8वें वेतन आयोग में 2.5 या 2.8 फिटमेंट फैक्टर से दोगुनी सैलरी? जानिए क्या है गणित
8th Pay Commission: 8वें वेतन आयोग को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा “फिटमेंट फैक्टर” की हो रही है. कई सरकारी कर्मचारी मानते हैं कि अगर फिटमेंट फैक्टर 2.5 या 2.8 हुआ तो उनकी सैलरी डेढ़ से दो गुना तक बढ़ जाएगी. लेकिन पिछला अनुभव बताता है कि यह पूरी सच्चाई नहीं है. असल बढ़ोतरी इससे काफी कम हो सकती है. इसकी वजह है डीए मर्जर का असर.
क्या है फिटमेंट फैक्टर
फिटमेंट फैक्टर वह गुणांक है, जिससे मौजूदा बेसिक पे को गुणा करके नया बेसिक तय किया जाता है. लेकिन नए वेतन आयोग के लागू होने से पहले कर्मचारियों को महंगाई भत्ता (DA) मिल रहा होता है, जो हर छह महीने में बढ़ता है. जब नया वेतन ढांचा लागू होता है, तो पहले डीए को बेसिक में जोड़ा जाता है, फिर फिटमेंट फैक्टर लागू किया जाता है. ऐसे में असली बढ़ोतरी कम रह जाती है.
ऐसे समझें पूरा फैक्टर
उदाहरण के तौर पर 7वें वेतन आयोग में फिटमेंट फैक्टर 2.57 था. उस समय डीए 125% तक पहुंच चुका था. मान लीजिए किसी कर्मचारी का बेसिक 7,000 रुपये था. 125% डीए यानी 8,750 रुपये. कुल मिलाकर वह 15,750 रुपये पा रहा था. 2.57 से गुणा करने पर नया बेसिक 18,000 रुपये हुआ. यानी असली बढ़ोतरी सिर्फ 2,250 रुपये, जो करीब 14% थी. इतिहास देखें तो अलग-अलग वेतन आयोगों में वास्तविक बढ़ोतरी 14% से 31% के बीच रही है. केवल 6वें वेतन आयोग में 54% की बड़ी बढ़ोतरी मिली थी.
क्या हो सकती हैं संभावनाएं
अब 8वें वेतन आयोग की संभावनाएं देखें. लेवल-1 कर्मचारी का मौजूदा बेसिक 18,000 रुपये और डीए 58% है. अगर लागू होने तक डीए 68% पहुंच जाता है, तो कुल वेतन 30,240 रुपये होगा. यदि फिटमेंट फैक्टर 1.9 हुआ तो नया बेसिक 34,200 रुपये और असली बढ़ोतरी लगभग 13% होगी. अगर 2.57 हुआ तो बढ़ोतरी करीब 53% तक जा सकती है और 2.86 होने पर बढ़ोतरी 70% तक पहुंच सकती है.
असली फायदा डीए की स्थिति पर निर्भर
हालांकि, अंतिम वेतन में एचआरए और अन्य भत्ते भी जुड़ते हैं. लेकिन साफ है कि सिर्फ फिटमेंट फैक्टर देखकर बड़ी उम्मीद बांधना सही नहीं है. असली फायदा डीए की स्थिति और सरकार के अंतिम फैसले पर निर्भर करेगा.
