भोपाल में लगे अमेरिका-इजराइल मुर्दाबाद के नारे:ईरान के सुप्रीम लीडर की मौत पर मातम; इमाम बोले- खामेनेई ने हमेशा मजलूमों का साथ दिया
अमेरिका और इजराइल के हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत पर भारत के शिया समुदाय में भी शोक की लहर है। भोपाल के करोंद स्थित शिया मस्जिद में रविवार को जोहर की नमाज के बाद श्रद्धांजलि सभा आयोजित की गई, जिसमें बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। सभा को संबोधित करते हुए इमाम बाकर हुसैन ने कहा- पूरी दुनिया उस शख्सियत को जानती है, जिसने जुल्म के खिलाफ आवाज उठाई और मजलूमों का साथ दिया। खामेनेई ने अपने जीवन में अत्याचार का विरोध किया और इस्लामी इंकलाब के सिद्धांतों को आगे बढ़ाया। उन्होंने इमाम हुसैन की मौत का जिक्र करते हुए कहा- इतिहास गवाह है कि किसी विचारधारा या आंदोलन को किसी एक व्यक्ति के जाने से समाप्त नहीं किया जा सकता। इंकलाब की राह आगे भी जारी रहेगी और उसे आगे बढ़ाने वाले लोग मौजूद रहेंगे। अंत में इमाम हुसैन ने ताजियत पेश की। सभा में मौजूद लोगों ने इजराइल मुर्दाबाद, अमेरिका मुर्दाबाद, खामेनेई जिंदाबाद, अल्लाह हू अकबर और या हुसैन के नारे लगाए गए। उम्मत-ए-मुसलमान खुद को यतीम महसूस कर रही मजलिस को संबोधित करते हुए इमाम बाकर हुसैन ने कहा कि दुश्मन अक्सर सामने से नहीं, बल्कि पीछे से वार करता है। उन्होंने कहा कि अयातुल्ला खामेनेई की शहादत से उम्मत-ए-मुसलमान खुद को यतीम महसूस कर रही है। शहादत किसी भी विचारधारा को कमजोर नहीं करती, बल्कि उसे और मजबूत बनाती है। इमाम हुसैन ने लोगों से एकजुट रहने और सब्र बनाए रखने की अपील भी की। फिरके या मिल्लत के आधार पर भेदभाव नहीं किया मस्जिद मोहम्मदी के इमाम जुमा सैयद अजहर हुसैन रिजवी ने भी सभा को संबोधित किया। उन्होंने अयातुल्ला अली खामेनेई को उम्मत-ए-मुसलमान का निडर रहबर बताते हुए कहा कि वे हमेशा जालिम के खिलाफ और मजलूम के समर्थन में खड़े रहे। उन्होंने कहा कि खामेनेई ने कभी फिरके या मिल्लत के आधार पर भेदभाव नहीं किया, बल्कि जहां भी अत्याचार हुआ, उसके खिलाफ आवाज उठाई। मजलूम का साथ देना इंसानियत और हकानियत की पहचान है जबकि जुल्म का समर्थन करना ईश्वरीय दृष्टि में गुनाह माना जाता है। 35 साल से ईरान की सर्वोच्च सत्ता पर काबिज थे अयातुल्ला अली खामेनेई 1989 में रुहोल्लाह खुमैनी के निधन के बाद से ईरान के सर्वोच्च नेता के पद पर काबिज हैं। ईरान में 1979 की इस्लामिक क्रांति के दौरान, जब शाह मोहम्मद रजा पहलवी को हटाया गया तो खामेनेई ने क्रांति में बड़ी भूमिका निभाई थी। इस्लामिक क्रांति के बाद खामेनेई को 1981 में राष्ट्रपति बनाया गया। वह 8 साल तक इस पद पर रहे। 1989 में ईरान के सुप्रीम लीडर खुमैनी की मौत के बाद उन्हें उत्तराधिकारी बनाया गया। रिपोर्ट के मुताबिक अयातुल्ला धर्मगुरु की एक पदवी है। ईरान के इस्लामिक कानून के मुताबिक, सुप्रीम लीडर बनने के लिए अयातुल्ला होना जरूरी है। यानी कि सुप्रीम लीडर का पद सिर्फ एक धार्मिक नेता को ही मिल सकता है। ईरान-इजराइल के बीच विवाद मामले से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें… अमेरिका-इजराइल ने ईरान पर 24 घंटे में 1200 बम गिराए अमेरिका-इजराइल के हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई है। शनिवार को उनके ऑफिस कॉम्प्लेक्स पर 30 मिसाइलों से हमला हुआ था। हमले में उनकी बेटी-दामाद, बहू और पोती समेत कॉम्प्लेक्स में मौजूद 40 कमांडर्स भी मारे गए हैं। हमले के समय खामनेई कमांडर्स के साथ मीटिंग कर रहे थे। पढ़ें पूरी खबर…
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