Explainer: क्या दुनिया में घट रही है US की साख? 8 देशों के चुनावों में दखल के बाद सिर्फ 2 में हुए कामयाब
Explainer: दुनिया की राजनीति में अमेरिका का प्रभाव लंबे समय से उसकी आर्थिक ताकत, सैन्य क्षमता और कूटनीतिक संबंधों से जुड़ा रहा है. लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में इस प्रभाव का एक और पहलू चर्चा में है दूसरे देशों की राजनीति और चुनावों पर खुलकर अपनी पसंद जाहिर करना. कभी टैरिफ लगाने की धमकी, कभी व्यापारिक रियायतों का संकेत और कभी किसी खास उम्मीदवार के समर्थन में बयान देकर ट्रंप विदेशी चुनावों को भी अमेरिकी हितों से जोड़ते दिखाई देते हैं.
हालांकि, किसी नेता का समर्थन करना और वहां के मतदाताओं को प्रभावित कर पाना दो अलग बातें हैं. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक आठ देशों के चुनावों में ट्रंप या उनके सहयोगियों ने पसंदीदा उम्मीदवारों अथवा राजनीतिक दलों का समर्थन किया.
इनमें से छह जगह उनके समर्थित पक्ष को जीत नहीं मिली, जबकि जापान और होंडुरास में उन्हें सफलता मिली. इन नतीजों ने सवाल उठाया है कि क्या अमेरिकी राष्ट्रपति का समर्थन अब दूसरे देशों में पहले जितना असरदार नहीं रहा?
चुनावों में ट्रंप की पसंद क्यों बनी चर्चा का विषय?
ट्रंप की राजनीति में आर्थिक दबाव और सार्वजनिक बयानबाजी अहम भूमिका निभाते हैं. वे व्यापार घाटे, टैरिफ, सीमा सुरक्षा और सहयोगी देशों से मिलने वाली रियायतों जैसे मुद्दों पर सख्त रुख अपनाते रहे हैं. इस रणनीति का मकसद अमेरिका के लिए बेहतर शर्तें हासिल करना बताया जाता है.
लेकिन जब यही दबाव दूसरे देशों की घरेलू राजनीति से जुज़ता है, तो उसका उलटा असर भी हो सकता है. विदेशी नेता के समर्थन को कुछ मतदाता बाहरी दखल के रूप में देख सकते हैं. ऐसे में चुनाव केवल स्थानीय सरकार के कामकाज का आकलन नहीं रह जाता, बल्कि राष्ट्रीय स्वाभिमान और स्वतंत्र फैसले लेने के अधिकार का सवाल भी बन सकता है.
कनाडा: टैरिफ और संप्रभुता का मुद्दा
कनाडा के अप्रैल 2025 के चुनाव में कंजर्वेटिव पार्टी के नेता पियरे पोइलिवर और लिबरल पार्टी के मार्के कार्नी प्रमुख दावेदारों में थे. दिए गए विवरण के मुताबिक, ट्रंप ने पोइलिवर के पक्ष में समर्थन जताया, लेकिन कार्नी की पार्टी जीत गई.
चुनाव के दौरान अमेरिका की टैरिफ नीति और कनाडा को अमेरिका में मिलाने से जुड़े ट्रंप के बयानों ने भी चर्चा बटोरी. इन टिप्पणियों को कनाडा की संप्रभुता और राष्ट्रीय पहचान से जोड़कर देखा गया. हालांकि, चुनावी नतीजों को केवल ट्रंप के बयानों का परिणाम मानना सही नहीं होगा, मतदाताओं के फैसले पर अर्थव्यवस्था, नेतृत्व और घरेलू मुद्दों का भी असर पड़ता है.
ऑस्ट्रेलिया: अमेरिकी राजनीति से अलग मतदाताओं का फैसला
मई 2025 के ऑस्ट्रेलियाई चुनाव में प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज की लेबर पार्टी ने जीत दर्ज की, जबकि कंजर्वेटिव नेता पीटर डटन को हार मिली. ट्रंप की टैरिफ नीति और उनकी राजनीतिक शैली को लेकर बहस इस चुनाव के अंतरराष्ट्रीय संदर्भ का हिस्सा बनी.
यह नतीजा दिखाता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति की विचारधार से मिलते-जुलते माने जाने वाले नेताओं को अपने देश में अपने दम पर मतदाताओं का भरोसा जीतना पड़ता है. हालांकि, यह कहना कि ट्रंप की नीतियों के प्रति नाराजगी ही डटन की हार की निर्णायक वजह थी, उपलब्ध विवरण से साबित नहीं होता.
