मेंटल हेल्थ– मुझे पोर्न देखने की लत है:बिना देखे सो नहीं पाता, मेरे रिलेशनशिप खराब हो रहे हैं, इस लत से छुटकारा कैसे पाऊं?
सवाल– मेरी उम्र 32 साल है। मैं एक आईटी प्रोफेशनल हूं। मेरी प्रॉब्लम बहुत पर्सनल है। मुझे पोर्न की लत है। इसके बिना मैं रात में सो नहीं पाता। शुरू में तो ये कोई प्रॉब्लम नहीं लगती थी, लेकिन अब लगता है कि इस आदत का असर मेरी रिलेशनशिप्स पर पड़ रहा है। मैं जिस भी लड़की को डेट करता हूं, वो मुझे छोड़कर चली जाती है। उसका कहना है कि मैं रिश्ते में प्रेजेंट नहीं हूं। मैं भी ये बात जानता हूं कि मुझे किसी लड़की की कंपनी से ज्यादा अपनी कंपनी अच्छी लगती है। सच तो ये है कि सेक्शुअल प्लेजर के लिए भी मैं गर्लफ्रेंड की जरूरत बहुत ज्यादा नहीं महसूस करता। मेरे एक करीबी दोस्त का कहना है कि ये नॉर्मल नहीं है और मुझे थेरेपिस्ट के पास जाना चाहिए। आप प्लीज मुझे गाइड करिए कि मैं क्या करूं? एक्सपर्ट– डॉ. द्रोण शर्मा, कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट, आयरलैंड, यूके। यूके, आयरिश और जिब्राल्टर मेडिकल काउंसिल के मेंबर। सवाल पूछने के लिए आपका शुक्रिया। इस डिजिटल युग में पोर्नोग्राफी बहुत आसानी से उपलब्ध है। बहुत व्यापक रूप से इसका इस्तेमाल भी होता है। इसलिए बहुत से इंडीविजुअल और कपल इसे लेकर थोड़ा चिंतित होते हैं कि कहीं ये मेंटल हेल्थ, इंटिमेसी और रिलेशनशिप पर नेगेटिव असर न डाले। पोर्न अपने आप में समस्या नहीं है ‘पोर्न एडिक्शन’ या ‘पोर्न की लत’ जैसे शब्दों का अक्सर प्रयोग किया जाता है। लेकिन एडिक्शन शब्द का इस्तेमाल कई बार एक ज्यादा कॉम्प्लेक्स रियलिटी को सरलीकृत कर सकता है। अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन की एक रिसर्च इस पर रोशनी डालती है, जिसके मुताबिक पोर्न देखना कुछ लोगों के लिए समस्या बन सकता है, लेकिन यह शायद ही कभी अपने आप में मूल समस्या या मुख्य समस्या होती है। इसके पीछे हमेशा कोई छिपा हुआ इमोशनल, रिलेशनल कारण या कोई इंटरनल कॉन्फ्लिक्ट होता है। पोर्न कब हो सकता है प्रॉब्लमैटिक इंटरनेशनल स्टडीज बताती हैं कि पूरी दुनिया में बहुत बड़ी संख्या में पुरुष और महिलाएं पोर्न देखते हैं, लेकिन इससे उन्हें कोई नुकसान नहीं होता। समस्या तब पैदा होती है, जब पोर्न की लत लग जाए, जब यह एक कंपल्सिव और सीक्रेटिव बिहेवियर हो जाए और जब वास्तविक जिंदगी के रिश्तों पर इसका नेगेटिव असर पड़ने लगे। साथ ही यह सेक्शुअल खुशी, संतोष और इमोशनल हेल्थ को नकारात्मक ढंग से प्रभावित करने लगे। इसके अलावा इन संकेतों से पता चलता है कि पोर्न देखने की आदत समस्या बन रही है। डिटेल नीचे ग्राफिक में देखें– पोर्न का ब्रेन पर प्रभाव हमारे ब्रेन में रिवॉर्ड सिस्टम इनबिल्ट होते हैं, जो