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स्ट्रेटेजिक एयर कॉरिडोर बंद होने से विमान सेवाएं बाधित, दुनिया भर में सैकड़ों फ्लाइट्स कैंसिल
नई दिल्ली, 1 मार्च (आईएएनएस)। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते मिलिट्री तनाव के कारण वेस्ट एशिया में बड़े पैमाने पर एयरस्पेस बंद होने से ग्लोबल एविएशन इंडस्ट्री पर भारी दबाव है, जिससे दुनिया भर में फ्लाइट ऑपरेशन्स में रुकावट आई है।
रविवार तक खास एयर कॉरिडोर पर इमरजेंसी सेफ्टी पाबंदियां लगाए जाने के बाद अलग-अलग इलाकों की एयरलाइंस को फ्लाइट्स कैंसिल करने या उनका रूट बदलने पर मजबूर होना पड़ा है।
एविएशन इंडस्ट्री के अनुमान के अनुसार, दुनिया भर में 700 से ज्यादा फ्लाइट्स पहले ही कैंसिल हो चुकी हैं, जबकि सैकड़ों दूसरी फ्लाइट्स को युद्ध वाले इलाकों से बचने के लिए लंबे रूट पर भेजा गया है। जो शुरू में कम सेफ्टी उपायों के तौर पर शुरू हुआ था, वह अब एक बड़े ऑपरेशनल संकट में बदल गया है।
इंटरनेशनल एविएशन के लिए सबसे जरूरी ट्रांजिट इलाकों में से एक, वेस्ट एशिया के बड़े हिस्से या तो सिविलियन एयरक्राफ्ट के लिए पूरी तरह से बंद हैं या कड़े नेविगेशन कंट्रोल के तहत चल रहे हैं। ईरान और इजरायल समेत कई देशों का एयरस्पेस प्रभावित हुआ है, जिससे नॉर्मल फ्लाइट मूवमेंट बहुत कम हो गया है।
दुबई, अबू धाबी और दोहा समेत गल्फ इलाके के बड़े एविएशन हब ने भी ट्रैफिक रोक दिया है, जिससे देरी हो रही है जो दुनिया भर के एयरलाइन नेटवर्क में फैल रही है। एशिया, यूरोप और नॉर्थ अमेरिका को जोड़ने वाली फ्लाइट्स पर खास तौर पर असर पड़ा है, क्योंकि इनमें से कई रूट मिडिल ईस्ट से होकर आसानी से गुजरने पर निर्भर हैं।
गल्फ ट्रांजिट रूट पर बहुत ज्यादा निर्भर होने के कारण इंडियन एयरलाइंस सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। इंडिगो ने तीन दिन में 350 से ज्यादा फ्लाइट्स कैंसिल कर दी हैं।
एयरलाइन ने 1 मार्च को 166 फ्लाइट्स कैंसिल कीं, इसके बाद 2 मार्च को 162 और 3 मार्च को 43 फ्लाइट्स कैंसिल कीं। ये कैंसिलेशन उसके नॉर्मल रोजाना के ऑपरेशन का लगभग 7 से 8 परसेंट है, जो आमतौर पर 2,100 से 2,200 फ्लाइट्स के बीच होता है।
एयर इंडिया और एयर इंडिया एक्सप्रेस समेत दूसरी इंडियन कैरियर्स ने भी सिक्योरिटी एडवायजरी और एयरस्पेस पर रोक के बाद गल्फ और वेस्ट एशिया के लिए कई सर्विस सस्पेंड कर दी हैं या उनका रूट बदल दिया है।
दुनिया भर में इस रुकावट ने बड़ी इंटरनेशनल एयरलाइन्स पर भी दबाव डाला है। एमिरेट्स जैसी गल्फ कैरियर्स ने फ्लाइट्स कैंसिल कर दी हैं या उनका रूट बदल दिया है, जबकि लुफ्थांसा जैसे यूरोपियन ऑपरेटर्स ने पैसेंजर की सुरक्षा पक्का करने के लिए शेड्यूल में बदलाव किया है।
एयरक्राफ्ट को लंबे दूसरे रूट लेने पड़ रहे हैं। इससे एयरलाइन्स के लिए फ्लाइट का समय, फ्यूल का इस्तेमाल और कुल ऑपरेटिंग कॉस्ट बढ़ गई है, जिससे ऐसे समय में फाइनेंशियल स्ट्रेस बढ़ गया है जब इंडस्ट्री अभी भी पहले के ग्लोबल झटकों से उबर रही है।
--आईएएनएस
पीएसके
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