बुक रिव्यू- नए पेरेंट्स के लिए एक जरूरी किताब:नए नन्हे मेहमान को कैसे पालें, पेरेंटिंग से जुड़े हर जरूरी सवाल का जवाब
किताब का नाम: बच्चों की डॉक्टर लेखक: डॉ. माधवी भारद्वाज अनुवाद: यामिनी रामपल्लीवार प्रकाशक: पेंगुइन मूल्य: 399 रुपए पेरेंटिंग एक बेहद खूबसूरत जर्नी है। हर शादीशुदा कपल इस पल का बेसब्री से इंतजार करता है। यह सिर्फ बच्चे की परवरिश नहीं, बल्कि खुद के सीखने, धैर्य रखने और भावनात्मक रूप से मैच्योर होने की प्रक्रिया भी है। इस सफर में खुशियां हैं, जिम्मेदारियां हैं और अनगिनत यादें हैं, जो परिवार को मजबूत बनाती हैं। हालांकि इसमें तमाम चुनौतियां भी हैं, जो न्यूली पेरेंट्स को इस जर्नी से डराती हैं, लेकिन घबराएं नहीं। डॉ. माधवी भारद्वाज की किताब ‘बच्चों की डॉक्टर’ नए पेरेंट्स के लिए एक गाइड की तरह है। ये किताब नए पेरेंट्स को डराती नहीं, समझाती है और जज करने की बजाय भरोसा देती है। डॉ. माधवी भारद्वाज जानी-मानी पीडियाट्रिशियन हैं। वह खुद दो बच्चों की मां हैं। वह इस बात को अच्छे से समझती हैं कि पहली बार पेरेंट्स बनने वाले लोग किन भावनाओं और चुनौतियों से गुजरते हैं। किताब का उद्देश्य और महत्व इस किताब का उद्देश्य न्यू पेरेंट्स को सही गाइड करना है। साथ ही उनको यह एहसास दिलाना है कि कन्फ्यूज होना बिल्कुल नॉर्मल है। खासकर ऐसे समय में जब तमाम तरह की पुरानी मान्यताएं, रिश्तेदारों की सलाह हावी होने लगती हैं। डॉ. माधवी इस उलझन को जॉइंट फैमिली की वास्तविकताओं, सांस्कृतिक मिथकों और रोजमर्रा की स्थितियों को सामने रखकर दूर करती हैं। यह किताब डर और गिल्ट पैदा करने के बजाय आत्मविश्वास बढ़ाती है। साथ ही किताब इंडियन पेरेंट्स की जरूरतों को ध्यान में रखकर लिखी गई है। इसी वजह से वे इससे जुड़ाव महसूस करते हैं और अनावश्यक चिंता कम होती है। बच्चे की देखभाल धीरे-धीरे बोझ नहीं बल्कि आसान प्रक्रिया लगने लगती है। किताब की खास बात ये है कि इसमें मिथकों को सम्मानजनक तरीके से चुनौती दी गई है। उनकी जगह वैज्ञानिक तथ्यों को सहज भाषा में लिखा गया है। किताब की खासियत किताब में डॉ. माधवी ने बच्चे के पहले साल के 10 अहम माइलस्टोन्स को बेहद व्यवस्थित तरीके से बताया है। यही इस किताब की सबसे बड़ी खासियत है। इससे नए माता-पिता को हर पड़ाव पर सही दिशा मिलती है। हर अध्याय में दिए गए रिलेटेबल इलस्ट्रेशन (जैसे ब्रेस्टफीडिंग की अलग-अलग पोजिशन) बातों को समझने में आसान बना देते हैं। किताब में रियल लाइफ केस स्टडीज शामिल की गई हैं। इसका मकसद पाठक को यह एहसास दिलाना है कि ये समस्याएं काल्पनिक नहीं, बल्कि रोजमर्रा की सच्चाई हैं। इसके साथ ही कॉमन मिथकों को तोड़ने वाला हिस्सा और FAQs सेक्शन परेंट्स की उन शंकाओं का समाधान करता है, जिनके जवाब वे अक्सर इधर-उधर ढूंढते रहते हैं। इससे अनावश्यक डर और भ्रम अपने-आप कम हो जाता है। किताब की थीम किताब का मूल विचार बहुत साफ है कि पेरेंटिंग ‘परफेक्ट होने का’ खेल नहीं है। डॉ. माधवी मानती हैं कि हर बच्चा अलग है और हर परिवार की परिस्थितियां अलग होती हैं। इसलिए किताब में न तो आदर्श पेरेंट्स बनने का दबाव दिया गया है और न ही हर बात पर डराया गया है। ब्रेस्टफीडिंग की दिक्कतें हों, नींद