हैप्पी हॉर्मोन्स रिलीज करते हैं। जब कोई बहुत ज्यादा समय तक और बहुत ज्यादा मात्रा में पोर्न देखता है तो इससे ब्रेन का रिवॉर्ड सिस्टम प्रभावित होता है। इसका नतीजा ये होता है कि वास्तविक जीवन में इंटिमेसी से मिलने वाली खुशी और संतुष्टि कम हो जाती है। साथ ही सेक्स को लेकर अवास्तविक किस्म की अपेक्षाएं पैदा होती हैं। इसलिए आगे बढ़ने से पहले मैं यही कहना चाहूंगा कि शर्मिंदगी या अपराध-बोध महसूस करने की बजाय आप समस्या को समझने और उसकी तह तक जाने की कोशिश करिए। कुछ सेल्फ असेसमेंट टूल्स और सेल्फ हेल्प टूल्स के जरिए मैं आपकी मदद करने की कोशिश करूंगा। क्या आपको पोर्न एडिक्शन है? करें सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट यहां मैं आपको एक सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट दे रहा हूं। नीचे ग्राफिक्स में कुल 7 सवाल हैं। आप इन सवालों को ध्यान से पढ़ें और हां या ना में इसका जवाब देें। अंत में अपने जवाब की एनालिसिस करें। स्कोर का इंटरप्रिटेशन भी ग्राफिक में दिया हुआ है। जैसेेकि अगर दो या उससे कम सवालों का आपका जवाब ‘हां’ है तो इसका मतलब है कि आपको पोर्न का एडिक्शन नहीं है। अगर तीन या चार सवालों का जवाब ‘हां’ है तो भी यह एडिक्शन नहीं है, सिर्फ पोर्न देखने को आप कंट्रोल नहीं कर पा रहे हैं। लेकिन अगर पांच से ज्यादा सवालों का आपका जवाब ‘हां’ है तो यह पोर्न एडिक्शन है। ऐसे में प्रोफेशनल हेल्प की सलाह दी जाती है। आप पोर्न क्यों देखते हैं? करें सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट एडिक्शन से जुड़े सेल्फ असेसमेंट के बाद आपको एक और असेसमेंट करने की जरूरत है। अपने पोर्न देखने के वास्तविक कारणों को आइडेंटिफाई करना। ये बहुत साधारण सा असेसमेंट टेस्ट है। नीचे ग्राफिक में कुल 12 सवाल हैं, जिनमें 12 कारण बताए गए हैं। इन सवालों को आपको 0 से 3 के स्केल पर रेट करना है। अगर आपका जवाब 0 है तो इसका मतलब है कि वो कारण नहीं है। अगर जवाब 3 है तो वह एक बड़ा कारण है। इन सवालों से आपको यह समझने में मदद मिलेगी कि आपके पोर्न देखने की मुख्य वजहें क्या हैं। पोर्न और रिश्ते: असली नुकसान क्या है? रिसर्च से पता चलता है कि पोर्नोग्राफी अपने आप में हानिकारक नहीं है। बहुत से कपल साथ में पोर्न देखते हैं, लेकिन इससे उनके रिश्ते को कोई नुकसान नहीं होता है। समस्या तब पैदा होती है, जब- इन कारणों से पोर्न का रिलेशनशिप पर नेगेटिव असर पड़ सकता है। डिटेल नीचे ग्राफिक में देखें– लोग पोर्न क्यों देखते हैं? पोर्न देखने के पीछे अकेलेपन से लेकर, स्ट्रेस और बोरडम तक कई कारण हो सकते हैं। पोर्न इन सारी समस्याओं से डील करने का एक कोपिंग मैकेनिज्म हो सकता है। यह अपने आप में कोई समस्या नहीं