कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी जल्द ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात करेंगे और दोनों देशों के बीच साझेदारी को मजबूत करने के उद्देश्य से कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर द्विपक्षीय वार्ता करेंगे। आज हैदराबाद हाउस में होने वाली उच्च स्तरीय वार्ता में दोनों प्रधानमंत्रियों के प्रतिनिधिमंडल स्तर पर भारत-कनाडा रणनीतिक साझेदारी के तहत विभिन्न क्षेत्रों में अब तक हुई प्रगति की समीक्षा की जाएगी। मोदी और कार्नी की मुलाकात इजराइल तथा अमेरिका द्वारा ईरान पर किए गए हमले की पृष्ठभूमि में हो रही है, इसलिए दोनों नेताओं से पश्चिम एशिया की समग्र स्थिति पर विचारों का आदान-प्रदान करने की उम्मीद है। माना जा रहा है कि भारत और कनाडा के बीच असैन्य परमाणु सहयोग की दिशा में कुछ प्रगति हो सकती है। भारत प्रस्तावित समझौते को अंतिम रूप देने के लिए उत्सुक है, जिससे उसे कनाडा से यूरेनियम आयात करने की अनुमति मिल सकेगी।
कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने नई दिल्ली में एस जयशंकर से मुलाकात की। जयशंकर ने सोशल मीडिया पर लिखा कि आज सुबह नई दिल्ली में कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी से मुलाकात करके मुझे बहुत खुशी हुई। भविष्योन्मुखी साझेदारी की दिशा में उनकी प्रतिबद्धता की मैं सराहना करता हूं।
2030 तक दोनों देशों के बीच व्यापार को दोगुना करने पर विचार
कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने कहा कि उनका देश भारत के साथ एक व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते पर बातचीत कर रहा है, जिसका उद्देश्य 2030 तक दोनों देशों के बीच व्यापार को दोगुना करना है। शनिवार को मुंबई में कनाडा-भारत फोरम को संबोधित करते हुए कार्नी ने कहा कि इस समझौते पर इस साल के अंत तक हस्ताक्षर होने की उम्मीद है।
तनाव के बाद भारत-कनाडा संबंधों में सुधार कैसे हुआ
2023 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो द्वारा हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में भारत की संलिप्तता के आरोप के बाद भारत-कनाडा संबंध बेहद खराब स्थिति में पहुंच गए थे। नई दिल्ली ने ट्रूडो के दावों को "बेतुका" बताते हुए खारिज कर दिया था। अक्टूबर 2024 में ओटावा द्वारा निज्जर मामले से संबंध जोड़ने के प्रयास के बाद भारत ने अपने उच्चायुक्त और पांच अन्य राजनयिकों को वापस बुला लिया। जवाब में, भारत ने भी उतने ही कनाडाई राजनयिकों को निष्कासित कर दिया। हालांकि, पिछले साल अप्रैल में संसदीय चुनाव में लिबरल पार्टी के नेता मार्क कार्नी की जीत ने संबंधों को फिर से संवारने के प्रयासों को गति दी। इसके बाद, दोनों देशों ने एक-दूसरे की राजधानियों में अपने उच्चायुक्तों को बहाल कर दिया। पिछले साल जून में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी7 शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए कनाडा के कनानास्किस गए थे, जहां उन्होंने और कार्नी ने द्विपक्षीय संबंधों के पुनर्निर्माण पर केंद्रित व्यापक चर्चा की।
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अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच तेज होते सैन्य टकराव ने क्षेत्रीय हालात को पहले ही विस्फोटक बना रखा था, लेकिन अब पाकिस्तान दोहरी चुनौती में घिरता दिखाई दे रहा है। एक ओर अफगान वायुसेना के ड्रोन हमलों ने रावलपिंडी, क्वेटा और खैबर पख्तूनख्वा स्थित उसके महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों को निशाना बनाकर इस्लामाबाद की सुरक्षा व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया है, तो दूसरी ओर देश के भीतर भड़के हिंसक प्रदर्शनों ने सरकार को गहरी संकट की स्थिति में डाल दिया है। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की तेहरान में हवाई हमलों में मौत की पुष्टि के बाद पाकिस्तान के कई शहरों में जबरदस्त विरोध प्रदर्शन भड़क उठे, जिनमें अब तक 35 लोगों की जान जा चुकी है और दर्जनों घायल हुए हैं। इस प्रकार पाकिस्तान एक साथ बाहरी सैन्य दबाव और भीतरी जनाक्रोश की मार झेल रहा है।