की कमी हो या फिर बच्चे के रोने को समझना हो किताब हर विषय पर सहानुभूति और बिना जजमेंट के बात करती है। साथ ही मां के खान-पान की गलत धारणाओं को भी दूर करती है। यह आपको यह भरोसा देती है कि आप अकेले नहीं हैं। डॉ. माधवी बिना जजमेंट के माता-पिता की भावनाओं को समझती हैं, उनकी दुविधा को स्वीकार करती हैं और कहती हैं, हम सब इस दौर में कन्फ्यूज होते हैं। पेरेंट्स के मेंटल हेल्थ पर भी बात करती है ये बुक किताब में सिर्फ बच्चे की सेहत की नहीं बल्कि माता-पिता की मेंटल हेल्थ पर भी बात की गई है। लगातार तुलना, डर और सलाहों के बोझ को यह किताब कम करती है। जब पेरेंट्स को यह समझ में आने लगता है कि बच्चे का हर बार रोना खतरे की घंटी नहीं है और हर समस्या का समाधान मौजूद है, तो पेरेंटिंग का डर धीरे-धीरे भरोसे में बदल जाता है। इसका असर यह होता है कि माता-पिता ज्यादा शांत रहते हैं, बेहतर फैसले लेते हैं और बच्चे के साथ ज्यादा जुड़ाव महसूस करते हैं। आधुनिक साइकोलॉजी से जुड़े हैं विचार किताब भले ही भारी-भरकम मेडिकल शब्दों से भरी न हो, लेकिन इसका आधार पूरी तरह साइंटिफिक है। हर सलाह के पीछे वैज्ञानिक तर्क दिए गए हैं। पारंपरिक घरेलू नुस्खों जैसे- किताब में डॉ. माधवी भारद्वाज इन सबको तथ्यात्मक तरीके से गलत साबित करती है। इस किताब में यह भी स्पष्ट किया गया है कि किन स्थितियों में डॉक्टर के पास जाना जरूरी है और किनमें घबराने की जरूरत नहीं। केस स्टडीज और QA (सवाल-जवाब) में साइंस को रोजमर्रा की भाषा में पिरोया है, ताकि माता-पिता को लगे कि यह एक्शनेबल है, न कि सिर्फ थ्योरी है। किताब का सार यह किताब शिशु के विकास के 10 अहम पड़ावों को कवर करती है। इसमें जन्म के बाद के पहले सात दिनों की घबराहट से लेकर सॉलिड फूड शुरू करने जैसे बड़े और थोड़े अस्त-व्यस्त लेकिन जरूरी पड़ाव तक की बात की गई है। इसकी विषय-सूची किसी नए माता-पिता की गूगल सर्च हिस्ट्री जैसी लगती है। हर अध्याय वही सवाल उठाता है, जो माता-पिता के मन में सबसे पहले आता है, और उन्हें सरल, व्यावहारिक जवाब देता है। यह किताब क्यों पढ़नी चाहिए अगर आप नए माता-पिता हैं और बच्चे की देखभाल से जुड़े सवाल आपको परेशान करते हैं, तो यह किताब आपको अकेलापन महसूस नहीं होने देगी। यह आपको ज्यादा आत्मविश्वासी, ज्यादा जागरूक बनाएगी। जो पेरेंट्स की घबराबट को कम करेगी। भारतीय घरों के लिए खासतौर पर उपयोगी, क्योंकि देसी रियलिटी को समझती है। किताब के बारे में मेरी राय ‘बच्चों की डॉक्टर’ एक टेक्स्ट बुक से ज्यादा एक साथी की तरह है। डॉ. माधवी की भाषा इम्पेथेटिक, ईमानदार और हल्के हास्य से भरी है, जो पढ़ते वक्त सुकून देती है। असली परिवारों से जुड़े केस स्टडी और सवाल-जवाब वाला सेक्शन इसे और भरोसेमंद बनाता है। किताब मूल रूप से शैशवावस्था (बच्चे का पहला साल) पर लिखी गई है। हालांकि, जो पाठक बहुत डीप मेडिकल डिटेल्स ढूंढ रहे हैं, उन्हें यह किताब थोड़ी हल्की लग सकती है। यह किताब एहसास दिलाती है कि पेरेंटिंग में परफेक्ट नहीं, समझदार होना ज्यादा जरूरी है। ………………… ये खबर भी पढ़ें… बुक रिव्यू- जिंदगी के पांच सबसे कीमती धन:पैसा, रिश्ता, स्वास्थ्य, दिमाग और आर्थिक आजादी, इस संपदा को कैसे बचाएं और बढ़ाएं 'द 5 टाइप्स ऑफ वेल्थ' एक ऐसी किताब है जो आपको बताती है कि जिंदगी में असली खुशी सिर्फ पैसे से नहीं आती। लेखक साहिल ब्लूम, जो एक इंस्पिरेशनल स्पीकर, एंटरप्रेन्योर और न्यूजलेटर राइटर हैं, कहते हैं कि हमें बचपन से ही सिखाया जाता है कि धन मतलब सिर्फ बैंक बैलेंस। पूरी खबर पढ़ें…
