अगले हफ्ते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की होने वाली इजराइल यात्रा से ठीक पहले भारत ने एक ऐसा कदम उठाया है जिसने कूटनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। जहां भारत ने इजराइल के खिलाफ यूएन में अपना पक्ष रखा है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र में उस संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर किए हैं जिसमें वेस्ट बैंक में इजराइल द्वारा नियंत्रण मजबूत करने की कार्रवाई की कड़ी निंदा की गई है। यूएन का यह बयान 100 से अधिक देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों द्वारा जारी किया गया है। जिसमें यूनाइटेड किंगडम, रशिया, फ्रांस और जर्मनी जैसे देश शामिल है और भारत ने भी इस बयान के डेडलाइन समाप्त होने से ठीक पहले इस बयान का समर्थन किया है। इस बयान में कहा गया है कि वेस्ट बैंक में इजराइल की एकतरफ़ा कार्रवाइयां अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ है और इन्हें तुरंत वापस लिया जाना चाहिए। साथ ही 1967 के बाद कब्जे वाली फिलिस्तीनी क्षेत्रों जिसमें पूर्वी यरूशलेम भी शामिल है।
वहां की जनसंख्यिकी और भौगोलिक स्थिति बदलने की किसी भी कोशिश को खारिज किया गया है। आपको बता दें इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र की अंडर सेक्रेटरी जनरल रोजमरी डिकालो ने भी चेतावनी दी है कि यह कदम डिफेक्टो एनेक्सेशन यानी व्यवहारिक रूप से कब्जे की स्थिति बनाने की दिशा में बढ़ रहे हैं। यह मुद्दा यूनाइटेड नेशन सुरक्षा परिषद तक पहुंच चुका है। भारत का ये रुख इसलिए भी अहम है क्योंकि नई दिल्ली और तेल अवी के रिश्ते पिछले एक दशक में काफी मजबूत हुए हैं। खास करके रक्षा और तकनीकी सहयोग के क्षेत्र में। लेकिन भारत लगातार हमेशा से दो राष्ट्र समाधान का समर्थन करता रहा है। जिसमें एक तरफ स्वतंत्र फिलिस्तीन दूसरी तरफ सुरक्षित सीमाओं के भीतर इजराइल दोनों साथ-साथ अस्तित्व में हो ऐसा भारत मानता है।
यह कदम एक संतुलित कूटनीति का संकेत भी है। जहां भारत फिलिस्तीन और इजराइल दोनों से अपने रिश्ते बेहतर करना चाहता है। एक ओर भारत इजराइल के साथ रणनीतिक साझेदारी मजबूत कर रहा है। तो दूसरी ओर वो अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों में फिलिस्तीन का समर्थन भी कर रहा है। अब सवाल यह है कि क्या प्रधानमंत्री मोदी की आगामी इजराइल यात्रा के दौरान यह मुद्दा वहां पर उठ सकता है और क्या भारत अपने पारंपरिक संतुलन वाले रुख को बरकरार रखते हुए पश्चिमी एशिया में बड़े भूमिका निभाने की कोशिश करेगा। एक बात तो स्पष्ट है कि भारत ने यह संदेश दिया है कि दोस्ती अपनी जगह लेकिन वैश्विक नियम और सिद्धांत भी उतने ही महत्वपूर्ण है।
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जिस वक्त भारत में दुनिया भर के कई राष्ट्र अध्यक्ष और बड़े-बड़े बिजनेसमैन एआई समिट में हिस्सा ले रहे हैं, ठीक उसी वक्त ईरान को चारों तरफ से घेरा जा चुका है। खबरें हैं कि इस हफ्ते अमेरिका ईरान पर हमला कर सकता है। सिर्फ राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अंतिम मंजूरी मिलनी बाकी है। ईरान और रूस के जंगी जहाज भी अमेरिका के खिलाफ शक्ति प्रदर्शन करने उतर आए हैं। लेकिन इस भयंकर तनाव के बीच अचानक ईरान में लाखों घर हिलने लगे। वैसे आने वाले कुछ घंटे पूरी दुनिया को हिला देंगे। लेकिन इस वीडियो में हम आपको बताएंगे कि ईरान में यह घर क्यों हिलने लगे।
ईरान के चारों तरफ मिडिल ईस्ट में अमेरिका ने 2003 के इराक युद्ध के बाद अपनी एयरफोर्स की सबसे बड़ी तैनाती कर दी है। अमेरिका ने मिडिल ईस्ट में F35, F22 रैप्टर, F15 और F16 जैसे एडवांस्ड फाइटर जेट्स की कई स्क्वाडंस तैनात कर दी हैं। बड़े पैमाने पर एयर ऑपरेशंस के लिए जरूरी कमांड एंड कंट्रोल एयरक्राफ्ट भी भेजे जा रहे हैं। हाल ही के हफ्तों में एयर डिफेंस सिस्टम्स भी इस इलाके में तैनात किए जा चुके हैं। आप एक बार ईरान के आसपास अमेरिका के नेवल और मिलिट्री बेसिस देख लीजिए। खबरें हैं कि इस बार अगर हमला हुआ तो कार्रवाई बहुत बड़ी होगी क्योंकि अमेरिका के साथ इस बार इजराइल भी पूरी ताकत के साथ कूदेगा। लेकिन जिस वक्त धीरे-धीरे अमेरिका और इजराइल ईरान की तरफ कदम दर कदम बढ़ रहे हैं। ठीक उसी वक्त ईरान की धरती कांपने लगी है।
खबर आई है कि ईरान में अचानक 5.5 तीव्रता का भूकंप आ गया। लेकिन अब सवाल उठ रहे हैं कि ईरान में लाखों घरों को हिलाने वाली यह घटना भूकंप थी या सीक्रेट न्यूक्लियर टेस्ट। कुछ लोगों का मानना है कि यह सही में भूकंप था? तो कई लोग दावे कर रहे हैं कि ईरान की न्यूक्लियर फैसिलिटीज के पास कुछ हलचल देखी गई है। बहरहाल अमेरिका की तरफ से आते हुए खतरे के बीच ईरान को रूस का साथ मिला है। उत्तरी हिंद महासागर में रूस और ईरान की स्पेशल फोर्सेस ने संयुक्त एयर सी ऑपरेशन को अंजाम दिया है। इस समुद्री अभ्यास में डाकुओं से जहाजों को मुक्त करवाने की एक्सरसाइज की गई है।
बहरहाल अब आते हैं भारत पर। ईरान पर हमला हुआ तो भारत भी बुरी तरह फंस सकता है। सबसे पहले तो एक चुनौती इंटरनल सिक्योरिटी को लेकर भी खड़ी हो सकती है। अगर अमेरिका ईरान पर हमला करता है तो भारत के शिया मुस्लिम सड़कों पर उतर आएंगे। पिछले कुछ हफ्तों से भारत के शिया मुस्लिम पहले से ही ईरान के लिए समर्थन में रैलियां निकाल रहे थे।
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