है। ये समस्या तब बन जाती है, जब पोर्न ही एकमात्र कोपिंग मैकेनिज्म बन जाए। इसके अलावा अपने मानसिक और भावनात्मक परेशानियों को एड्रेस करने का कोई और टूल हमारे पास न हो। पोर्न एडिक्शन का इलाज क्या है? इस समस्या की अंडरस्टैंडिंग और इसके ट्रीटमेंट के ये चरण होते हैं- 1. समस्या का असेसमेंट 2. साइकोएजूकेशन यह समझना कि- 3. कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी (CBT) CBT इन चीजों में मददगार होती है- 4. इरॉटिक कॉन्फ्लिक्ट से डील करना 5. बिहेवियरल रेगुलेशन (दबाना नहीं, रेगुलेट करना) चार हफ्तों का सेल्फ रेगुलेशन प्लान लक्ष्य: डर, शर्मिंदगी को दूर करना, ज्यादा सोचे-समझे फैसले लेना, आदत को रेगुलेट करना नोट: ये आदत छुड़ाने या पोर्न देखना बंद करवाने का प्लान नहीं है। यह सिर्फ उसे रेगुलेट करने का प्लान है। सप्ताह 1 अवेयरनेस और स्टेबलाइजेशन फोकस: सिर्फ देखना, बदलने की कोशिश न करना। डेली टास्क: नियम: “मैं खुद को जज नहीं कर रहा। मैं सिर्फ देख-समझ रहा हूं।” सप्ताह 2 बिहेवियरल लूप को तोड़ना लक्ष्य: इच्छा को दबाना नहीं, सिर्फ थोड़ा टालना। टूल्स: खुद से ये सवाल पूछना: "मैं इस वक्त सचमुच क्या करना चाहता हूं?" सप्ताह 3 असली कारणों को एड्रेस करना लक्ष्य: जरूरतों को न कि व्यवहार को। इन चीजों पर काम करना: सप्ताह 4 इंटीग्रेशन और फ्यूचर प्लानिंग लक्ष्य: ऐसा संतुलन बनाना, जो लंबे समय तक बना रहे। टास्क: प्रोफेशनल हेल्प कब जरूरी? अगर आपको निम्नलिखित समस्याएं हों तो मदद लें: अंतिम बात पोर्नोग्राफी शायद ही कभी असली समस्या होती है। यह अक्सर अधूरी जरूरतों, अनसुलझे कॉन्फ्लिक्ट्स, शर्म या चुप्पी का रिफ्लेक्शन होती है। मैंने आपको ऊपर जो सुझाव दिए हैं, उसका मकसद आपको 'शुद्ध' या 'पोर्न-फ्री' बनाना नहीं है। मकसद सिर्फ इतना है कि आप अपने प्रति ज्यादा ईमानदार हो सकें, आपके फैसले ज्यादा संयमित और संतुलित हों। पोर्न एडिक्शन के पीछे छिपे असली कारणों को एड्रेस करने पर अमूमन पोर्नोग्राफी देखने की इच्छा स्वाभाविक रूप से खत्म हो जाती है। ……………… ये खबर भी पढ़िए मेंटल हेल्थ– मुझे मोबाइल की लत है: 5 मिनट भी फोकस नहीं कर पाती, कहीं ये ADHD तो नहीं, क्या दवा से मदद मिलेगी? आपका अनुभव दरअसल DADS (डिजिटल इरा अटेंशन डेफिसिट सिंड्रोम) से मेल खाता है। यह समस्या फोकस की कमी और नींद न आने से जुड़ी हुई है। इसका संबंध बहुत ज्यादा डिजिटल कंजम्पशन से है। लगातार स्क्रीन देखते रहने और ऑनलाइन कंटेंट कंज्यूम करने के कारण नर्वस सिस्टम हमेशा उत्तेजित रहता है, जिसके कारण यह समस्या पैदा होती है। आगे पढ़िए…
जरूरत की खबर- घरेलू कामों से घटती बीमारियों का रिस्क:झाडू–पोंछा भी फायदेमंद, डेली लाइफ में फिजिकल एक्टिविटी बढ़ाने के 14 टिप्स
