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A new fund is working to save 100 of the world's most threatened species. The Phoenix Species Project will put $200m (£149m) towards restoring animals in the wild and stopping them from going extinct. It's one of the largest funds ever focused on species recovery. The project is a collaboration between the Bezos Earth Fund and Re:wild - a non profit co-founded by actor Leonardo DiCaprio. It comes at a time when conservationists have warned about a decline in global biodiversity, and just a few weeks after the Trump administration rolled back endangered species protections. Thumbnail images courtesy of Fanamby and Todd W. Pierson. Subscribe to our channel here: https://bbc.in/bbcnews For the latest news download the BBC News app or visit BBC.com/news #BBCNews
अदालतें लज्जा भंग-हवस जैसे शब्दों का इस्तेमाल न करें:जज चरित्र-कपड़ों पर नहीं, सबूतों पर फैसला दें; दुष्कर्म से जुड़े मामलों की सुनवाई पर गाइडलाइन
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी (NJA) ने एक गाइडलाइन जारी की है। इसके मुताबिक जजों को रेप, सेक्शुअल हैरेसमेंट जैसे मामलों की सुनवाई और फैसले लिखते समय कुछ सावधानियां बरतने कहा गया है। एक्सपर्ट कमेटी के मुताबिक जजों को पीड़ित के चरित्र, कपड़ों, जीवनशैली, नैतिक धारणाओं के बजाय केवल सबूतों पर फैसला देने की सलाह दी गई है। साथ ही लज्जा भंग, प्रोसिक्यूट्रिक्स (अभियोजन पक्ष की शिकायतकर्ता), बेबस महिला, हवस, इज्जत, शर्म और पवित्रता जैसे शब्दों के इस्तेमाल से बचने को कहा गया है। NJA ने "ज्यूडीशियल सेंसिटिविटी हैंडबुक" तैयार की है। सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई 2026 में इसे मंजूरी दी और देश की सभी अदालतों को इसका पालन करने का निर्देश दिया। NJA की एक्सपर्ट कमेटी के हेड सुप्रीम कोर्ड के पूर्व जज एक्सपर्ट कमेटी की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अनिरुद्ध बोस ने की। NJA की रिपोर्ट में कहा गया है कि न्यायिक भाषा अभिव्यक्ति का जरिया ही नहीं, निष्पक्ष, गरिमापूर्ण और पक्षपात-रहित न्याय का आधार है। असंवेदनशील भाषा, लैंगिक रूढ़ियों और पीड़ित को दोषी ठहराने वाले कमेंट, सर्वाइवर्स को आघात पहुंचा सकते हैं। वे न्याय से दूर हो सकते हैं। इसलिए कोर्ट को सम्मानजनक, तटस्थ और सर्वाइवर-सेंट्रिक भाषा अपनानी चाहिए। यह रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के 10 फरवरी 2026 के आदेश के अनुपालन में तैयार की गई है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक विवादित फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 2023 की जेंडर स्टीरियोटाइप्स हैंडबुक की समीक्षा कर नई गाइडलाइन तैयार करने का निर्देश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था- ऐसी भाषा न बोलें, जो पीड़ित को डरा दे मामले पर 8 दिसंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुनवाई हो रही थी। तब CJI ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा था- “हम सभी हाईकोर्ट के लिए गाइडलाइंस जारी कर सकते हैं। ऐसी टिप्पणियां पीड़ित पर भयावह प्रभाव डालती हैं और कई बार शिकायत वापस लेने जैसा दबाव भी बनाती हैं। अदालतों को, विशेषकर हाईकोर्ट को, फैसले लिखते समय और सुनवाई के दौरान ऐसी टिप्पणियों से बचना चाहिए।” 14 जुलाई 2026 की सुनवाई के दौरान एडवोकेट गुप्ता ने सुप्रीम कोर्ट के सामने पटना हाईकोर्ट के फैसले का जिक्र किया। CJI सूर्यकांत ने इस पर हैरानी जताई थी। उन्होंने कहा था- जजों को संवेदनशील होना चाहिए और रिसर्च करनी चाहिए। जज कानूनी पड़ताल के बिना फैसले दिए जा रहे हैं। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 2023 की जेंडर स्टीरियोटाइप्स हैंडबुक की समीक्षा कर भारतीय सामाजिक संदर्भ के अनुरूप नई गाइडलाइन तैयार करने का निर्देश दिया था। पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़ की पहल पर बनी थी हैंडबुक 2023 में 8 मार्च को महिला दिवस पर एक इवेंट में CJI चंद्रचूड़ ने बताया था- मैंने ऐसे फैसले देखे हैं जिनमें किसी महिला के एक व्यक्ति के साथ रिश्ते में होने पर उसे रखैल लिखा गया। कई ऐसे केस थे जिनमें घरेलू हिंसा अधिनियम और IPC की धारा 498ए के तहत FIR रद्द करने के लिए आवेदन किए गए थे, उनके फैसलों में महिलाओं को चोर कहा गया है। इसके बाद CJI चंद्रचूड़ ने एक कानूनी शब्दावली बनवाने का फैसला किया। जो हैंडबुक 2023 में लॉन्च की गई उसे कलकत्ता हाईकोर्ट की जस्टिस मौसमी भट्टाचार्य की अध्यक्षता वाली समिति ने तैयार किया था। इसमें रिटायर्ड जस्टिस प्रभा श्रीदेवन, जस्टिस गीता मित्तल, प्रो.झूमा सेन शामिल थीं। 16 अगस्त 2023 को हैंडबुक जारी करते हुए CJI चंद्रचूड़ ने कहा था- इससे जजों और वकीलों को ये समझने में आसानी होगी कि कौन से शब्द रूढ़िवादी हैं और उनसे कैसे बचा जा सकता है।पढ़ें पूरी खबर…
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