रोमानिया: राष्ट्रवादी उम्मीदवार को झटका
मई 2025 में ही रोमानिया के राष्ट्रपति चुनाव में राष्ट्रवादी नेता जॉर्ज सिमियोन को निकुशोर दान ने हराया. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सिमियोन को ट्रंप की MAGA विचारधार के करीब माना जाता था. दान को करीब 54 प्रतिशत वोट मिलने का दावा भी दिए गए विवरण में किया गया.
यह चुनाव इस बात का उदाहरण बनकर सामने आया कि राष्ट्रवादी राजनीति और अमेरिकी दक्षिणपंथी विचारधार से समानता अपने आप चुनावी जीत की गारंटी नहीं देती. स्थानीय राजनीतिक परिस्थितियां, उम्मीदवार की छवि और मतदाताओं की प्राथमिकताएं अलग भूमिका निभा सकती हैं.
हंगरी: ओर्बन के समर्थन के बावजूद सत्ता परिवर्तन
हंगरी में अप्रैल 2026 के चुनाव को ट्रंप के लिए एक अहम राजनीतिक झटके के रूप में पेश किया गया है. विवरण के मुताबिक, ट्रंप ने लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहे विक्टर ओर्बन का समर्थन किया था. अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस भी चुनाव से पहले हंगरी गए थे.
इसके बावजूद ओर्बन की पार्टी की पीटर मग्यार के नेतृत्व वाली विपक्षी पार्टी से हार का सामना करना पड़ा. अगर किसी विदेशी नेता का खुला समर्थन चुनावी नतीजे बदलने के लिए पर्याप्त नहीं रहा, तो इससे साफ होता है कि घरेलू राजनीतिक असंतोष और सत्ता के प्रति मतदाताओं का नजरिया बाहरी समर्थन से ज्यादा प्रभावशाली हो सकते हैं.
ब्राजील और जर्मनी: समर्थन से नहीं बदला चुनावी समीकरण
ब्राजील के अक्टूबर 2026 के चुनाव को लेक रदिए गए विवरण में दावा किया गया है कि ट्रंप प्रशासन से जुड़े अधिकारियों ने बोल्सोनारो परिवार की राजनीतिक वापसी के पक्ष में प्रयास किए. इसमें राष्ट्रपति लूला और फ्लावियो बोल्सोनारो के बीच मुकाबले का जिक्र है. ऐसे संवेदनशील दावों को पुष्ट करने के लिए विश्वसनीय रिपोर्टिंग और आधिकारिक चुनावी नतीजों की पुष्टि जरूरी है.
जर्मनी में फरवरी 2025 के चुनाव से पहले एलन मस्क ने दक्षिणपंथी पार्टी अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (AfD) और उसकी नेता एलिस वाइडेल का समर्थन किया था. दिए गए आंकड़ों के अनुसार, AfD को 20.8 प्रतिशत वोट मिले और वह दूसरे स्थान पर रही, जबकि CDU/CSU गठबंधन सबसे आगे रहा. यानी सार्वजनिक समर्थन पार्टी को चर्चा में ला सकता है, लेकिन सरकार बनाने के लिए पर्याप्त राजनीतिक समर्थन जुटाना अलग चुनौती है.
जापान और होंडुरास: दो जगह मिली सफलता
जापान में साने ताकाइची के नेतृत्व वाले राजनीतिक पक्ष को फरवरी 2026 के चुनाव में बड़ी जीत मिलने का दावा किया गया है. विवरण के मुताबिक, ट्रंप ने मतदान से ठीक पहले ताकाइची का समर्थन किया और अमेरिका-जापान के व्यापारिक और सुरक्षा संबंधों का उल्लेख किया.
होंडुरास में ट्रंप ने राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार नासरी असफुरा का समर्थन किया था. दिए गए विवरण के मुताबिक, चुनाव अधिकारियों ने 24 दिसंबर 2025 को असफुरा को विजेता घोषित किया. हालांकि, किसी प्रत्याशी की जीत को केवल अमेरिकी समर्थन का नतीजा मानना सही नहीं होगा.
क्या सचमुच घट रही है अमेरिका की साख?