बचपन में जब मां या दादी कहती थीं “घर के काम किया करो, सेहत अपने-आप ठीक रहेगी,” तो वह बात उस समय सिर्फ नसीहत लगती थी। समय बदला तो फिटनेस की परिभाषा भी बदल गई। अब जिम और हार्ड वर्कआउट को ही फिटनेस का असली पैमाना मान लिया गया है। इस बदलाव में घर के रोजमर्रा के कामों की अहमियत पीछे छूट गई। लेकिन क्या आपको पता है कि घर के काम भी दरअसल एक तरह की एक्सरसाइज ही हैं। इतना ही नहीं, कुछ मेटाबॉलिक बीमारियों की स्थिति में घर के काम मौत का जोखिम 14 से 20% तक कम कर सकते हैं। है न मजे की बात। जर्नल ऑफ अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन में पब्लिश हालिया स्टडी के मुताबिक, लाइट फिजिकल एक्टिविटी जैसे घर के काम, दिनभर थोड़ा-बहुत मूवमेंट करते रहने से मौत का जोखिम कम हो सकता है। स्टडी में शामिल जो लोग कार्डियोवस्कुलर-किडनी-मेटाबॉलिक (CKM) सिंड्रोम की एडवांस स्टेज से पीड़ित थे, उनमें इसका असर ज्यादा देखा गया। इसलिए आज जरूरत की खबर में जानेंगे कि घरेलू काम करना कितना फायदेमंद है। साथ ही जानेंगे कि- एक्सपर्ट- डॉ. रोहित शर्मा, कंसल्टेंट, इंटरनल मेडिसिन, अपोलो स्पेक्ट्रा हॉस्पिटल, जयपुर सवाल- क्या घर के कामों को लाइट फिजिकल एक्टिविटी माना जा सकता है? इसमें कौन-कौन सी एक्टिविटीज शामिल होती हैं? जवाब- हां, ये सब लाइट फिजिकल एक्टिविटीज ही हैं क्योंकि इनमें बॉडी मूवमेंट की जरूरत होती है। घरेलू काम करते रहने से हार्ट रेट नॉर्मल रहती है। अगर रेगुलर ये काम करते हैं तो कैलोरी बर्न होती है। लाइट फिजिकल एक्टिविटी जॉइंट मूवमेंट और मसल एक्टिवेशन में भी मदद करती है। ग्राफिक से समझते हैं कि इसमें कौन-कौन सी एक्टिविटीज शामिल होती हैं- सवाल- लाइट फिजिकल एक्टिविटी और मेटाबॉलिक सिंड्रोम के बीच संबंध को लेकर नई रिसर्च क्या कहती है? जवाब- हाल ही में जर्नल ऑफ अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन में एक स्टडी पब्लिश हुई। इसमें पता चला कि जिन लोगों को कार्डियोवस्कुलर-किडनी-मेटाबॉलिक (CKM) सिंड्रोम है, अगर वे घर पर सिर्फ हल्की-फुल्की स्ट्रेचिंग करें या सिर्फ चलें-फिरें, घर के रेगुलर काम करें तो उनमें मौत का जोखिम 14 से 20% तक कम हो जाता है। कुल-मिलाकर रिसर्च में साफ हुआ है कि स्वस्थ रहने के लिए रोज जिम जाकर हैवी वर्कआउट करना जरूरी नहीं है। इसके लिए घर की क्लीनिंग और डस्टिंग करना भी काफी है। यह सब करते हुए भी हमारी एक्सरसाइज हो जाती है। सवाल- लाइट फिजिकल एक्टिविटी दिल और मेटाबॉलिक हेल्थ को बेहतर बनाने में कैसे मदद करती है? जवाब- हल्की लेकिन नियमित फिजिकल एक्टिविटी शरीर को कई स्तरों पर फायदा पहुंचाती है। इसे पॉइंटर्स से समझते हैं- सवाल- मेटाबॉलिक सिंड्रोम से जूझ रहे लोगों के लिए लाइट फिजिकल एक्टिविटी