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Trump टैरिफ रद्द, तो US डील में जल्दबाज़ी क्यों? खड़गे ने Modi सरकार की Foreign Policy पर उठाए सवाल

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने शनिवार को सवाल उठाया कि क्या नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की विदेश नीति अस्पष्ट है या उसने अमेरिका के सामने "एकतरफा आत्मसमर्पण" कर दिया है। यह सवाल अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा लगाए गए वैश्विक टैरिफ को खारिज करने के बाद उठाया गया। एक्स पर एक पोस्ट में, खरगे ने पूछा कि केंद्र ने अंतरिम व्यापार समझौते में जल्दबाजी करने से पहले अमेरिकी अदालत के फैसले का इंतजार क्यों नहीं किया, जिसे उन्होंने जाल समझौता कहा।
 

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खरगे  ने समझौते के संयुक्त वक्तव्य की आलोचना करते हुए कहा कि इसमें कई अमेरिकी निर्यातों पर शून्य टैरिफ शामिल हैं, जिससे भारत की कृषि को अमेरिकी वस्तुओं के लिए प्रभावी रूप से खोल दिया गया है, 500 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य के अमेरिकी उत्पादों के आयात की योजना है, रूसी तेल की खरीद पर रोक है जिससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा को नुकसान पहुंच सकता है, और कई डिजिटल कर रियायतें शामिल हैं।

खरगे के 'X' पोस्ट में लिखा था कि अस्पष्ट विदेश नीति या एकतरफा आत्मसमर्पण? मोदी सरकार ने टैरिफ पर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार क्यों नहीं किया, इससे पहले कि वह जल्दबाजी में एक ऐसे 'धोखेबाज़ समझौते' में फंस गई, जिससे भारत से भारी रियायतें हासिल की गईं? संयुक्त बयान में भारत को निर्यात होने वाले कई अमेरिकी उत्पादों पर शून्य टैरिफ की बात कही गई थी, जिससे भारत की कृषि को अमेरिकी वस्तुओं के लिए लगभग खोल दिया गया था, 500 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य के अमेरिकी सामान आयात करने की योजना थी, हमारी ऊर्जा सुरक्षा को नुकसान पहुंचाने वाले रूसी तेल की खरीद पर रोक लगाने की प्रतिबद्धता थी और डिजिटल क्षेत्र में कई कर रियायतें थीं।
 

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उन्होंने आगे मांग की कि प्रधानमंत्री मोदी स्पष्ट करें कि किसने सरकार पर भारत के राष्ट्रीय हित और रणनीतिक स्वायत्तता से समझौता करने के लिए दबाव डाला। खरगे ने 140 करोड़ भारतीयों की गरिमा की रक्षा करने और किसानों, श्रमिकों, छोटे व्यवसायों और व्यापारियों के हितों की सुरक्षा करने वाले एक निष्पक्ष व्यापार समझौते की आवश्यकता पर जोर दिया। 'X' पोस्ट में आगे लिखा था कि मोदी जी को भारतीयों के सामने खड़े होकर सच बताना होगा। किसने या किस बात ने आप पर भारत के राष्ट्रीय हित और रणनीतिक स्वायत्तता से समझौता करने का दबाव डाला? क्या यह एपस्टीन फाइल्स का मामला था? क्या भारत सरकार अपनी गहरी नींद से जागेगी और एक ऐसा निष्पक्ष व्यापार समझौता करेगी जो 140 करोड़ भारतीयों के आत्मसम्मान और हमारे किसानों, श्रमिकों, छोटे व्यवसायों और व्यापारियों के हितों की रक्षा करे?

