Explainer: क्या होता है दिमागी नक्सल, कहां से शुरू हुआ ये शब्द और अब क्यों हो रही है चर्चा?
Explainer: देश में नक्सलवाद के खिलाफ सुरक्षा अभियानों की चर्चा के बीच अब एक नया राजनीतिक शब्द सुर्खियों में है 'दिमागी नक्सल'. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त 2026 को लाल किले से स्वतंत्रता दिवस के संबोधन में इस शब्द का इस्तेमाल किया. इसके बाद कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने इस पर सवाल उठाए. पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम ने तो खुद को 'दिमागी नक्सल' कहे जाने पर गर्व जताकर राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया.
आखिर दिमागी नक्सल का मतलब क्या है? क्या इसका संबंध बंदूक उठाने वाले नक्सलियों से है या उन लोगों से भी है, जो सरकार की नीतियों का विरोध करते हैं? इस शब्द की जड़ें समझने के लिए नक्सलवाद के इतिहास और इसके बदलते राजनीतिक इस्तेमाल को समझना जरूरी है.
क्या होता है दिमागी नक्सल?
'दिमागी नक्सल' कोई स्थापित कानूनी श्रेणी नहीं है. इसका इस्तेमाल ऐसे लोगों के लिए किया जा रहा है, जिन पर नक्सली या माओवादी विचारधारा का समर्थन करने का आरोप लगाया जाता है. हालांकि, इस शब्द की कोई सर्वमान्य और स्पष्ट परिभाषा नहीं है.
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने स्वतंत्रता दिवस संबोधन में कहा कि सशस्त्र नक्सलवाद कमजोर पड़ने के बावजूद नक्सली विचारधारा से प्रभावित लोग देश में अशांति फैलाने और युवाओं को गलत रास्ते पर ले जाने की कोशिश कर सकते हैं. उन्होंने ऐसे लोगों की पहचान करने और उन्हें अलग-थलग करने की बात कही.
इसके बाद बहस शुरू हुई कि आखिर किन लोगों को दिमागी नक्सल कहा जा सकता है. क्या यह शब्द केवल उन लोगों के लिए है जो सशस्त्र माओवादी संगठनों का समर्थन करते हैं, या सरकार की नीतियों की आलोचना करने वाले बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनीतिक विरोधियों को भी इसके दायरे में रखा जा सकता है?
यही इस विवाद का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है.
कहां से आया नक्सल शब्द?
नक्सल शब्द की उत्पत्ति पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलबाड़ी गांव से हुई. मई 1967 में यहां किसानों का विद्रोह शुरू हुआ था. इस आंदोलन के पीछे जमीन के बंटवारे, भूमिहीन किसानों के अधिकार और जमींदारी शोषण जैसे मुद्दे थे.
इस आंदोलन से जुड़े नेताओं ने माओवादी विचारधारा से प्रेरणा ली. माओत्से तुंग के विचारों के आधार पर सशस्त्र संघर्ष के जरिए सत्ता और सामाजिक व्यवस्था बदलने की रणनीति अपनाई गई. चारू मजूमदार इस आंदोलन के प्रमुख नेताओं में शामिल थे. 1969 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) यानी CPI (ML) का गठन हुआ, जिसने नक्सलवादी आंदोलन को संगठित राजनीतिक दिशा दी.
समय के साथ नक्सलवाद का विस्तार देश के कई हिस्सों में हुआ. खासकर आदिवासी क्षेत्रों, जंगलों और उन इलाकों में जहां जमीन, संसाधनों और विकास को लेकर असंतोष था. बाद के वर्षों में नक्सली संगठनों ने सशस्त्र हिंसा का रास्ता अपनाया और सुरक्षा बलों तथा सरकारी प्रतिष्ठानों पर हमले किए.
इस तरह नक्सलवाद की शुरुआत सामाजिक-आर्थिक असमानताओं से जुड़े आंदोलन के रूप में हुई, लेकिन बाद में उसका एक बड़ा हिस्सा सशस्त्र माओवादी विद्रोह से जुड़ गया.