आंकड़ों पर गौर करें तो ये इशारा तो यही मिलता है. आठ में से छह चुनावों में पसंदीदा पक्ष की हार का दावा अमेरिकी प्रभाव की सीमाओं पर सवाल जरूर उठाता है, लेकिन इससे सीधे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि दुनिया में अमेरिका की साख घट रही है. किसी देश की चुनावी राजनीति पर असर और उसकी व्यापक कूटनीतिक, आर्थिक या सैन्य ताकत अलग-अलग पैमाने हैं.
इन नतीजों से इतना संकेत जरूर मिलता है कि विदेशी नेताओं का समर्थन मतदाताओं के फैसले को नियंत्रित नहीं कर सकता. कई बार ऐसा समर्थन उलटा असर भी डाल सकता है, खासकर जब मतदाताओं को लगे कि उनके देश के आंतरिक मामलों में बाहरी दबाव बनाया जा रहा है.
बहरहाल ट्रंप की रणनीति की असली परीक्षा केवल इस बात से नहीं होगी कि कितने पसंदीदा उम्मीदवार चुनाव जीतते हैं. यह भी देखना होगा कि अमेरिकी दबाव से दूसरे देशों के साथ संबंध मजबूत होते हैं या उनमें अविश्वास बढ़ता है. लोकतंत्र में अंतिम फैसला मतदाता करते हैं और यही सीमा किसी भी विदेशी नेता के प्रभाव को तय करती है.
सबसे अहम बात
बता दें कि इन चुनावों के नतीजे यह दिखाते हैं कि ट्रंप के समर्थन के बावजूद पसंदीदा उम्मीदवार हार सकते हैं. लेकिन केवल इन आठ चुनावों के आधार पर अमेरिका की वैश्विक साख घटने का निर्णायक निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता.
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कांग्रेस पार्टी 1 नवंबर को नई दिल्ली के रामलीला मैदान में 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन की एक बड़ी रैली की तैयारी कर रही है। इस आयोजन से पहले यह शक्ति प्रदर्शन का एक अहम मौका होगा। तैयारियों के सिलसिले में, 27 अक्टूबर को कांग्रेस के वरिष्ठ नेता के.सी. वेणुगोपाल ने दिल्ली के नेताओं के साथ कार्यक्रम स्थल का जायजा लिया। कांग्रेस सांसद पवन खेड़ा ने कहा कि रैली की व्यवस्थाओं के लिए दिल्ली का पूरा नेतृत्व यहाँ मौजूद है। वेणुगोपाल जी यहाँ आ रहे हैं, जिसके बाद वे सभी को जरूरी निर्देश देंगे। उसी के अनुसार तैयारियां की जा रही हैं। उन्होंने बताया कि इस रैली में 'इंडिया' गठबंधन के सदस्य और देशभर से लोग शामिल होंगे।
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हालांकि, वेणुगोपाल ने आरोप लगाया कि रैली से पहले पुलिस ने इसमें दखल दिया। उन्होंने दावा किया कि पार्टी ने शुरुआत में अशोक होटल के लॉन में एक कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति मांगी थी, लेकिन पुलिस के दखल के बाद इसे नामंजूर कर दिया गया। इसके अलावा, उन्होंने पुलिसकर्मियों पर आरोप लगाया कि उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं को किसी दूसरी जगह पर कार्यक्रम की तैयारी करने से रोका।
30 अक्टूबर का यह प्रस्तावित कार्यक्रम 1 नवंबर को होने वाली रैली और मार्च से पहले की एक तैयारी थी, जिसका मकसद कथित चुनावी गड़बड़ियों के खिलाफ विरोध जताना है। वेणुगोपाल ने केंद्र सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि वह विपक्षी दलों को मतदाता सूची और उससे जुड़े मुद्दों पर अपनी चिंताएं जाहिर करने से रोकने की कोशिश कर रही है। वेणुगोपाल ने कहा कि हम उनके दबाव के आगे नहीं झुकेंगे। हमें पता है कि कार्यक्रम कैसे आयोजित करना है।
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उन्होंने आगे कहा कि पार्टी जल्द ही अपने अगले कदमों की घोषणा करेगी। उन्होंने सरकार पर असहमति को दबाने और राजनीतिक आलोचना को सीमित करने की कोशिश करने का भी आरोप लगाया। 1 नवंबर की रैली के संबंध में, वेणुगोपाल ने बताया कि रामलीला मैदान में लगभग 21 राजनीतिक दलों के शामिल होने की उम्मीद है। 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन ने अपने "वोट चोरी" अभियान के तहत लगातार चुनावी धांधली के आरोप लगाए हैं।
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