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Prabhasakshi NewsRoom: 'Victim Card खेलकर आगे नहीं बढ़ सकते दलित' वाली टिप्पणी को लेकर JNU VC के इस्तीफे की माँग तेज

जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय की कुलपति शांतिश्री धुलिपुडी पंडित की एक कथित जातिवादी टिप्पणी को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। विश्वविद्यालय परिसर में छात्र संगठनों ने उनके इस्तीफे की मांग करते हुए देशव्यापी विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया है। विवाद की जड़ एक पॉडकास्ट में दिया गया उनका बयान है, जिसमें उन्होंने कहा कि दलित और अश्वेत समुदाय स्थायी पीड़ित बनकर या पीड़ित कार्ड खेलकर आगे नहीं बढ़ सकते। इस बयान के सामने होते ही सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं आने लगीं और कैंपस की राजनीति एक बार फिर उबाल पर आ गई।

हम आपको बता दें कि यह पॉडकास्ट 16 फरवरी को प्रसारित हुआ था। इसमें कुलपति ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के 2026 इक्विटी एंटी डिस्क्रिमिनेशन रेगुलेशन पर टिप्पणी की थी। ये प्रस्तावित नियम उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव से निपटने के उद्देश्य से लाए गए थे। हालांकि कुछ सवर्ण समूहों के विरोध के बाद उच्चतम न्यायालय ने इन नियमों पर रोक लगा दी है।

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पॉडकास्ट में कुलपति ने कहा कि ऐसे नियम अनावश्यक और अव्यवहारिक हैं। उनका कहना था कि किसी को स्थायी खलनायक बनाकर प्रगति संभव नहीं है और यह एक तरह का अस्थायी नशा है। उन्होंने अमेरिका में ब्लैक समुदाय और भारत में दलितों के संदर्भ का जिक्र करते हुए कहा कि स्थायी पीड़ित बने रहने से आगे बढ़ना मुश्किल है। इस टिप्पणी को कई छात्र संगठनों ने सीधा जातिवादी करार दिया।

हालांकि कुलपति ने सफाई देते हुए कहा कि उनके बयान को गलत तरीके से पेश किया गया। उन्होंने कहा कि वह तथाकथित वोक विचारधारा की आलोचना कर रही थीं और स्थायी पीड़ित मानसिकता के बारे में विरोधियों के तर्क का उल्लेख कर रही थीं। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें लगता है कि इस पूरे विवाद में पर्याप्त सावधानी नहीं बरती गई और बेवजह संदेह पैदा किया गया। साथ ही उन्होंने खुद को बहुजन बताते हुए कहा कि उनकी मंशा किसी समुदाय को आहत करने की नहीं थी।

उधर, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय छात्र संघ ने एक बयान जारी कर इन टिप्पणियों को खुला जातिवादी बयान बताया और कहा कि यह विश्वविद्यालयों और सार्वजनिक स्थलों में व्याप्त संरचनात्मक बहिष्कार की मानसिकता को दर्शाता है। छात्र संघ ने अन्य परिसरों के संगठनों से भी अपील की है कि वे इस बयान की निंदा करें और विरोध प्रदर्शन में शामिल हों। छात्र संघ ने कुलपति द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से अपने जुड़ाव पर गर्व जताने को भी आपत्तिजनक बताया। कुलपति ने कहा था कि उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ाव पर गर्व है और वहीं से उन्हें विविधता की सराहना का दृष्टिकोण मिला।

देखा जाये तो यह सच है कि किसी भी समाज को केवल पीड़ा की पहचान में कैद नहीं रहना चाहिए। प्रगति के लिए आत्मविश्वास, शिक्षा और अवसर जरूरी हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि सदियों के जातिगत उत्पीड़न को केवल मानसिकता कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। भारत में दलित समुदाय का अनुभव कोई काल्पनिक आख्यान नहीं, बल्कि कठोर सामाजिक यथार्थ है। इसलिए कुलपति को समझना होगा कि खुद को बहुजन बताने भर से काम नहीं चलेगा। कुलपति को समझना होगा कि विश्वविद्यालय केवल ज्ञान के केंद्र नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना के निर्माण के स्थल भी होते हैं। यहां दिया गया हर बयान दूर तक असर डालता है। बहरहाल, अब जरूरत है कि विश्वविद्यालय प्रशासन, छात्र संगठन और नीति निर्माता अपनी अपनी जिम्मेदारियों को समझें और उसी के अनुरूप व्यवहार करें।

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  Sports

ICC Pre-Seeding विवाद पर बोले Sunil Gavaskar- 'टूर्नामेंट से पहले क्यों नहीं उठाए सवाल?'