जरूरत की खबर- होली की एडवांस तैयारी:आज से ही शुरू करें स्किन केयर रूटीन, ताकि सिंथेटिक रंगों से न हो त्वचा को नुकसान
होली रंग-गुलाल, खुशियों और मौज-मस्ती का त्योहार है। हम कपड़े, पिचकारी और पकवान की तैयारियां तो पहले से कर लेते हैं, लेकिन अक्सर अपनी स्किन को भूल जाते हैं। जबकि केमिकल वाले रंग और धूप स्किन को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसलिए होली पर रंग खेलने से पहले ही स्किन को तैयार करना जरूरी है, ताकि बाद में कोई समस्या न हो। इसलिए आज की जरूरत की खबर में जानेंगे कि- एक्सपर्ट: डॉ. विजय सिंघल, सीनियर कंसल्टेंट, डर्मेटोलॉजी, श्री बालाजी एक्शन मेडिकल इंस्टीट्यूट, दिल्ली सवाल- होली से 4-5 दिन पहले स्किन केयर रूटीन शुरू करना क्यों जरूरी है? जवाब- स्किन को अपनी प्रोटेक्टिव लेयर मजबूत करने और हाइड्रेशन को बैलेंस करने के लिए समय चाहिए। अगर पहले से स्किन केयर रूटीन फॉलो किया जाए तो स्किन कम सेंसिटिव और कम रिएक्टिव रहती है। इससे रंगों के केमिकल और धूप से होने वाली जलन, रैशेज या पिग्मेंटेशन का जोखिम घटता है। अचानक होली के एक दिन पहले तैयारी करने की बजाय कुछ दिन पहले से ‘प्रोटेक्ट मोड’ में रहना स्किन को ज्यादा सुरक्षित बनाता है। सवाल- स्किन बैरियर क्या होता है? जवाब- स्किन की सबसे ऊपरी लेयर बैरियर की तरह काम करती है। ये स्किन को किसी भी तरह के बाहरी नुकसान से बचाती है और अंदर की नमी को लॉक रखती है। इसे ऐसे समझिए- स्किन की सेल्स ‘ईंट’ हैं और उनके बीच मौजूद लिपिड (जैसे सेरामाइड) ‘सीमेंट’ का काम करते हैं। यही स्ट्रक्चर धूल, बैक्टीरिया, केमिकल, प्रदूषण और एलर्जेन्स को अंदर जाने से रोकता है। स्किन बैरियर कमजोर होने पर स्किन में ड्राईनेस, जलन, रेडनेस, पिंपल या पिग्मेंटेशन की समस्या बढ़ सकती है। सवाल- होली के रंग स्किन बैरियर को कैसे डैमेज करते हैं? जवाब- होली के रंग स्किन बैरियर को तीन तरीकों से नुकसान पहुंचा सकते हैं- आइए, अब इन कारकों को विस्तार से समझते हैं। केमिकल इरिटेशन कई सस्ते रंगों में सिंथेटिक डाई, मेटल सॉल्ट्स या इंडस्ट्रियल पिगमेंट मिलाए जाते हैं। ये स्किन की ऊपरी लेयर के लिपिड को प्रभावित कर सकते हैं। इससे बैरियर कमजोर होता है और जलन/लालिमा बढ़ती है। रंग छुड़ाते समय असावधानी रंग छुड़ाते समय जोर से स्क्रब करना या तौलिए से रगड़ना माइक्रो-टियर (स्किन की ऊपरी लेयर में बनने वाला बहुत बारीक स्क्रैच) बना सकता है। इससे मॉइश्चर कम होता है और स्किन ज्यादा सेंसिटिव हो जाती है। धूप का असर होली अक्सर खुले में खेली जाती है। UV (अल्ट्रावॉयलेट) किरणों का एक्सपोजर बैरियर को और कमजोर करता है। सवाल- होली के पहले स्किन केयर रूटीन कैसा होना चाहिए? जवाब- धूप और बार-बार रगड़ से स्किन बैरियर कमजोर हो सकता है। इसलिए आखिरी दिन हड़बड़ी में तैयारी करने की बजाय, 5–6 दिन पहले से एक प्लान्ड