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₹30,213 करोड़ के Jio IPO से बढ़ा डॉलर का इनफ्लो, क्या कच्चे तेल की महंगाई बिगाड़ सकती है खेल?
Jio Platforms IPO: भारतीय रुपये को जियो प्लेटफॉर्म्स के IPO से सपोर्ट मिला है. इश्यू का साइज लगभग $3.2 बिलियन है, जो भारतीय रुपये में लगभग ₹30,213 करोड़ होता है. लेकिन रुपये की रिकवरी का असली टेस्ट अब शुरू हो रही है, क्योंकि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें विदेशी निवेश से मिली राहत को कम कर सकती हैं.
गुरुवार को रुपये का स्टेटस
गुरुवार को रुपया डॉलर के मुकाबले 94.8175 पर बंद हुआ. यह 0.4% की गिरावट दिखाता है, जिससे इसकी 8 दिन की जीत का सिलसिला खत्म हो गया. उसी दिन ब्रेंट क्रूड ऑयल 3.3% बढ़कर $112.40 प्रति बैरल हो गया, जो मई के बाद इसका सबसे ऊंचा लेवल है. पश्चिम एशिया में तनाव की चिंताओं ने ग्लोबल मार्केट पर दबाव डाला है. एक दिन पहले रुपया 94.46 पर बंद हुआ था. उस समय Jio के IPO से जुड़े विदेशी निवेश और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के उपायों से रुपया मजबूत हुआ था.
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विदेशी निवेश रुपये को कैसे मजबूत करता है?
आसान शब्दों में इसे समझें तो, जब विदेशी इन्वेस्टर भारतीय शेयर खरीदना चाहते हैं, तो उन्हें अपने डॉलर को रुपये में बदलना पड़ता है. इससे मार्केट में डॉलर की सप्लाई और रुपये की डिमांड बढ़ती है. जैसे किसी चीज की डिमांड बढ़ने पर उसकी कीमत बढ़ती है. वैसे ही रुपये की डिमांड बढ़ने पर रुपये की कीमत भी बढ़ती है. इसका मतलब है कि एक डॉलर के लिए कम रुपये देने पड़ते हैं. IPO के दौरान, इन्वेस्टर और बैंक शेयर अलॉटमेंट के समय अपनी डॉलर और रुपये की जरूरतों को मैनेज करने के लिए शॉर्ट-टर्म फॉरेन एक्सचेंज का इंतजाम भी करते हैं.
रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जियो इश्यू से जुड़े विदेशी इन्वेस्टमेंट की वजह से 21 अक्टूबर को रुपया छह हफ्ते हाई पर पहुंच गया. अक्टूबर की शुरुआत में अपने रिकॉर्ड लो के पास से यह 2% से ज्यादा रिकवर हुआ. ऐसा IPO इन्वेस्टमेंट, RBI के उपायों और अलग-अलग समय पर डॉलर के कमजोर होने की वजह से हुआ.
IPO का पैसा काफी क्यों नहीं हो सकता?
फिनडॉक ग्रुप के फाउंडर और मैनेजिंग डायरेक्टर हेमंत सूद का कहना है कि रुपये की रिकवरी तेल की कीमतों और विदेशी इन्वेस्टमेंट के बने रहने पर निर्भर करती है. उनके अनुसार, IPO का कुल साइज मायने नहीं रखता, बल्कि यह मायने रखता है कि नए विदेशी पैसे को रुपये में कितना बदला गया. उनका कहना है कि शेयर अलॉटमेंट और सेटलमेंट के बाद रुपये को मिला यह एक्स्ट्रा सपोर्ट कमजोर पड़ सकता है. भले ही अलॉटमेंट के बाद इन्वेस्टर अपने शेयर होल्ड करें.
