बीते समय की कड़वाहट को भुला कर भारत और कनाडा संबंधों को प्रगाढ़ बनाने की दिशा में आगे बढ़े हैं और दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों की वार्ता के बाद जो समझौते किये गये वह ऐतिहासिक होने के साथ ही सामरिक महत्व वाले भी हैं। दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय वार्ता ने द्विपक्षीय संबंधों को नई दिशा देने का स्पष्ट संकेत दिया है। कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी की भारत यात्रा को दोनों देशों ने एक महत्वपूर्ण चरण माना है। संयुक्त वक्तव्य में दोनों प्रधानमंत्रियों ने स्पष्ट किया कि भारत और कनाडा साझा लोकतांत्रिक मूल्यों, विविधता के सम्मान और मानव कल्याण के प्रति प्रतिबद्धता के आधार पर अपने संबंधों को नई ऊंचाई पर ले जाना चाहते हैं।
वार्ता के दौरान दोनों देशों ने अपने संबंधों को अगले स्तर की साझेदारी में रूपांतरित करने पर सहमति व्यक्त की। आर्थिक सहयोग को प्राथमिकता देते हुए वर्ष 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को पचास अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते को शीघ्र अंतिम रूप देने का निर्णय लिया गया है। यह समझौता वस्तुओं और सेवाओं के व्यापार, निवेश, प्रौद्योगिकी सहयोग और बाजार पहुंच को व्यापक बनाएगा। इससे दोनों देशों में निवेश प्रवाह बढ़ेगा और रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे।
कनाडा के पेंशन कोषों द्वारा भारत में लगभग एक सौ अरब डॉलर का निवेश पहले ही किया जा चुका है, जो भारत की विकास यात्रा में उनके विश्वास को दर्शाता है। भविष्य में अवसंरचना, हरित ऊर्जा, प्रौद्योगिकी और विनिर्माण क्षेत्रों में निवेश बढ़ने की संभावना है। ऊर्जा सहयोग इस साझेदारी का केंद्रीय आधार बनकर उभरा है। सिविल परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में दीर्घकालिक यूरेनियम आपूर्ति समझौता दोनों देशों के संबंधों की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती मिलेगी और स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन में स्थिरता आएगी। छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर और उन्नत रिएक्टर तकनीकों पर सहयोग से भारत की परमाणु ऊर्जा क्षमता को आधुनिक और लचीला स्वरूप मिलेगा।
हरित ऊर्जा के क्षेत्र में भी दोनों देशों ने नवीकरणीय ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन और ऊर्जा भंडारण पर मिलकर काम करने का संकल्प लिया है। कनाडा द्वारा अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन और वैश्विक जैव ईंधन गठबंधन से जुड़ने का निर्णय इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। महत्वपूर्ण खनिजों पर हुए समझौते से आपूर्ति शृंखला को सुरक्षित और विविध बनाने में सहायता मिलेगी। लिथियम, निकेल, कोबाल्ट और अन्य रणनीतिक खनिजों के क्षेत्र में सहयोग भारत के विद्युत वाहन, सेमीकंडक्टर और स्वच्छ ऊर्जा उद्योग के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध होगा। इससे वैश्विक आपूर्ति शृंखला में भारत की भूमिका सुदृढ़ होगी और निर्भरता कम होगी।