क्यों खास तौर पर फायदेमंद मानी जाती है? लाइट फिजिकल एक्टिविटी मेटाबॉलिज्म को धीरे-धीरे एक्टिव करती है। इससे बॉडी पर ज्यादा दबाव नहीं पड़ता है। इससे ग्लूकोज बर्न होता है और ब्लड शुगर कंट्रोल करने में मदद मिलती है। सवाल- मेटाबॉलिक सिंड्रोम के अलावा लाइट फिजिकल एक्टिविटी और किन बीमारियों के जोखिम को कम कर सकती है? जवाब- लाइट फिजिकल एक्टिविटी कई गंभीर बीमारियों के जोखिम को भी कम करने में मदद करती है। ग्राफिक से समझते हैं- सवाल- क्या लाइट फिजिकल एक्टिविटी जिम या हार्ड एक्सरसाइज जितनी असरदार होती है? जवाब- लाइट फिजिकल एक्टिविटी जिम या हार्ड एक्सरसाइज की जगह नहीं ले सकती, लेकिन सेहत के लिहाज से इसे कम असरदार भी नहीं माना जा सकता है। लंबे समय तक बैठने से मेटाबॉलिज्म सुस्त हो जाता है। फिजिकल एक्टिविटी उसे एक्टिव रखने में मदद करती है। जिम या हैवी वर्कआउट से फिटनेस और मसल स्ट्रेंथ बढ़ती है, लेकिन लाइट फिजिकल एक्टिविटी रोजाना मूवमेंट बनाए रखकर हार्ट और मेटाबॉलिक हेल्थ को सपोर्ट करती है। इसलिए दोनों की भूमिका अलग है। सवाल- लंबे समय तक बैठकर काम करने वालों के लिए बीच-बीच में हल्का मूवमेंट क्यों जरूरी माना जाता है? जवाब- लगातार बैठे रहने से मांसपेशियों की एक्टिविटी कम हो जाती है। ब्लड सर्कुलेशन धीमा पड़ता है और शरीर का मेटाबॉलिज्म सुस्त होने लगता है। उठकर थोड़ा चलना, स्ट्रेच करना या पोजिशन बदलना मसल्स को दोबारा एक्टिव करता है, जिससे ग्लूकोज का इस्तेमाल बेहतर होता है और ब्लड फ्लो सुधरता है। साथ ही यह पीठ, गर्दन और जोड़ों पर पड़ने वाले दबाव को कम करता है। सवाल- रोजमर्रा की जिंदगी में लाइट फिजिकल एक्टिविटी को कैसे बढ़ा सकते हैं? जवाब- फिजिकल एक्टिविटी बढ़ाने के लिए जिम या हार्ड एक्सरसाइज ही जरूरी नहीं होती। रोजमर्रा की छोटी-छोटी आदतों में थोड़ा बदलाव करके भी शरीर को एक्टिव रखा जा सकता है। ग्राफिक से समझते हैं- दिनभर के छोटे-छोटे मूवमेंट को नजरअंदाज न करें। थोड़ी देर चलना या उठकर खड़े होना भी मायने रखता है। आखिरकार, सेहत सिर्फ एक घंटे की एक्सरसाइज से नहीं, बल्कि पूरे दिन की एक्टिव लाइफस्टाइल से बनती है। …………………………. जरूरत की ये खबर भी पढ़ें… जरूरत की खबर- कुर्सी पर बैठे-बैठे करें ये एक्सरसाइज:एक जगह बैठे रहना 10 सिगरेट पीने के बराबर खतरनाक, बॉडी मूवमेंट है जरूरी मेहनत करना किसे पसंद है। एक जगह पसरकर बैठे रहो। आराम से काम करना आमतौर पर हर किसी को पसंद आता है। खासकर जब आराम से कुर्सी पर बैठकर AC की हवा ले रहे हों। सही मायने में यही ‘व्हाइट कॉलर’ जॉब है क्योंकि इसमें फिजिकल वर्क की जगह AC में कम्प्यूटर या लैपटॉप पर काम करते हैं। पूरी खबर पढ़ें…
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