स्किन केयर रूटीन शुरू करना जरूरी है। ग्राफिक से समझते हैं कि होली के पहले स्किन केयर रूटीन कैसा होना चाहिए- सवाल- क्या अलग-अलग स्किन टाइप के लिए अलग-अलग स्किन केयर रूटीन जरूरी है? जवाब- हां, हर स्किन टाइप की जरूरत अलग होती है। पॉइंटर्स से समझते हैं- सवाल- क्या होली से पहले केमिकल पील, वैक्सिंग या लेजर ट्रीटमेंट करवाना सुरक्षित है? जवाब- नहीं, इन प्रक्रियाओं के बाद स्किन कुछ दिनों तक थिन, सेंसिटिव और इंफ्लेमेशन-प्रोन हो जाती है। ऐसे में रंगों के केमिकल, धूप और रगड़ से जलन, रैशेज या पिग्मेंटेशन बढ़ने का खतरा रहता है। केमिकल पील और लेजर के बाद सन-सेंसिटिविटी बढ़ती है। इसलिए इन्हें होली से कम-से-कम 2-3 हफ्ते पहले या फिर त्योहार के बाद करवाना बेहतर है। सवाल- क्या डाइट का भी स्किन पर असर पड़ता है? होली से पहले क्या खाएं ताकि स्किन कलर डैमेज कम हो और स्किन ग्लो करे? जवाब- हां, होली से पहले संतुलित और सही खानपान स्किन बैरियर को मजबूत करता है, स्किन इरिटेशन से बचाता है और नेचुरल ग्लो लाने में मदद करता है। सवाल- अगर स्किन सेंसिटिव है या पहले से एक्ने/पिग्मेंटेशन है तो क्या सावधानियां रखें? जवाब- होली से पहले स्किन को 'कूलिंग मोड' में रखें यानी स्किन को ऐसे फेज में रखें, जहां- इसके लिए ग्राफिक में देखें कि आपको क्या करना चाहिए- होली के बाद अगर स्किन में जलन या लालिमा हो तो एलोवेरा या सूदिंग जेल लगाएं। पिग्मेंटेशन-प्रोन स्किन में अगले कुछ दिनों तक धूप से खास बचाव करें, क्योंकि इंफ्लेमेशन के बाद दाग गहरे हो सकते हैं। अगर सूजन, तेज खुजली, पस वाले दाने हों या स्किन छिलने लगे तो डर्मेटोलॉजिस्ट से तुरंत संपर्क करें। सवाल- होली के बाद अगर रैशेज, जलन या एलर्जी हो जाए तो तुरंत क्या करें और कब डॉक्टर से मिलें? जवाब- पॉइंटर्स से समझते हैं- सवाल- होली के बाद कितने दिनों तक स्किन को एक्स्ट्रा केयर की जरूरत होती है? जवाब- होली में स्किन को रंगों से हुए नुकसान से उबरने के लिए लगभग 7 से 10 दिनों तक एक्स्ट्रा केयर (जैसे माइल्ड क्लींजर, हैवी मॉइश्चराइजर और सनस्क्रीन) की जरूरत होती है। इस दौरान स्किन को हाइड्रेट रखना, स्क्रब से बचना और देखभाल करना जरूरी है। सवाल- क्या घर पर बने उबटन या बेसन से रंग छुड़ाना सुरक्षित है? जवाब- हां, आमतौर पर ये सुरक्षित है। यह स्किन को नुकसान नहीं पहुंचाते और पक्का रंग, टैनिंग और इंप्योरिटीज को हटाने में मदद करते हैं। साथ ही स्किन को नमी व पोषण देते हैं। ध्यान रहे, इन्हें चेहरे पर जोर से न रगड़ें। ऐसा करने से स्किन में माइक्रो-इन्फ्लेमेशन, ड्राईनेस या पिग्मेंटेशन बढ़ सकता है। ……………………………. जरूरत की ये खबर भी पढ़ें… जरूरत की खबर- चाहिए चमकदार त्वचा तो खाएं विटामिन–C:इसकी कमी से होते 9 स्किन डैमेज, डाइट में शामिल करें ये हेल्दी फूड विटामिन C एक ऐसा जरूरी विटामिन है, जो हमारे शरीर के कई अहम कामों में बड़ी भूमिका निभाता है। इसे ‘एसेंशियल न्यूट्रिएंट’ कहा जाता है। शरीर इसे खुद नहीं बनाता बल्कि हमें इसे फूड के जरिए ही लेना पड़ता है। हाल के सालों में विटामिन C की पहचान सिर्फ सेहत तक सीमित नहीं रही है। पूरी खबर पढ़ें…
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