दिमागी नक्सल और अर्बन नक्सल में क्या अंतर है?
'दिमागी नक्सल' से पहले भारतीय राजनीति और मीडिया में 'अर्बन नक्सल' शब्द भी काफी चर्चा में रहा है. दोनों शब्दों का इस्तेमाल अक्सर ऐसे लोगों के लिए किया जाता है, जिन पर नक्सली विचारधारा का समर्थन करने या उसे वैचारिक स्तर पर आगे बढ़ाने का आरोप लगाया जाता है.
अर्बन नक्सल शब्द 2018 के आसपास सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों की गिरफ्तारी से जुड़ी खबरों के दौरान व्यापक रूप से चर्चा में आया था. फिल्म निर्माता विवेक अग्निहोत्री की किताब Urban Naxals: The Making of Buddha in a Traffic Jam और उससे जुड़ी बहस ने इस शब्द को लोकप्रिय बनाने में भूमिका निभाई. हालांकि, इस शब्द की कोई आधिकारिक कानूनी परिभाषा नहीं है.
दोनों शब्दों के इस्तेमाल में एक सामान्य बात यह है कि इनके जरिए सशस्त्र संघर्ष से बाहर रहकर कथित तौर पर नक्सली विचारधारा का समर्थन करने वालों की बात की जाती है. लेकिन 'दिमागी नक्सल' शब्द में विचारधारा और मानसिकता पर ज्यादा जोर दिखाई देता है.
यह अंतर ध्यान में रखना जरूरी है कि किसी व्यक्ति का वामपंथी होना, सरकार की आलोचना करना या सामाजिक आंदोलन में हिस्सा लेना अपने आप में नक्सली गतिविधि का प्रमाण नहीं है.
अब क्यों हो रही है दिमागी नक्सल शब्द की चर्चा?
हाल में अभिनेता नसीरउद्दीन शाह ने इस शब्द का इस्तेमाल किया है. उन्होंने कुछ मुद्दों के चलते खुद को दिमागी नक्सल बताया है. हालांकि इस शब्द पर चर्चा तब शुरू हुई थी जब प्रधानमंत्री मोदी ने 15 अगस्त के भाषण में इसका इस्तेमाल किया. उन्होंने कहा कि सशस्त्र नक्सलवाद के कमजोर पड़ने के बावजूद नक्सली सोच रखने वाले लोग देश को गलत रास्ते पर ले जाने की कोशिश कर सकते हैं.
इसके बाद कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उन्हें 'दिमागी नक्सल' कहलाने पर गर्व है. कांग्रेस के अन्य नेताओं ने भी प्रधानमंत्री के बयान की आलोचना की. उनका तर्क था कि ऐसे शब्दों का इस्तेमाल सरकार के आलोचकों को बदनाम करने के लिए किया जा सकता है.
दूसरी ओर, केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने 26 अगस्त को इस शब्द को लेकर सफाई दी. उन्होंने कहा कि सरकार की आलोचना करने या उसकी नीतियों पर सवाल उठाने मात्र से किसी को दिमागी नक्सल नहीं कहा जाना चाहिए. उनके मुताबिक, इस शब्द का आशय उन लोगों से था जो माओवादी हिंसा, अलगाववाद या देश की संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ गतिविधियों का समर्थन करते हैं.
इस तरह विवाद केवल शब्द के अर्थ तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, राष्ट्रीय सुरक्षा और सरकार की आलोचना करने के अधिकार तक पहुंच गया.
'दिमागी नक्सल' शब्द की चर्चा ने भारत में नक्सलवाद, विचारधारा और लोकतांत्रिक असहमति के बीच की सीमाओं पर बहस छेड़ दी है. नक्सलवाद की शुरुआत 1967 में नक्सलबाड़ी के किसान विद्रोह से हुई थी, जबकि 'अर्बन नक्सल' और 'दिमागी नक्सल' जैसे शब्द बाद के वर्षों में राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बने.
