भारतीय क्षेत्रीय राजनीति के शतरंज पर गठबंधन की गोटियां हमेशा जीत-हार का फैसला करती रही हैं। वर्तमान में पुडुचेरी का सियासी पारा तब चढ़ गया जब कांग्रेस के कद्दावर नेता और पूर्व मुख्यमंत्री वी. नारायणसामी ने 2026 के विधानसभा चुनावों से पहले एक बड़ा बयान दे दिया। उनका स्पष्ट तर्क है कि पुडुचेरी में कांग्रेस को गठबंधन की कमान संभालनी चाहिए। यह मांग केवल एक इच्छा नहीं, बल्कि आंकड़ों की वह बाजीगरी है जिसने साथी दल DMK की पेशानी पर बल डाल दिए हैं।
नारायणसामी की इस दावेदारी की बुनियाद हालिया प्रदर्शन और वोट शेयर पर टिकी है। राजनीति में 'नंबर' ही सर्वोपरि होते हैं, और यहाँ कांग्रेस का पलड़ा भारी नजर आता है। पार्टी का दावा है कि उनके पास 26% का मजबूत वोट बैंक है। साथ ही गठबंधन सहयोगी DMK फिलहाल 8% वोट शेयर के साथ काफी पीछे खड़ी दिख रही है। इन्हीं आंकड़ों के दम पर नारायणसामी का तर्क है कि जिस पार्टी की जड़ें जनता में अधिक गहरी हैं, नेतृत्व का हक भी उसी का बनता है।
पुडुचेरी के राजनीतिक गलियारों में कांग्रेस का इतिहास काफी पुराना और रसूखदार रहा है। केंद्र शासित प्रदेश होने के नाते यहाँ की सत्ता की चाबी अक्सर उसी के पास रही है जो स्थानीय भावनाओं को दिल्ली की राजनीति के साथ तालमेल बिठाकर चल सके।
2026 के चुनावों की आहट ने अब क्षेत्रीय दलों को अपनी ताकत आंकने पर मजबूर कर दिया है। कांग्रेस को लगता है कि पिछले कुछ चुनावों के उतार-चढ़ाव के बाद अब वक्त आ गया है कि वह 'जूनियर पार्टनर' की छवि से बाहर निकलकर फ्रंट सीट पर बैठे।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या DMK इस मांग के आगे झुकेगी? तमिलनाडु में मजबूत स्थिति रखने वाली DMK के लिए पुडुचेरी में कांग्रेस की शर्तों पर समझौता करना आसान नहीं होगा। उनके फैसले को कई कारक प्रभावित करेंगे।क्या DMK के समर्थक नेतृत्व छोड़ने के फैसले को स्वीकार करेंगे? और क्या विपक्षी दलों (NR कांग्रेस और भाजपा गठबंधन) को हराने के लिए क्या दोनों दल अपनी ईगो को किनारे रख पाएंगे?
पुडुचेरी का यह फैसला केवल एक छोटे प्रदेश तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह इंडिया गठबंधन के भविष्य के समीकरणों की दिशा भी तय करेगा। वी. नारायणसामी का यह रुख केवल एक बयान नहीं, बल्कि एक रणनीतिक दबाव है। 2026 के चुनावों की छाया में, कांग्रेस और DMK के बीच की यह सौदेबाजी भारतीय गठबंधन राजनीति के बदलते स्वरूप को दर्शाती है। यदि कांग्रेस नेतृत्व हथियाने में सफल रहती है, तो यह पार्टी के पुनरुत्थान के लिए एक बड़ा बूस्टर शॉट होगा।
आने वाले महीनों में होने वाली वार्ताएं न केवल पुडुचेरी का भविष्य तय करेंगी, बल्कि पूरे देश में यह संदेश भी देंगी कि क्षेत्रीय गठबंधन में 'शक्ति संतुलन' किस करवट बैठ रहा है।
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असम की राजनीति में रविवार को एक बड़ा बदलाव देखने को मिला, जब असम कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष भूपेन कुमार बोरा ने आधिकारिक तौर पर बीजेपी जॉइन कर ली। गुवाहाटी में असम बीजेपी चीफ दिलीप सैकिया की मौजूदगी में उन्होंने पार्टी की सदस्यता ली। उनके साथ संजू बरुआ और सर्बनारायण देवरी जैसे युवा कांग्रेस नेता भी बीजेपी में शामिल हुए हैं।
कौन हैं भूपेन बोरा?
भूपेन बोरा एक अनुभवी नेता हैं, जो पिछले 32 सालों से कांग्रेस से जुड़े हुए थे। उनके करियर की कुछ मुख्य बातें, वे 2006 से 2016 तक बिहपुरिया से विधायक रहे। वे 2021 से 2024 तक असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे। तरुण गोगोई की सरकार में वे सरकार के प्रवक्ता और पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी भी रहे।
उन्होंने अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत छात्र राजनीति से की थी और डिब्रूगढ़ यूनिवर्सिटी में यूनियन के जनरल सेक्रेटरी भी रहे। दिलचस्प बात यह है कि केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल और भूपेन बोरा एक ही यूनिवर्सिटी में साथ पढ़ते थे।
कांग्रेस छोड़ने की बड़ी वजह
भूपेन बोरा ने पार्टी छोड़ने के पीछे कांग्रेस सांसद रकीबुल हुसैन को एक बड़ी वजह बताया है। बोरा का आरोप है कि असम में कांग्रेस की असली कमान रकीबुल हुसैन के हाथों में है, जबकि स्टेट यूनिट चीफ गौरव गोगोई सिर्फ नाम के पद पर हैं। बोरा का कहना है कि पार्टी के भीतर इसी खींचतान की वजह से उन्होंने इस्तीफा देने का फैसला किया। रकीबुल हुसैन ने अभी इन आरोपों का सीधा जवाब नहीं दिया है।
कांग्रेस के लिए अहम थे
भूपेन बोरा कांग्रेस के एक मजबूत सांगठनिक नेता माने जाते थे। उन्होंने छात्र संगठन एनएसयूआई से लेकर यूथ कांग्रेस और फिर स्टेट कांग्रेस तक का सफर तय किया। वे एआईसीसी के सचिव भी रहे और असम के साथ-साथ उत्तर-पूर्व के अन्य राज्यों में भी पार्टी को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई। उनके नेतृत्व में ही पिछले साल कांग्रेस ने असम में तीन लोकसभा सीटें जीती थीं। अब चुनाव से ठीक पहले उनका बीजेपी में जाना कांग्रेस के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।
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