कक्षा 8वीं की एनसीईआरटी सोशल साइंस की किताब में 'न्यायपालिका में भ्रष्टाचार' विषय पर एक चैप्टर शामिल किए जाने के मामले ने बड़ा तूल पकड़ लिया है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को हुई कैबिनेट बैठक में इस विवाद पर अपनी गहरी नाराजगी जाहिर की थी।
शिक्षा मंत्री ने जताया खेद
विवाद बढ़ता देख केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने भी गहरा दुख जताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका का अपमान करने का सरकार का कोई इरादा नहीं था। उन्होंने कहा, 'जो कुछ भी हुआ, उससे मैं बहुत दुखी हूं।'
सुप्रीम कोर्ट की कड़ी कार्रवाई
सुप्रीम कोर्ट ने इस चैप्टर के प्रकाशन पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। कोर्ट ने स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव और एनसीईआरटी के निदेशक दिनेश प्रसाद सकलानी को 'कारण बताओ नोटिस' जारी किया है।
केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट में बिना शर्त माफी मांगी। उन्होंने बताया कि जिन लोगों ने इस विवादित चैप्टर का मसौदा तैयार किया है, उन्हें ब्लैकलिस्ट कर दिया गया है, वे अब यूजीसी या किसी भी मंत्रालय के साथ काम नहीं करेंगे।
कोर्ट की तीखी टिप्पणी
सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्यकांत ने नाराजगी जताते हुए कहा कि मीडिया के जरिए जो जवाब मिला है, उसमें माफी का एक शब्द भी नहीं है। जब सॉलिसिटर जनरल ने बताया कि 32 किताबें बेची गई थीं जिन्हें वापस ले लिया गया है, तो चीफ जस्टिस ने इसे एक 'गहरी साजिश' बताया। सीजेआई ने कहा, 'यह जानबूझकर उठाया गया कदम लगता है ताकि पूरी टीचिंग कम्युनिटी, छात्र और अभिभावकों के बीच यह संदेश जाए कि भारतीय न्यायपालिका भ्रष्ट है।'
क्या है विवादित चैप्टर में?
एनसीईआरटी की नई किताब के इस चैप्टर में न्यायपालिका की चुनौतियों का जिक्र किया गया है। इसमें लिखा गया है कि न्यायिक प्रणाली के विभिन्न स्तरों पर भ्रष्टाचार मौजूद है, जिससे गरीबों के लिए न्याय पाना और मुश्किल हो जाता है। अदालतों में केसों का भारी अंबार (बैकलॉग) और जजों की कमी एक बड़ी समस्या है। किताब के आंकड़ों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में 81,000, हाई कोर्ट में 62.40 लाख और जिला अदालतों में करीब 4.70 करोड़ केस लंबित हैं।
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फाल्गुन मास की मस्ती अपने चरम पर है और देश के विभिन्न हिस्सों में रंग, अबीर और गुलाल की छटा बिखर गई है। ब्रज क्षेत्र के बरसाना, नंदगांव, मथुरा और वृंदावन में जहां लट्ठमार होली और पारंपरिक उत्सवों की धूम देखने को मिल रही है वहीं काशी में रंगभरी एकादशी के अवसर पर बाबा के दरबार में रंगों की अनोखी आभा देखने को मिली।
उत्तर प्रदेश के बरसाना में विश्व प्रसिद्ध लट्ठमार होली का आयोजन हर्ष और उल्लास के साथ हो रहा है। नंदगांव के हुरियारे परंपरागत वेशभूषा में बरसाना पहुंचे तो अलग ही छटा देखने को मिली। प्रिया कुंड पर उनका स्वागत मिठाई, पकवान और ठंडाई से किया गया। इसके बाद वे लाडली जी मंदिर में दर्शन कर रंगीली गली पहुंचे, जहां ढोल नगाड़ों की थाप पर होली के रसिया गूंज उठे। जैसे ही हुरियारों ने महिलाओं को रिझाने के लिए गीत गाए, हुरियारिनों ने प्रेम भरी लाठियां बरसानी शुरू कर दीं। पुरुषों ने ढाल से बचाव किया और पूरा वातावरण हंसी ठिठोली से गूंज उठा।
हम आपको बता दें कि यूपी प्रशासन की ओर से व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की गई है। मेला क्षेत्र को कई जोन और सेक्टर में बांटकर हजारों सुरक्षाकर्मी तैनात किए गए हैं। प्रमुख स्थलों पर कैमरे और ड्रोन से निगरानी की गई। जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक स्वयं व्यवस्था पर नजर बनाए रहे। श्रद्धालुओं ने भी व्यवस्थाओं की सराहना की।
इसी क्रम में मथुरा और वृंदावन में भी होली का रंग चरम पर दिखाई दिया। मंदिरों में ठाकुर जी के संग गुलाल की होली खेली गई। बांके बिहारी मंदिर, राधा वल्लभ और अन्य प्रमुख मंदिरों में दर्शनार्थियों की लंबी कतारें लगी रहीं। टेसू के फूलों से बने प्राकृतिक रंगों की बौछार ने वातावरण को और भी सुरम्य बना दिया। विदेशी श्रद्धालु भी इस अनूठे उत्सव में शामिल होकर नाचते गाते नजर आए।
हम आपको बता दें कि ब्रज में होली का उत्सव बसंत पंचमी से आरंभ होकर कई सप्ताह तक चलता है, परंतु लट्ठमार होली और रंगभरनी एकादशी इसका विशेष आकर्षण माने जाते हैं। मान्यता है कि द्वापर काल में कान्हा अपने सखाओं के साथ बरसाना आकर राधा और सखियों को चिढ़ाते थे, तब सखियां उन्हें लाठियों से खदेड़ देती थीं। वही परंपरा आज भी जीवंत है।
उधर काशी में वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर में रंगभरी एकादशी का विशेष महत्व देखा गया। धार्मिक मान्यता है कि विवाह के बाद भगवान शिव माता पार्वती को पहली बार काशी लेकर आए थे और भक्तों ने रंगों से उनका स्वागत किया था। इसी परंपरा के तहत मंदिर परिसर में पुष्प, अबीर और गुलाल से होली खेली गई। साधु संतों और श्रद्धालुओं ने भक्ति गीतों के साथ उत्सव मनाया।
हम आपको बता दें कि रंगभरी एकादशी को आमलकी एकादशी भी कहा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु, महादेव और आंवले के वृक्ष की पूजा का विधान है। प्रातः काल से ही श्रद्धालुओं ने व्रत रखकर पूजा अर्चना की और दान पुण्य किया। रंग, रस और भक्ति से सराबोर यह पर्व सामाजिक समरसता और प्रेम का संदेश देता है। बरसाना की लाठियों में जहां स्नेह छिपा है, वहीं मथुरा की गलियों में भक्ति का रंग और काशी में आस्था की छटा दिखाई देती है। फाल्गुन का यह उत्सव एक बार फिर देश को रंगों की डोर में बांधता नजर आया। अयोध्या में भी इस अवसर पर साधु संत झूमते नजर आये।
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