Rajasthan Vidhansabha Live: आज बजट सत्र का अंतिम दिन; मुख्यमंत्री कर सकते हैं बड़ी घोषणाएं, वित्त और विनियोग विधेयक होंगे पारित
Rajasthan Vidhansabha Live: राजस्थान विधानसभा में आज वित्त और विनियोग विधेयक पारित होने के साथ बजट 2026-27 की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी. प्रश्नकाल में डॉ. प्रेमचंद बैरवा के विभागों पर चर्चा होगी और मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा सदन में बड़ी घोषणाएं कर सकते हैं.
होलिका दहन साथ देखना अशुभ? पहली होली पर सास-बहू क्यों रहती हैं अलग, जानिए राजस्थान की ये अनोखी परंपरा
Holika Dahan Traditions: राजस्थान के ग्रामीण समाज में फागन का महीना सिर्फ रंगों की मस्ती का नाम नहीं है, बल्कि यह सदियों पुरानी परंपराओं और लोकमान्यताओं का प्रतीक भी है. जालौर सहित मारवाड़ के कई इलाकों में शादी के बाद पहली होली को लेकर आज भी एक खास मान्यता प्रचलित है. यहाँ नई बहू अपनी पहली होली ससुराल में नहीं मनाती. प्राचीन समय से चली आ रही इस रस्म के तहत, होली आने से पहले ही बहू को उसके पीहर (मायके) भेज दिया जाता है. इसे मायके का अधिकार भी माना जाता है, जहाँ बेटी को विशेष स्नेह, उपहार और बड़ों का आशीर्वाद मिलता है. ग्रामीण लोकविश्वास के अनुसार, पहली होली पर सास और बहू को एक साथ होलिका दहन की अग्नि नहीं देखनी चाहिए. बुजुर्गों का मानना है कि यदि दोनों एक साथ जलती हुई होलिका के दर्शन कर लें, तो भविष्य में उनके रिश्तों में कड़वाहट या नोकझोंक बढ़ सकती है. स्थानीय बुजुर्ग महिला कमला देवी बताती हैं कि फागन के महीने में सास-बहू को ज्यादा समय साथ नहीं बिताना चाहिए. यदि किसी अनिवार्य कारण से बहू पीहर नहीं जा पाती और ससुराल में ही रुकती है, तो होलिका दहन के समय उसे गाँव में ही किसी रिश्तेदार या पड़ोसी के घर भेज दिया जाता है ताकि वह और उसकी सास एक ही अग्नि को न देखें. इस परंपरा के पीछे एक दिलचस्प तर्क यह भी दिया जाता है कि यदि सास-बहू साथ में होलिका दहन देख लें, तो इसका दोष या 'भार' सास पर पड़ता है. हालांकि, इस परंपरा का कोई स्पष्ट धार्मिक या शास्त्रीय प्रमाण नहीं मिलता है, लेकिन सामाजिक अनुभवों के आधार पर इसे पीढ़ियों से निभाया जा रहा है. जानकारों का मानना है कि संयुक्त परिवारों के दौर में सास और बहू के बीच शुरुआत में एक स्वस्थ दूरी बनाए रखने और रिश्तों को संतुलित व मधुर रखने के उद्देश्य से ऐसे नियम बनाए गए होंगे. जैसे-जैसे समय बदल रहा है, शहरी समाजों में इन मान्यताओं का प्रभाव कम होता जा रहा है. आज कई आधुनिक परिवारों में सास और बहू मिलकर पहली होली खुशी-खुशी मनाती हैं और होलिका दहन की पूजा भी साथ करती हैं. बावजूद इसके, जालौर के ग्रामीण अंचलों और पारंपरिक परिवारों में यह मान्यता आज भी अपनी जगह बनाए हुए है. यह लोक कथाएँ और नियम हमें याद दिलाते हैं कि हमारी संस्कृति में रिश्तों की मर्यादा और संतुलन को कितना महत्व दिया गया है.
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