कितने दिन सीएम और सांसद दोनों पदों पर काबिज रह सकते हैं नीतीश कुमार, जानें क्या कहता है नियम?
बिहार की राजनीति में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है. बीते 24 घंटे में एसी सियासी हवा चली कि बिहार में बड़ी उठा-पटक देखने को मिली. जी हां मुख्यमंत्री बनने में महारथ हासिल कर चुके नीतीश कुमार ने अब संसद के उच्च सदन की ओर रुख कर लिया है. नीतीश कुमार चुनाव जीत जाते हैं तो विधानसभा के बाद आप उन्हें राज्यसभा में अपनी दलीलें रखते देख सकेंगे. उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से जानकारी देते हुए कहा कि सार्वजनिक जीवन की शुरुआत से ही उनकी इच्छा रही है कि वह संसद के दोनों सदनों का सदस्य बनें.
उनके इस ऐलान के बाद राज्य की सियासत में नए समीकरणों को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं और यह कयास लगाए जा रहे हैं कि बिहार को जल्द ही नया मुख्यमंत्री मिल सकता है. हालांकि वह कौन होगा इसको लेकर फिलहाल स्थिति साफ नहीं है. लेकिन यहां सवाल उठ रहा है कि आखिर राज्यसभा के सदस्य बनने के बाद क्या नीतीश कुमार सीएम पद पर भी काबिज रह सकते हैं. अगर हां तो कितने दिन तक . आइए जानते हैं कि सवाल का जवाब.
कब तक मुख्यमंत्री बने रह सकते हैं नीतीश कुमार
संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार, अगर वे चाहें तो कुछ समय तक मुख्यमंत्री पद पर बने रह सकते हैं. लेकिन राजनीतिक परंपराओं और परिस्थितियों को देखते हुए नेतृत्व परिवर्तन की संभावनाओं पर चर्चा शुरू हो गई है.
6 महीने तक पद पर बने रहने का संवैधानिक प्रावधान
भारतीय संविधान में मुख्यमंत्री पद को लेकर स्पष्ट नियम मौजूद हैं. संविधान के अनुच्छेद 164(1) के तहत राज्यपाल मुख्यमंत्री की नियुक्ति करते हैं. वहीं अनुच्छेद 164(4) में यह प्रावधान है कि यदि कोई व्यक्ति विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य नहीं है, तब भी वह छह महीने तक मुख्यमंत्री के पद पर रह सकता है.
इसका मतलब यह है कि अगर नीतीश कुमार विधान परिषद की सदस्यता छोड़कर राज्यसभा के लिए चुने जाते हैं, तो भी वह अधिकतम छह महीने यानी 180 दिन तक मुख्यमंत्री बने रह सकते हैं. इस अवधि के भीतर उन्हें किसी सदन की सदस्यता लेनी होगी, अन्यथा पद छोड़ना अनिवार्य होगा.
संवैधानिक व्यवस्था का यह प्रावधान ऐसे समय में स्थिरता बनाए रखने के लिए बनाया गया है, ताकि सरकार के कामकाज पर अचानक असर न पड़े.
इस्तीफे की स्थिति में क्या होगा अगला कदम?
अगर नीतीश कुमार राज्यसभा जाने से पहले मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने का फैसला करते हैं, तो इसके बाद पूरी प्रक्रिया राज्यपाल के स्तर से आगे बढ़ती है. इस्तीफा स्वीकार होने के बाद राज्यपाल नई सरकार बनाने के लिए किसी अन्य नेता को आमंत्रित कर सकते हैं.
आमतौर पर ऐसी स्थिति में सत्तारूढ़ दल या गठबंधन की विधायक दल की बैठक होती है. इस बैठक में नए नेता का चयन किया जाता है, जिसे विधायक दल का नेता चुना जाता है. इसके बाद राज्यपाल उसे मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाते हैं.
बिहार की वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए, संभावित उत्तराधिकारी को लेकर कई नामों की चर्चा भी शुरू हो चुकी है. हालांकि अंतिम निर्णय पार्टी नेतृत्व और विधायक दल की सहमति से ही लिया जाएगा.
सोशल मीडिया पर साझा किया अपना संदेश
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सोशल मीडिया पर अपने संदेश में जनता के समर्थन के लिए आभार जताया. उन्होंने कहा कि पिछले दो दशकों से अधिक समय से बिहार की जनता ने उन पर विश्वास बनाए रखा है और उसी विश्वास के बल पर उन्होंने राज्य की सेवा की है.
उन्होंने लिखा कि बिहार आज विकास और सम्मान के नए आयाम स्थापित कर रहा है और इसमें जनता के समर्थन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि सार्वजनिक जीवन की शुरुआत से ही उनके मन में यह इच्छा रही है कि वह संसद और राज्य विधानमंडल दोनों के सदनों में प्रतिनिधित्व करें.
नई सरकार को देंगे मार्गदर्शन
अपने संदेश में नीतीश कुमार ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्यसभा जाने के बाद भी उनका बिहार से संबंध कमजोर नहीं होगा. उन्होंने भरोसा दिलाया कि जो भी नई सरकार बनेगी, उसे उनका पूरा सहयोग और मार्गदर्शन मिलता रहेगा.
उन्होंने यह भी कहा कि विकसित बिहार का सपना उनका प्रमुख लक्ष्य है और इस दिशा में वह आगे भी सक्रिय भूमिका निभाते रहेंगे. नीतीश कुमार के इस निर्णय ने बिहार की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है. अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि राज्य में अगला मुख्यमंत्री कौन बनेगा और आने वाले दिनों में सत्ता का समीकरण किस दिशा में आगे बढ़ेगा.
बिहार की सियासत में अब सबसे बड़े परिवर्तन पर विपक्ष यानी राष्ट्रीय जनता दल की भी नजरें टिकी हुई हैं. वहीं राजीव संजन उर्फ पप्पू यादव पहले ही नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने को लेकर सवाल उठा चुके हैं. उनका कहना है कि आखिर ऐसी क्या वजह रही कि सरकार बनाने के बाद इतनी जल्दी नीतीश कुमार को राज्यसभा के लिए भेज दिया गया है.
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