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​अमेरिका-ईरान जंग का भारत पर बड़ा असर: खाद्य तेल और उर्वरक होंगे महंगे, शिपिंग कंपनियों ने कंटेनरों पर लगाया, 'युद्ध अधिभार'

नई दिल्ली : पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच गहराते सैन्य संकट का सीधा असर अब भारतीय अर्थव्यवस्था और आम उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ने वाला है। इस अंतरराष्ट्रीय तनाव के कारण भारत के लिए आवश्यक खाद्य तेल और खेती के लिए जरूरी उर्वरकों के आयात में बड़ी रुकावट आने की आशंका पैदा हो गई है।

हालात की गंभीरता को भुनाते हुए कई अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियों ने पश्चिम एशिया के रास्ते गुजरने वाले मालवाहक पोतों पर भारी 'युद्ध अधिभार' लगाना शुरू कर दिया है, जिससे माल ढुलाई और बीमा की लागत बेतहाशा बढ़ गई है। उद्योग संगठनों को डर है कि जल्द ही भारत में इन जरूरी चीजों की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है।

​शिपिंग कंपनियों की मनमानी, आयात लागत में हुआ भारी इजाफा

​उद्योग संगठनों ने सोमवार को स्पष्ट किया कि युद्ध के हालात के बीच शिपिंग कंपनियों ने अपने दाम आसमान पर पहुंचा दिए हैं। फ्रांस की प्रमुख कंटेनर शिपिंग कंपनी 'सीएमए सीजीएम' (CMA CGM) ने तो पश्चिम एशिया मार्ग से आने वाले प्रति कंटेनर पर 2,000 डॉलर से लेकर 4,000 डॉलर के बीच का भारी-भरकम अधिभार लगाना शुरू कर दिया है।

इसके साथ ही जहाजों के बीमा प्रीमियम में भी काफी बढ़ोतरी की जा रही है। इसका सीधा परिणाम यह होगा कि आयात होने वाला हर कच्चा माल महंगा हो जाएगा। इसके अलावा, इस तनाव से पश्चिम एशिया और यूरोप को होने वाला भारतीय कृषि जिंसों का निर्यात भी बुरी तरह प्रभावित होने की संभावना है।

​सूरजमुखी तेल की आपूर्ति पर संकट, बदलने पड़ सकते हैं समुद्री रास्ते

​भारत हर साल लगभग 1.6 करोड़ टन खाद्य तेल का आयात करता है, जिसमें सूरजमुखी तेल की हिस्सेदारी करीब 20 प्रतिशत होती है। यह तेल मुख्य रूप से रूस, यूक्रेन और अर्जेंटीना से आयात किया जाता है। सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के कार्यकारी निदेशक बीवी मेहता के अनुसार, फिलहाल आपूर्ति पर तत्काल कोई बड़ा असर नहीं पड़ा है, लेकिन यदि युद्ध लंबे समय तक खिंचता है, तो निर्यातकों को दूसरा और लंबा समुद्री रास्ता अपनाना पड़ेगा। इस बदलाव से ऊर्जा और लॉजिस्टिक की लागत काफी बढ़ जाएगी। भारतीय वनस्पति तेल उत्पादक संघ ने भी चेतावनी दी है कि अमेरिका-ईरान तनाव से भारत के खाद्य तेल बाजार और कच्चे तेल की कीमतों पर महंगाई का भारी दबाव पड़ेगा।

​खरीफ सीजन से ठीक पहले उर्वरकों का गहराता संकट

​खाद्य तेल के अलावा सबसे बड़ा खतरा भारतीय कृषि और किसानों पर मंडरा रहा है। घुलनशील उर्वरक उद्योग संघ के अध्यक्ष राजीब चक्रवर्ती ने बताया कि मौजूदा स्थिति के कारण पश्चिम एशिया को होने वाला निर्यात अभी पूरी तरह ठप पड़ा हुआ है। जून से शुरू होने वाले महत्वपूर्ण घरेलू खरीफ बुवाई सत्र से ठीक पहले डीएपी (DAP) और एसएसपी (SSP) जैसे उर्वरक बनाने के लिए आवश्यक कच्चे माल की आपूर्ति बाधित होने को लेकर गहरी चिंता जताई जा रही है।

युद्ध के कारण कई बंदरगाह बंद हो गए हैं, जिससे कंटेनरों की भारी कमी और जाम की स्थिति बन गई है। यह चिंता का विषय इसलिए भी है क्योंकि भारत अपने कुल गंधक (सल्फर) आयात का 76 फीसदी हिस्सा अकेले कतर, संयुक्त अरब अमीरात और ओमान से मंगाता है, जो सीधे तौर पर इस युद्ध क्षेत्र से प्रभावित हैं।