रविवार को कराची में 15, स्कार्दू में कम से कम 8 और राजधानी इस्लामाबाद में 5 लोगों की मौत की पुष्टि हुई। ये प्रदर्शन मुख्य रूप से पाकिस्तान के शिया समुदाय द्वारा किए गए, जो देश की आबादी का लगभग 20 प्रतिशत है। 25 करोड़ से अधिक आबादी वाले इस देश में बहुसंख्यक सुन्नी मुस्लिम हैं, लेकिन शिया समुदाय भी देश भर में फैला हुआ है और उसका सामाजिक प्रभाव व्यापक है। ईरान के नेता की मौत से उपजे आक्रोश ने इस समुदाय को सड़कों पर ला दिया।
इस्लामाबाद में हजारों लोग रेड जोन के पास इकट्ठा हुए, जहां संसद, सरकारी दफ्तर और विदेशी दूतावास स्थित हैं। प्रदर्शनकारियों ने अमेरिका का साथ देने वालों को गद्दार बताते हुए नारे लगाए और इजराइल के खिलाफ बदले की मांग की। राजधानी के एक बड़े होटल के पास पांच से आठ हजार लोगों की भीड़ जुटी, जिनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे। लोग खामेनेई की तस्वीर वाले पोस्टर लेकर विरोध जता रहे थे। हालात को नियंत्रित करने के लिए सुरक्षा बलों को आंसू गैस और रबर की गोलियां चलानी पड़ीं।
इन भीतरी अशांत हालात के बीच पाकिस्तान को अफगानिस्तान की ओर से मिल रही सैन्य चुनौती ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। अफगान रक्षा मंत्रालय के अनुसार ताजा हमलों का निशाना रावलपिंडी स्थित नूर खान एयरबेस, क्वेटा में 12वीं कोर मुख्यालय, खैबर पख्तूनख्वा के मोहम्मद एजेंसी क्षेत्र का ख्वाजई कैंप तथा अन्य अहम सैन्य अड्डे रहे। अफगान रक्षा मंत्रालय ने एक्स पर जारी वक्तव्य में कहा कि ये सटीक और समन्वित हवाई अभियान हाल में पाकिस्तानी सेना की ओर से अफगान हवाई क्षेत्र में की गई घुसपैठ के जवाब में चलाए गए। मंत्रालय के अनुसार बीती रात और आज सुबह पाकिस्तानी विमानों ने काबुल, बगराम तथा अन्य क्षेत्रों में बमबारी की थी, जिसके प्रत्युत्तर में यह कार्रवाई की गई।
अफगान रक्षा मंत्रालय के वक्तव्य में कहा गया है कि प्रारंभिक आकलन के आधार पर लक्षित ठिकानों को भारी क्षति पहुंची है। मंत्रालय ने चेतावनी दी कि यदि भविष्य में पाकिस्तान की ओर से किसी भी प्रकार का हवाई उल्लंघन या आक्रामक कदम उठाया गया तो उसका त्वरित, निर्णायक और समुचित जवाब दिया जाएगा। अफगान पक्ष ने एक आत्मघाती ड्रोन का वीडियो तथा पाकिस्तानी एयरबेस की कुछ तस्वीरें भी साझा की हैं, जिनके जरिये वह अपनी सैन्य क्षमता का संदेश देना चाहता है।
देखा जाये तो ताजा घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने दोनों देशों के बीच स्थिति को खुला युद्ध जैसा बताया था। इस्लामाबाद का दावा है कि उसके हवाई हमलों में 270 से अधिक तालिबान लड़ाके मारे गए और 400 से ज्यादा घायल हुए। वहीं अफगान तालिबान सरकार के प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने कहा कि उनकी सेना ने जवाबी कार्रवाई में 55 पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया और पाकिस्तान के भीतर महत्वपूर्ण सैन्य लक्ष्यों को निशाना बनाया। दोनों देशों के दावों की स्वतंत्र पुष्टि फिलहाल संभव नहीं है, जिससे जमीनी हालात को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने आरोप लगाया है कि पाकिस्तान ने स्थिति को सामान्य रखने के लिए प्रत्यक्ष वार्ता और मित्र देशों की मध्यस्थता सहित हर संभव प्रयास किया, परंतु तालिबान ने भारत का प्रतिनिधि बनकर काम किया। इस आरोप ने क्षेत्रीय राजनीति को और जटिल बना दिया है।
विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान इस समय दो तरफा मुश्किलों में फंस गया है। एक तरफ अफगानिस्तान के साथ बढ़ता सैन्य टकराव उसकी सुरक्षा और सामरिक क्षमता की परीक्षा ले रहा है, तो दूसरी ओर देश के भीतर सांप्रदायिक संवेदनशीलता से जुड़े प्रदर्शनों ने आंतरिक स्थिरता को झकझोर दिया है। यदि हालात पर शीघ्र काबू नहीं पाया गया तो यह संकट राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर और गहरा सकता है। इसके अलावा, अफगानिस्तान तथा पाकिस्तान की जनता भी पूर्ण युद्ध की आशंका से चिंतित है और शांति बहाली की उम्मीद कर रही है।
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