टी20 विश्व कप 2026 अब अपने निर्णायक दौर में पहुंच चुका है और सुपर 8 मुकाबले शुरू हो गए हैं। कोलंबो में पाकिस्तान और न्यूजीलैंड का पहला मैच बारिश के कारण रद्द हो गया, लेकिन असली चर्चा अब टूर्नामेंट के प्रारूप को लेकर हो रही है।

दरअसल आईसीसी द्वारा अपनाई गई प्री-सीडिंग व्यवस्था पर सोशल मीडिया में सवाल उठ रहे हैं। मौजूद जानकारी के अनुसार ग्रुप चरण की सभी शीर्ष टीमों भारतीय टीम, साउथ अफ्रिका, जिम्बाब्वे और वेस्टइंडीज को सुपर 8 के ग्रुप 1 में रखा गया। वहीं दूसरे ग्रुप में इंग्लैंड, श्रीलंका, पाकिस्तान और न्यूजीलैंड जैसी टीमें शामिल हैं, जो अपने-अपने ग्रुप में दूसरे स्थान पर रहीं।

गौरतलब है कि इस व्यवस्था के कारण दो मजबूत टीमें सुपर 8 चरण में ही बाहर हो सकती हैं। आम तौर पर बड़े टूर्नामेंटों में ग्रुप विजेताओं को अपेक्षाकृत संतुलित ग्रुप मिलता है, लेकिन यहां उल्टा समीकरण बन गया है। इसी वजह से प्रशंसकों, खासकर श्रीलंका समर्थकों ने नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि श्रीलंका में ग्रुप चरण खेलने के बावजूद सेमीफाइनल में पहुंचने पर टीम को भारत में खेलना पड़ सकता है।

इस विवाद के बीच पूर्व भारतीय कप्तान सुनील गावस्कर ने कहा कि अब इस मुद्दे को उठाने का ज्यादा मतलब नहीं है। उनके मुताबिक अगर किसी को प्रारूप पर आपत्ति थी तो उसे टूर्नामेंट शुरू होने से पहले उठाना चाहिए था, जब कार्यक्रम घोषित किया गया था।

गावस्कर ने यह भी कहा कि अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट आयोजित करना आसान नहीं होता। चूंकि यह प्रतियोगिता दो देशों में खेली जा रही है, इसलिए यात्रा, वीजा, सीमा शुल्क और आवास जैसी व्यवस्थाएं भी ध्यान में रखनी पड़ती हैं। हर टीम के साथ सहयोगी स्टाफ की संख्या अलग-अलग होती है, जिससे होटल बुकिंग और अन्य इंतजाम प्रभावित होते हैं। संभव है कि इन्हीं व्यावहारिक कारणों से प्री-सीडिंग का फैसला लिया गया हो।

बता दें कि टूर्नामेंट शुरू होने से पहले ही शीर्ष आठ टीमों की अंतरराष्ट्रीय टी20 रैंकिंग के आधार पर सुपर 8 के स्लॉट तय कर दिए गए थे। इसी वजह से दक्षिण अफ्रीका अपने ग्रुप में शीर्ष पर रहने के बावजूद सीडिंग में नीचे माना गया, क्योंकि न्यूजीलैंड की रैंकिंग ऊंची थी।

क्रिकेट जानकारों का मानना है कि इस प्रारूप ने सुपर 8 को और प्रतिस्पर्धी जरूर बना दिया है, लेकिन इससे असंतुलन की बहस भी तेज हुई है। अब आने वाले मुकाबले तय करेंगे कि विवाद के बीच कौन सी टीम दबाव झेलते हुए सेमीफाइनल में जगह बनाती है।
Sun, 22 Feb 2026 21:31:21 +0530

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