से अपना तेल दुनिया भर में भेजते हैं. समंदर में इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है जिससे ये देश अपना माल बाहर भेज सकें. ईरान का कहना है कि जंग के दौरान उसे अपने इलाके के रास्ते को कंट्रोल करने का पूरा हक है, हालांकि दुनिया के बाकी देश इसे गलत मान रहे हैं.
क्या है ईरान की जिद्द?
इंटरनेशनल कानून (UNCLOS) के मुताबिक, हॉर्मुज की खाड़ी एक ऐसा रास्ता है जिससे किसी भी देश का जहाज, यहां तक कि युद्धपोत भी बिना रोक-टोक के निकल सकता है. लेकिन ईरान इस कानून को नहीं मानता. उसका कहना है कि उसके देश का कानून अंतरराष्ट्रीय नियमों से ऊपर है. इस जिद की वजह से अब समंदर में टकराव की स्थिति पैदा हो गई है. अगर अमेरिकी या यूरोपीय जहाज यहां से निकलने की कोशिश करते हैं, तो सीधी जंग शुरू हो सकती ह.
भारत के लिए खतरे की घंटी
ईरान के इस फैसले ने भारत की धड़कनें बढ़ा दी हैं. भारत अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा तेल दूसरे देशों से खरीदता है और इसका एक बड़ा हिस्सा इसी खाड़ी के रास्ते आता है. अगर हॉर्मुज का रास्ता लंबे समय तक बंद रहता है, तो भारत में पेट्रोल-डीजल की किल्लत हो सकती है और उनकी कीमत (Price) बहुत ज्यादा बढ़ सकती है. भारत के लिए यह मामला सिर्फ तेल का नहीं, बल्कि अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने का भी है.
जयशंकर का एक्शन और डिप्लोमेसी
हालात की गंभीरता को देखते हुए भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने मोर्चा संभाल लिया है. उन्होंने पिछले कुछ दिनों में दूसरी बार ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची से बात की है. भारत कोशिश कर रहा है कि बातचीत के जरिए कोई बीच का रास्ता निकाला जाए ताकि तेल की सप्लाई न रुके. भारत की डिप्लोमेसी इस समय इसी बात पर टिकी है कि ईरान के साथ दोस्ती भी बनी रहे और हमारे जहाजों को भी सुरक्षित रास्ता मिल सके.
सऊदी और पड़ोसी देशों की टेंशन
ईरान के इस एलान ने सिर्फ पश्चिमी देशों को ही नहीं, बल्कि उसके पड़ोसी देशों सऊदी अरब और कुवैत को भी मुश्किल में डाल दिया है. इन देशों की पूरी कमाई तेल बेचने से होती है. अगर रास्ता बंद रहता है, तो इनके पास तेल तो होगा लेकिन उसे खरीदने वाला कोई नहीं पहुंच पाएगा. फिलहाल पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या अमेरिका और उसके साथी देश इस रास्ते को बलपूर्वक (Forcefully) खोलने की कोशिश करेंगे या फिर बातचीत से बात बनेगी.
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