प्रधानमंत्री मोदी के बयान के बाद यह सवाल और महत्वपूर्ण हो गया है कि नक्सली हिंसा के समर्थकों की पहचान कैसे की जाए और सरकार की आलोचना करने वालों के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए.
आखिरकार, राष्ट्रीय सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दोनों लोकतंत्र के महत्वपूर्ण पहलू हैं. किसी भी बहस में इन दोनों के बीच अंतर समझना और आरोपों को तथ्यों के आधार पर परखना जरूरी है.
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सीमेंट गोदाम में नशीली दवाओं का भंडार, कोडीनयुक्त कफ सिरप की 1318 शीशियां व 52560 टैबलेट-कैप्सूल जब्त, दो गिरफ्तार
सिंगरौली जिले में नशीली दवाओं के अवैध कारोबार के खिलाफ बरगवां पुलिस ने बड़ी कार्रवाई करते हुए कोडीनयुक्त कफ सिरप की 1,318 शीशियां और 52,560 टैबलेट-कैप्सूल जब्त किए हैं। पुलिस ने इस मामले में दो लोगों को गिरफ्तार किया है। कार्रवाई के दौरान एक बोलेरो और एक मोटरसाइकिल भी जब्त की गई।
मध्य प्रदेश पुलिस ने पिछले दिनों “नशे से दूरी है जरूरी” अभियान चलाकर नशाखोरी पर बड़ा प्रहार किया था, अब मुख्यालय के निर्देश पर 15 दिवसीय राज्य स्तरीय विशेष एंटी नारकोटिक्स अभियान चलाया जा रहा है , इसी क्रम में सिंगरौली पुलिस को बड़ी सफलता मिली है और पुलिस ने नशीली दवाओं का जखीरा पकड़ा है।
पुलिस अधीक्षक षियाज़ केएम ने मीडिया को जानकारी देते हुए बताया कि मुखबिर से मिली सूचना के आधार पर स्टार मेडिकल स्टोर पर दबिश देकर ग्राम सेमुआर निवासी सुकसेन बैस (22) को पकड़ा। तलाशी के दौरान उसके पास से दो पेटियों में कोडीनयुक्त कफ सिरप की 238 शीशियां बरामद हुईं। इस सिरप ले जाने में इस्तेमाल की जा रही हीरो स्प्लेंडर मोटरसाइकिल भी पुलिस ने जब्त की।
सीमेंट गोदाम में मिला दवाओं का जखीरा
मेडिकल स्टोर पर कार्रवाई के बाद पुलिस ने ग्राम सेमुआर स्थित ईंट प्लांट के सीमेंट गोदाम में तलाशी ली। यहां से कोडीनयुक्त कफ सिरप की 1,080 शीशियों के अलावा DIPATRAM PLUS के 10,080 कैप्सूल, Pyeevon Spas-T के 17,280 कैप्सूल और ALZOMAC-0.5 की 25,200 टैबलेट बरामद की गईं। पुलिस ने मौके से बोलेरो वाहन क्रमांक MP66T3098 भी जब्त किया। मामले में मेडिकल स्टोर संचालक नीतीश कुमार बैस (25) को गिरफ्तार किया गया है।
सप्लाई नेटवर्क की जांच में जुटी पुलिस
पुलिस अब जब्त दवाओं की खरीद, भंडारण और परिवहन से जुड़े दस्तावेजों की जांच कर रही है। यह भी पता लगाया जा रहा है कि इतनी बड़ी मात्रा में दवाएं कहां से लाई गई थीं और इन्हें कहां भेजने की तैयारी थी। पुलिस नशीली दवाओं के पूरे नेटवर्क को खंगाल रही है, संभावना जताई जा रही है कि इसमें कई दवा व्यापारी शामिल हो सकते हैं ।
राघवेन्द्र सिंह गहरवार की रिपोर्ट
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