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Middle East Crisis: निवेशकों के लिए Safe Haven बना सोना, Share Market में बड़ी गिरावट

अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर बड़े हमले किए जाने के बाद निवेशकों ने सुरक्षित निवेश की ओर रुख किया, जिसके चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों में जोरदार उछाल देखा गया है। मौजूद जानकारी के अनुसार स्पॉट गोल्ड की कीमत करीब 2 प्रतिशत से ज्यादा बढ़कर 5,390 डॉलर प्रति औंस के आसपास पहुंच गई, जो जनवरी के बाद का उच्चतम स्तर है। वहीं अमेरिकी गोल्ड फ्यूचर्स में भी करीब 3 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई है।

गौरतलब है कि इन हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की मौत की खबर ने बाजारों में भूचाल ला दिया। इससे मध्य पूर्व में व्यापक युद्ध की आशंका गहरा गई है। विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए तेल आपूर्ति बाधित होने की संभावना ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। बता दें कि यह जलमार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद अहम माना जाता है।

इजरायली बलों ने तेहरान में सैन्य और कमांड ढांचे को निशाना बनाया, जिसके जवाब में ईरान ने भी मिसाइल हमले किए। इस घटनाक्रम के बाद वैश्विक शेयर बाजारों में गिरावट और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल देखा गया। ऐसे माहौल में सोना पारंपरिक सुरक्षित निवेश के रूप में फिर से आकर्षण का केंद्र बन गया है।

विश्लेषकों का मानना है कि यदि क्षेत्रीय तनाव और बढ़ता है या ऊर्जा आपूर्ति में बाधा आती है तो सोने की कीमतों को और सहारा मिल सकता है। बढ़ती तेल कीमतें महंगाई की आशंकाओं को जन्म देती हैं, जबकि वास्तविक ब्याज दरों में सीमित बढ़ोतरी भी सोने के पक्ष में माहौल बनाती है।

कुछ बाजार रणनीतिकारों ने संकेत दिया है कि 5,400 डॉलर प्रति औंस का स्तर अहम माना जा रहा है। यदि तेजी बरकरार रहती है तो कीमतें साल के अंत तक 6,000 डॉलर प्रति औंस तक भी पहुंच सकती हैं। बता दें कि इस वर्ष अब तक सोना करीब 25 प्रतिशत तक चढ़ चुका है, जिसका मुख्य कारण भू-राजनीतिक जोखिम, केंद्रीय बैंकों की खरीद और अमेरिकी फेडरल रिजर्व की संभावित नरम मौद्रिक नीति है।

अन्य कीमती धातुओं में भी हलचल देखी गई। चांदी की कीमतों में करीब 2.5 प्रतिशत की तेजी आई, जबकि प्लेटिनम में मामूली गिरावट दर्ज की गई। औद्योगिक धातुओं में कॉपर की कीमतें सीमित दायरे में रहीं।

मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव ने वैश्विक बाजारों को फिर से अनिश्चितता के दौर में धकेल दिया है। जब तक हालात स्पष्ट नहीं होते, सुरक्षित निवेश के तौर पर सोने की मांग मजबूत बनी रह सकती है और निवेशक जोखिम वाले एसेट से दूरी बनाए रख सकते हैं।

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Middle East में बढ़ा तनाव, Crude Oil की कीमतों से Corporate India पर मंडराया बड़ा आर्थिक संकट।

मिडिल ईस्ट में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारत की कई बड़ी लीस्टेड कंपनियां अपने क्षेत्रीय जोखिम का आकलन करने में जुटी हैं। अमेरिका और इजरायल के ईरान पर हमलों के बाद हालात संवेदनशील बने हुए हैं। मौजूद जानकारी के अनुसार इंफ्रास्ट्रक्चर, एविएशन, ऊर्जा, उपभोक्ता वस्तुएं, लॉजिस्टिक्स और फार्मा समेत 30 से अधिक कंपनियां प्रत्यक्ष या परोक्ष जोखिम के दायरे में आ सकती हैं।

सबसे बड़ा फोकस होर्मुज पर है। बता दें कि दुनिया के लगभग 20% कच्चे तेल की सप्लाई इसी रास्ते से गुजरती है और भारत अपने कुल क्रूड आयात का 40% से अधिक इसी मार्ग से प्राप्त करता है। ब्रेंट क्रूड की कीमतें 80 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच चुकी हैं। विश्लेषकों का अनुमान है कि यदि आपूर्ति बाधित होती है तो कीमतें 90 से 100 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती हैं। हर एक डॉलर की बढ़ोतरी से भारत के आयात बिल पर करीब 2 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ता है।