रक्षा और सुरक्षा सहयोग भी वार्ता का प्रमुख विषय रहा। दोनों देशों ने रक्षा संवाद की स्थापना पर सहमति व्यक्त की है। समुद्री क्षेत्र जागरूकता, रक्षा उद्योग सहयोग और सैन्य आदान प्रदान को बढ़ाने पर बल दिया गया है। आतंकवाद, चरमपंथ और उग्रवाद के विरुद्ध साझा प्रयासों को और सशक्त बनाने का संकल्प भी दोहराया गया। प्रौद्योगिकी और नवाचार के क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम प्रौद्योगिकी, सुपर संगणना और सेमीकंडक्टर में सहयोग को बढ़ावा देने पर चर्चा हुई। विश्वविद्यालयों के बीच नई साझेदारियों और कनाडाई विश्वविद्यालयों के भारत में परिसर खोलने पर सहमति से शिक्षा क्षेत्र में नए अवसर उत्पन्न होंगे।
हिंद प्रशांत क्षेत्र में कनाडा की बढ़ती भागीदारी और भारतीय महासागर क्षेत्रीय संगठन में संवाद साझेदार बनने की उसकी रुचि से समुद्री सहयोग को नई गहराई मिलेगी। पश्चिम एशिया की स्थिति पर भी दोनों नेताओं ने संवाद और कूटनीति के माध्यम से समाधान की आवश्यकता पर बल दिया।
देखा जाये तो भारत और कनाडा के बीच उभरती यह नई साझेदारी केवल व्यापार वृद्धि का प्रयास नहीं है, बल्कि यह बदलते वैश्विक सामरिक परिदृश्य में एक व्यापक रणनीतिक संतुलन का संकेत है। ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज, रक्षा और प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में सहयोग दोनों देशों को दीर्घकालिक स्थिरता प्रदान करेगा। भारत के लिए यह साझेदारी ऊर्जा सुरक्षा, आपूर्ति शृंखला विविधीकरण और उच्च प्रौद्योगिकी तक पहुंच सुनिश्चित करने का माध्यम है। वहीं कनाडा के लिए भारत एक विशाल और गतिशील बाजार होने के साथ साथ हिंद प्रशांत क्षेत्र में विश्वसनीय साझेदार भी है।
सामरिक दृष्टि से यह सहयोग भारत की आत्मनिर्भरता, समुद्री सुरक्षा और प्रौद्योगिकी क्षमताओं को मजबूत करेगा। महत्वपूर्ण खनिज और परमाणु ऊर्जा सहयोग भारत को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अधिक सक्षम बनाएंगे। रक्षा संवाद और समुद्री सहयोग से क्षेत्रीय स्थिरता को बल मिलेगा। यदि प्रस्तावित आर्थिक समझौता समयबद्ध ढंग से पूर्ण होता है और घोषित पहलों को धरातल पर प्रभावी क्रियान्वयन मिलता है, तो भारत कनाडा संबंध आने वाले दशक में वैश्विक स्तर पर एक संतुलित, स्थायी और बहुआयामी साझेदारी का उदाहरण बन सकते हैं।
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तमिलनाडु विधानसभा चुनाव की आहट के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दौरा राजनीतिक और सांस्कृतिक दोनों दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। मदुरै और तिरुपरंकुंड्रम में आयोजित कार्यक्रमों के दौरान उन्होंने जहां राज्य की सत्तारुढ़ द्रमुक सरकार पर तीखा हमला बोला, वहीं दीपम अधिकार के मुद्दे को उठाने वाले एक श्रद्धालु के घर जाकर बड़ा संदेश भी दिया। इस कदम ने पूरे राज्य में व्यापक चर्चा को जन्म दिया है।
हम आपको बता दें कि प्रधानमंत्री ने तिरुपरंकुंड्रम स्थित श्री सुब्रह्मण्य स्वामी मंदिर में पूजा अर्चना की। यह मंदिर तमिल आस्था का प्रमुख केंद्र है और कार्तिगई दीपम पर्व के समय यहां विशेष महत्व होता है। पिछले वर्ष दीप प्रज्वलन अधिकार को लेकर हुए विवाद के दौरान एक युवा श्रद्धालु ने अपना जीवन समाप्त कर लिया था। इस घटना ने राज्य भर में भावनात्मक प्रतिक्रिया उत्पन्न की थी। प्रधानमंत्री ने उसी श्रद्धालु के घर जाकर उनके परिजनों से मुलाकात की। उन्होंने कहा कि उनका मन भारी है और किसी भी परिवार को ऐसी पीड़ा से नहीं गुजरना चाहिए। इस मुलाकात को प्रतीकात्मक रूप से उस भावना से जोड़ा जा रहा है कि केंद्र सरकार तमिल संस्कृति और धार्मिक परंपराओं के प्रति सम्मान रखती है। चुनावी माहौल में यह संदेश विशेष महत्व रखता है, क्योंकि द्रमुक पर आरोप लगते रहे हैं कि वह परंपरागत धार्मिक मुद्दों के प्रति संवेदनशील नहीं है।