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SC का ऐतिहासिक फैसला: AI से बने फर्जी फैसलों का इस्तेमाल अब माना जाएगा 'गंभीर न्यायिक दुराचार', भुगतने होंगे गंभीर नतीजे

नई दिल्ली : भारतीय न्यायपालिका में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते दुरुपयोग पर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद सख्त रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि अदालत में एआई द्वारा तैयार किए गए फर्जी या काल्पनिक फैसलों का इस्तेमाल अब केवल 'निर्णय की गलती' या मानवीय भूल नहीं माना जाएगा, बल्कि इसे सीधे तौर पर गंभीर 'न्यायिक दुराचार' की श्रेणी में रखा जाएगा।

न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और आलोक आराधे की पीठ ने इस गंभीर मामले का संज्ञान लेते हुए अटॉर्नी जनरल, सॉलिसिटर जनरल और बार काउंसिल ऑफ इंडिया को नोटिस जारी कर उनसे जवाब मांगा है। अदालत ने साफ कर दिया है कि न्यायपालिका की सत्यनिष्ठा से खिलवाड़ करने वालों को इसके कानूनी परिणाम भुगतने होंगे और हर हाल में निर्णय केवल प्रामाणिक कानूनी नजीरों के आधार पर ही लिए जाने चाहिए।

​आंध्र प्रदेश के ट्रायल कोर्ट से सामने आया यह सनसनीखेज मामला

​सुप्रीम कोर्ट में यह पूरा विवाद तब पहुंचा जब आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के एक आदेश को चुनौती दी गई। दरअसल, आंध्र प्रदेश की एक निचली अदालत ने एक संपत्ति विवाद के मामले में एडवोकेट-कमिश्नर की रिपोर्ट पर आपत्तियों को खारिज कर दिया था। ट्रायल कोर्ट ने पिछले साल अगस्त में दिए गए अपने आदेश में कुछ ऐसे पुराने फैसलों का हवाला दिया, जो असल में कभी अस्तित्व में ही नहीं थे।

जब याचिकाकर्ताओं ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी, तो यह चौंकाने वाला सच सामने आया कि वे सभी फैसले एआई (AI) द्वारा तैयार किए गए पूरी तरह से फर्जी और मनगढ़ंत दस्तावेज थे। हाईकोर्ट ने हालांकि ट्रायल कोर्ट को चेतावनी दी, लेकिन मामले को मेरिट पर तय कर दिया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरी न्यायिक प्रक्रिया की ईमानदारी और पवित्रता की जांच के लिए मोर्चा संभाल लिया है और ट्रायल कोर्ट को उस विवादित रिपोर्ट के आधार पर आगे बढ़ने से फिलहाल रोक दिया है।

​न्याय प्रणाली की साख पर सवाल, श्याम दीवान बने एमिकस क्यूरी

​सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान को अदालत की सहायता के लिए नियुक्त किया है। पीठ ने स्पष्ट किया कि यह मुद्दा केवल किसी एक केस के फैसले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरी न्याय वितरण प्रणाली की साख पर सीधा प्रहार करता है।

अदालत ने चिंता जताई है कि जहां एआई का उपयोग आधिकारिक तौर पर स्वीकृत नहीं है, वहां भी इसका चलन तेजी से बढ़ रहा है, जो कानूनी प्रक्रिया की गरिमा को भारी नुकसान पहुंचा रहा है। शीर्ष अदालत अब यह तय करेगी कि एआई निर्मित गैर-मौजूद फैसलों के उपयोग के क्या परिणाम होंगे और इसके लिए किसकी जवाबदेही तय की जाएगी। मामले की अगली सुनवाई 10 मार्च के लिए तय की गई है।

​वकीलों की मनमानी पर भी कोर्ट सख्त, 'मर्सी बनाम मैनकाइंड' का दिया हवाला

​एआई का यह सिरदर्द सिर्फ निचली अदालतों के जजों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि कई वकील भी याचिकाएं ड्राफ्ट करने के लिए इसका अंधाधुंध इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे शीर्ष अदालत बेहद नाराज है। हाल ही में 17 फरवरी को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने एक अलग मामले की सुनवाई के दौरान वकीलों द्वारा 'मर्सी बनाम मैनकाइंड' जैसे पूरी तरह से फर्जी केसों का हवाला देने पर गहरी चिंता जताई थी।

राजनीतिक भाषणों पर दिशा-निर्देश मांगने वाली एक जनहित याचिका को ड्राफ्ट करने में भी वकीलों ने एआई का सहारा लिया था। सुप्रीम कोर्ट ने सख्त हिदायत देते हुए कहा है कि यदि कोई न्यायाधीश या वकील जानबूझकर या लापरवाही से ऐसे कानूनी स्रोतों का इस्तेमाल करता है जो मौजूद ही नहीं हैं, तो उन्हें गंभीर कानूनी परिणामों का सामना करना ही होगा।

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