अमेरिका की व्यापार नीति को लेकर एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शनिवार को संकेत दिया कि वह वैश्विक आयात शुल्क को 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत करने जा रहे हैं। यह फैसला ऐसे समय आया है जब एक दिन पहले ही उन्होंने 10 प्रतिशत का वैश्विक शुल्क लागू करने की घोषणा की थी।
बता दें कि यह पूरा घटनाक्रम अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के बाद शुरू हुआ। अदालत ने कहा कि 1977 के अंतरराष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्तियां अधिनियम के तहत राष्ट्रपति को व्यापक शुल्क लगाने का अधिकार नहीं है। छह-तीन के बहुमत से दिए गए फैसले में अदालत ने ट्रंप द्वारा लगाए गए तथाकथित “पारस्परिक” शुल्कों को असंवैधानिक बताया।
इसके तुरंत बाद ट्रंप ने कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर कर 150 दिनों के लिए 10 प्रतिशत वैश्विक आयात कर लागू करने की घोषणा की, जिसे कांग्रेस की मंजूरी के बिना लागू किया जा सकता है। हालांकि यह प्रावधान सीमित अवधि के लिए ही प्रभावी रहेगा।
मौजूद जानकारी के अनुसार अब 15 प्रतिशत वैश्विक शुल्क लागू होने पर भारत पर प्रभाव सीमित रह सकता है। पिछले वर्ष भारत पर 25 प्रतिशत पारस्परिक शुल्क लगाया गया था, जिसे बाद में रूसी तेल आयात के मुद्दे पर बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया गया था। फरवरी 2026 में दोनों देशों के बीच अंतरिम व्यापार समझौते के ढांचे पर सहमति बनने के बाद यह दर घटाकर 18 प्रतिशत कर दी गई थी।
अगर नया 15 प्रतिशत वैश्विक शुल्क लागू होता है तो भारत की प्रभावी दर करीब 18.5 प्रतिशत के आसपास रह सकती है, जो हालिया समझौते से बहुत अलग नहीं मानी जा रही है।
ट्रंप ने अदालत के फैसले पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वह इस निर्णय से निराश हैं। उन्होंने बहुमत के खिलाफ फैसला देने वाले न्यायाधीशों की आलोचना की, जबकि असहमति जताने वाले न्यायाधीशों की खुलकर सराहना की।
गौरतलब है कि वैश्विक व्यापार पहले ही कई चुनौतियों से गुजर रहा है। ऐसे में अमेरिका की नई शुल्क नीति से बाजारों में अनिश्चितता बढ़ सकती है। व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले हफ्तों में यह स्पष्ट होगा कि नया प्रस्तावित शुल्क कितनी तेजी से लागू होता है और इसका वैश्विक अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ता है। फिलहाल दुनिया की नजर वाशिंगटन के अगले कदम पर टिकी हुई है।
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टी20 विश्व कप 2026 अब अपने निर्णायक दौर में पहुंच चुका है और सुपर 8 मुकाबले शुरू हो गए हैं। कोलंबो में पाकिस्तान और न्यूजीलैंड का पहला मैच बारिश के कारण रद्द हो गया, लेकिन असली चर्चा अब टूर्नामेंट के प्रारूप को लेकर हो रही है।
दरअसल आईसीसी द्वारा अपनाई गई प्री-सीडिंग व्यवस्था पर सोशल मीडिया में सवाल उठ रहे हैं। मौजूद जानकारी के अनुसार ग्रुप चरण की सभी शीर्ष टीमों भारतीय टीम, साउथ अफ्रिका, जिम्बाब्वे और वेस्टइंडीज को सुपर 8 के ग्रुप 1 में रखा गया। वहीं दूसरे ग्रुप में इंग्लैंड, श्रीलंका, पाकिस्तान और न्यूजीलैंड जैसी टीमें शामिल हैं, जो अपने-अपने ग्रुप में दूसरे स्थान पर रहीं।
गौरतलब है कि इस व्यवस्था के कारण दो मजबूत टीमें सुपर 8 चरण में ही बाहर हो सकती हैं। आम तौर पर बड़े टूर्नामेंटों में ग्रुप विजेताओं को अपेक्षाकृत संतुलित ग्रुप मिलता है, लेकिन यहां उल्टा समीकरण बन गया है। इसी वजह से प्रशंसकों, खासकर श्रीलंका समर्थकों ने नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि श्रीलंका में ग्रुप चरण खेलने के बावजूद सेमीफाइनल में पहुंचने पर टीम को भारत में खेलना पड़ सकता है।
इस विवाद के बीच पूर्व भारतीय कप्तान सुनील गावस्कर ने कहा कि अब इस मुद्दे को उठाने का ज्यादा मतलब नहीं है। उनके मुताबिक अगर किसी को प्रारूप पर आपत्ति थी तो उसे टूर्नामेंट शुरू होने से पहले उठाना चाहिए था, जब कार्यक्रम घोषित किया गया था।
गावस्कर ने यह भी कहा कि अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट आयोजित करना आसान नहीं होता। चूंकि यह प्रतियोगिता दो देशों में खेली जा रही है, इसलिए यात्रा, वीजा, सीमा शुल्क और आवास जैसी व्यवस्थाएं भी ध्यान में रखनी पड़ती हैं। हर टीम के साथ सहयोगी स्टाफ की संख्या अलग-अलग होती है, जिससे होटल बुकिंग और अन्य इंतजाम प्रभावित होते हैं। संभव है कि इन्हीं व्यावहारिक कारणों से प्री-सीडिंग का फैसला लिया गया हो।
बता दें कि टूर्नामेंट शुरू होने से पहले ही शीर्ष आठ टीमों की अंतरराष्ट्रीय टी20 रैंकिंग के आधार पर सुपर 8 के स्लॉट तय कर दिए गए थे। इसी वजह से दक्षिण अफ्रीका अपने ग्रुप में शीर्ष पर रहने के बावजूद सीडिंग में नीचे माना गया, क्योंकि न्यूजीलैंड की रैंकिंग ऊंची थी।
क्रिकेट जानकारों का मानना है कि इस प्रारूप ने सुपर 8 को और प्रतिस्पर्धी जरूर बना दिया है, लेकिन इससे असंतुलन की बहस भी तेज हुई है। अब आने वाले मुकाबले तय करेंगे कि विवाद के बीच कौन सी टीम दबाव झेलते हुए सेमीफाइनल में जगह बनाती है।
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