साथ ही मदुरै की जनसभा में प्रधानमंत्री ने द्रमुक पर कई घोटालों में लिप्त होने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि सामान्यतः मंत्री अच्छे कार्यों में प्रतिस्पर्धा करते हैं, परंतु यहां मंत्री घोटालों में प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। उन्होंने स्थानांतरण, नौकरी, ठेका और बालू खनन से जुड़े कथित घोटालों का उल्लेख करते हुए कहा कि यह सरकार गरीबों, युवाओं और किसानों के अधिकारों की अनदेखी कर रही है। प्रधानमंत्री ने पूर्व मुख्यमंत्री के. कामराज का उल्लेख करते हुए उनकी ईमानदारी को आदर्श बताया और कहा कि आज की सत्ता उस परंपरा से भटक चुकी है। उन्होंने दावा किया कि राज्य की जनता परिवर्तन का मन बना चुकी है और आगामी चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को अवसर देगी, जिसमें अन्नाद्रमुक प्रमुख सहयोगी है।
प्रधानमंत्री ने साथ ही कच्चातीवु द्वीप का मुद्दा उठाते हुए कहा कि कच्चातीवु को श्रीलंका को सौंपे जाने पर तमिल हितों की अनदेखी हुई थी। उन्होंने यह भी कहा कि जल्लीकट्टु पर जब प्रतिबंध लगा था, तब केंद्र ने अध्यादेश के माध्यम से उसे जारी रखने का मार्ग प्रशस्त किया। जल्लीकट्टु तमिल पहचान का महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है। उन्होंने संसद भवन में सेंगोल की स्थापना का उल्लेख करते हुए कहा कि तमिल परंपरा को राष्ट्रीय सम्मान दिया गया है। इन उदाहरणों के माध्यम से उन्होंने यह संदेश देने का प्रयास किया कि केंद्र सरकार तमिल संस्कृति के गौरव को सुदृढ़ कर रही है।
प्रधानमंत्री ने साथ ही राज्य के उपमुख्यमंत्री उदयनीधि स्टालिन के उस बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कि उन्हें किसी से भय नहीं है। प्रधानमंत्री ने कहा कि लोकतंत्र में भय का स्थान नहीं होता। उन्होंने इसे लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का प्रमाण बताया। साथ ही उन्होंने कानून व्यवस्था, महिला सुरक्षा और मादक पदार्थों की समस्या का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि गठबंधन सत्ता में आता है तो अपराध और मादक जाल पर कठोर कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री जे जयललिता को स्मरण करते हुए कहा कि राज्य को सुशासन की दिशा में पुनः अग्रसर करना आवश्यक है।
देखा जाये तो तमिलनाडु लंबे समय से द्रविड़ राजनीति का गढ़ रहा है। ऐसे में प्रधानमंत्री का सीधे एक श्रद्धालु के घर जाकर संवेदना प्रकट करना केवल मानवीय पहल नहीं, बल्कि सांस्कृतिक जुड़ाव का संकेत भी है। इससे धार्मिक भावनाओं को सम्मान देने का संदेश गया है, जो ग्रामीण और पारंपरिक मतदाताओं को प्रभावित कर सकता है। आगामी विधानसभा चुनाव में यह विमर्श महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, क्योंकि सांस्कृतिक पहचान और भ्रष्टाचार के आरोप दोनों ही प्रमुख चुनावी विषय बनने जा रहे हैं। समग्र रूप से देखा जाए तो यह दौरा केवल विकास परियोजनाओं के शिलान्यास या जनसभा तक सीमित नहीं रहा। श्रद्धालु के घर की यात्रा ने इसे भावनात्मक आयाम दिया है, जिसने चुनावी परिदृश्य को नई दिशा देने की संभावना पैदा कर दी है।
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