गौरतलब है कि मिडिल ईस्ट भारत के कुल माल निर्यात का लगभग 17% हिस्सा लेता है और कुल कच्चे तेल की 55% आपूर्ति करता है। इसके अलावा, भारत को मिलने वाले रेमिटेंस का बड़ा हिस्सा भी इसी क्षेत्र से आता है। ऐसे में संघर्ष लंबा खिंचता है तो इसका असर चालू खाते के घाटे और महंगाई दोनों पर पड़ सकता है।

तेल विपणन कंपनियां सबसे पहले झटका महसूस कर रही हैं। हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड, इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड और भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड जैसी कंपनियों के मार्जिन पर सीधा असर पड़ता है। ब्रेंट में हर एक डॉलर की बढ़ोतरी से इनके ईबीआईटीडीए में 7-9% तक गिरावट आ सकती है, यदि खुदरा कीमतों में बदलाव न किया जाए।

इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में लार्सन और टुब्रो का मिडिल ईस्ट एक्सपोजर सबसे ज्यादा है, जहां उसका बड़ा ऑर्डर बुक निर्भर है। इसके अलावा केईसी इंटरनेशनल और कल्पतरु प्रोजेक्ट्स इंटरनेशनल लिमिटेड की परियोजनाएं भी क्षेत्रीय स्थिरता पर निर्भर हैं। समुद्री मार्गों में रुकावट से प्रोजेक्ट निष्पादन और लागत दोनों प्रभावित हो सकते हैं।

एविएशन सेक्टर भी दबाव में है। इंडिगो की अंतरराष्ट्रीय क्षमता का बड़ा हिस्सा मिडिल ईस्ट से जुड़ा है। हवाई क्षेत्र में प्रतिबंध और एटीएफ कीमतों में वृद्धि दोहरा असर डाल सकती है। एयरपोर्ट और पोर्ट ऑपरेटर जैसे अदानी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन लिमिटेड और जीएमआर एयरपोर्ट्स लिमिटेड को भी माल ढुलाई और यात्री ट्रैफिक में गिरावट का जोखिम है।

गैस वितरण कंपनियां जैसे इंद्रप्रस्थ गैस लिमिटेड और गुजरात गैस लिमिटेड एलएनजी कीमतों में उछाल से प्रभावित हो सकती हैं। उर्वरक कंपनियों के लिए भी वैश्विक यूरिया कीमतों में बढ़ोतरी सब्सिडी बोझ बढ़ा सकती है।

उपभोक्ता और फार्मा सेक्टर की कई कंपनियों का 5-10% राजस्व मिडिल ईस्ट से आता है। ऑटो और टायर कंपनियों पर कच्चे तेल से जुड़े इनपुट कॉस्ट और फ्रेट चार्ज का दबाव बढ़ सकता है।

हालांकि इस पूरे परिदृश्य में डिफेंस सेक्टर संभावित लाभार्थी के रूप में उभर रहा है। रक्षा बजट में लगातार बढ़ोतरी और भू-राजनीतिक अस्थिरता के कारण भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड, हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड और डेटा पैटर्न्स इंडिया लिमिटेड जैसी कंपनियों के लिए अवसर बढ़ सकते हैं।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि होर्मुज कितने समय तक सुरक्षित और खुला रहता है। यदि आपूर्ति लंबे समय तक बाधित होती है तो यह केवल शेयर बाजार की अस्थायी गिरावट नहीं, बल्कि व्यापक आर्थिक दबाव का संकेत हो सकता है और कॉरपोरेट इंडिया के लिए यह दौर एक गंभीर परीक्षा साबित हो सकता है।

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  Sports

कहां हैं जिम्बाब्वे और वेस्टइंडीज के खिलाड़ी? इजरायल-ईरान युद्ध ने घर लौटने पर लगाया ब्रेक

Where are Zimbabwe and West Indies Cricket Teams: मिडिल ईस्ट में बढ़ते संकट की वजह से एयर ट्रैवल में रुकावट आई है. जिम्बाब्वे और वेस्टइंडीज की टीमें टी20 वर्ल्ड कप में अपने सफर समाप्त करने के बाद भी भारत में ही फंसी हुई हैं. ईरान-इजरायल के बीच बढ़ते तनाव के कारण कई हवाई रास्ते बंद कर दिए गए हैं, जिसके चलते टीमों को घर लौटने में देरी का सामना करना पड़ रहा है. Mon, 2 Mar 2026 23:48:20 +0530

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