रुपये को लगातार मजबूत करने के लिए विदेशी खरीदारी कुछ बड़े इश्यू तक सीमित नहीं होनी चाहिए. इसे दूसरे स्टॉक और बॉन्ड तक बढ़ाना होगा और इसे लंबे समय के डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट के साथ जोड़ना होगा. यह कॉर्पोरेट अर्निंग्स, मार्केट वैल्यूएशन, पॉलिसी स्टेबिलिटी और ग्लोबल इन्वेस्टर की रिस्क लेने की इच्छा पर निर्भर करेगा.
RBI ने क्या कदम उठाए?
RBI के एक्शन से रुपये पर दबाव भी कम हुआ है. 10 अक्टूबर को सेंट्रल बैंक ने स्पेक्युलेशन को रोकने और डॉलर की डिमांड को मैनेज करने के उपायों की घोषणा की. मार्केट में इसके दखल ने इन उपायों और विदेशी इन्वेस्टमेंट के असर को और मजबूत किया. लेकिन सूद के अनुसार, ऐसा सपोर्ट हमेशा भारत के एक्सटर्नल अकाउंट्स की बिगड़ती हालत की भरपाई नहीं कर सकता. RBI द्वारा इंटरेस्ट रेट में और बढ़ोतरी की उम्मीदों से भी रुपये पर असर पड़ सकता है. हालांकि विदेशी निवेशक हेजिंग लागत, एक्सचेंज रेट के जोखिम और आर्थिक विकास पर सख्त मॉनेटरी पॉलिसी के असर के मुकाबले संभावित रिटर्न का आकलन करेंगे.
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कच्चा तेल सबसे बड़ा खतरा क्यों है?
सरकारी प्रोविजनल डेटा के अनुसार, भारत ने 2025-26 फिस्कल ईयर में अपनी कच्चे तेल की जरूरत का 88.7% इम्पोर्ट किया. इसलिए इंटरनेशनल मार्केट में तेल की बढ़ती कीमतों से भारत पर सबसे ज्यादा असर पड़ता है. जब कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो भारतीय रिफाइनरियों को विदेशी सप्लायर को ज्यादा डॉलर रेट देने पड़ते हैं. अगर यह स्थिति बनी रहती है तो इम्पोर्ट बिल बढ़ जाता है और करंट अकाउंट पर दबाव पड़ता है.
करंट अकाउंट का मतलब देश में विदेशी करेंसी के कुल इनफ्लो और आउटफ्लो से है. इससे RBI के लिए महंगाई को मैनेज करना भी मुश्किल हो जाता है. रोजाना की कीमत से ज्यादा यहां यह मायने रखता है कि तेल की कीमत कब तक बढ़ती है. सर्विसेज एक्सपोर्ट और रेमिटेंस कुछ सपोर्ट देते हैं, जिससे विदेशी करेंसी आती है. लेकिन अगर एनर्जी की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो यह मजबूती भी दबाव में आ सकती है.
रुपये का आगे क्या होगा?
रॉयटर्स के रिपोर्ट्स के मुताबिक, तेल की ऊंची कीमतों और ग्लोबल मार्केट में सुरक्षित निवेश की बढ़ती प्रवृत्ति ने रुपये पर फिर से दबाव डाला है. गुरुवार 22 अक्टूबर की गिरावट के बाद डॉलर के मुकाबले इसके लगभग 94.84 से 94.88 पर कमजोर खुलने की उम्मीद थी. सूद को उम्मीद है कि आने वाले समय में रुपया अस्थिर रहेगा. उनका मानना है कि अगर IPO से जुड़ी रुपये की बढ़त कम होने के बाद भी तेल महंगा रहता है, तो रुपये के फिर से गिरने का खतरा है. ज्यादा टिकाऊ रिकवरी के लिए, बड़े पैमाने पर विदेशी निवेश और एनर्जी की कीमतों में राहत जरूरी होगी.
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Disclaimer: यह जानकारी अलग-अलग एनालिस्ट और ब्रोकरेज फर्मों की राय पर आधारित है. इसे निवेश की सलाह न माना जाए. शेयर बाजार में निवेश जोखिम भरा होता है, इसलिए निवेश करने से पहले अपने फाइनेंशियल एडवाइजर से सलाह जरूर लें.
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