उच्च शिक्षा का दशक और गुणवत्ता की परीक्षा
समावेशी विकास के हिमायती अर्थशास्त्री मानव पूंजी सिद्धांत के तहत शिक्षा को महज सामाजिक कल्याण या व्यक्तिगत उन्नति का माध्यम नहीं, बल्कि उत्पादकता, नवाचार और दीर्घकालिक आर्थिक विकास की बुनियादी पूंजी के रूप में देखते हैं। इस लिहाज से कह सकते हैं कि किसी देश की युवा आबादी अपने आप में विकास की गारंटी नहीं होती। उसकी वास्तविक आर्थिक और सामाजिक क्षमता इस बात से निर्धारित होती है कि उसे उपलब्ध शिक्षा ज्ञान, कौशल और निर्णय क्षमता में कितना रूपांतरित कर पाती है। भारत आज इसी द्वंद्व के बीच खड़ा है। एक ओर विशाल युवा आबादी जनसांख्यिकीय लाभांश की संभावना प्रस्तुत करती है, दूसरी ओर कृत्रिम बुद्धिमत्ता, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और वैश्विक श्रम बाजार में आते बदलाव मानव पूंजी निर्माण की पारंपरिक धारणाओं को चुनौती दे रहे हैं।
ह्यूमनिटीज एंड सोशल साइंसेज कम्युनिकेशंस में 2025 में प्रकाशित एक अध्ययन ने भी रेखांकित किया कि भारत में जनसांख्यिकीय बदलाव का आर्थिक लाभ अनुकूल नीतिगत वातावरण, बेहतर स्वास्थ्य, सम्मानजनक रोजगार और लैंगिक सशक्तीकरण पर निर्भर करता है। इसलिए पिछले एक दशक में उच्च शिक्षा के विस्तार और सुधारों का मूल्यांकन केवल संस्थानों तथा नामांकन की बढ़ती संख्या से नहीं, बल्कि इस कसौटी पर किया जाना चाहिए कि भारत अपनी युवा आबादी को ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था की सक्षम मानवीय शक्ति में कितना बदल पाया है।
इसे भी पढ़ें: Gen Z Revolt: मोदी के दोस्त के देश में भी वही हो रहा,जो भारत में हुआ था? भयंकर साज़िश का पर्दाफ़ाश!
इस दशक में भारतीय उच्च शिक्षा का सामाजिक आधार उल्लेखनीय रूप से विस्तृत हुआ है। अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण के अनुसार, कुल नामांकन 2014 से 15 के लगभग 3.42 करोड़ से बढ़कर 2023 से 24 में करीब 4.50 करोड़ हो गया। महिलाओं के साथ अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के विद्यार्थियों की भागीदारी भी बढ़ी है, जो उच्च शिक्षा के व्यापक सामाजिक विस्तार का संकेत है। हालांकि, नामांकन वृद्धि अपने आप में पर्याप्त नहीं है। वास्तविक लोकतंत्रीकरण के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षण, पर्याप्त संसाधन और रोजगारपरक अवसरों तक समान पहुंच जरूरी है। महानगरों और छोटे शहरों के संस्थानों के बीच गुणवत्ता का अंतर अब प्रमुख चुनौती है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने उच्च शिक्षा सुधार के लिए व्यापक वैचारिक ढांचा प्रस्तुत किया। बहुविषयक अध्ययन, लचीली पाठ्यचर्या, शोध उन्मुख शिक्षा, कौशल विकास और अकादमिक क्रेडिट की हस्तांतरणीयता इसके प्रमुख प्रावधान हैं। अकादमिक बैंक ऑफ क्रेडिट विद्यार्थियों को शैक्षणिक यात्रा में अधिक लचीलापन देता है, जबकि समर्थ जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म प्रवेश, परीक्षा और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को व्यवस्थित करने की क्षमता रखते हैं। इन पहलों का महत्व संस्थागत विस्तार से आगे बढ़कर सीखने की गुणवत्ता, शैक्षणिक गतिशीलता और प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने में है।
फिर भी नीतिगत महत्वाकांक्षा और संस्थागत वास्तविकता के बीच की दूरी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बहुविषयक शिक्षा के लिए विभिन्न विषयों के सक्षम विभाग, प्रशिक्षित शिक्षक और पर्याप्त अकादमिक संसाधन चाहिए। शोध आधारित शिक्षा के लिए प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय, शोध अनुदान और मार्गदर्शन की व्यवस्था आवश्यक है। डिजिटल प्लेटफॉर्म प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सरल बना सकते हैं, लेकिन वे कमजोर शिक्षण व्यवस्था की भरपाई नहीं कर सकते। इसलिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति का वास्तविक मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि उसके प्रावधानों ने कक्षाओं में शिक्षण, विद्यार्थियों के सीखने के स्तर और विश्वविद्यालयों की अकादमिक संस्कृति में कितना बदलाव पैदा किया है।
उच्च शिक्षा सुधार की केंद्रीय कसौटी शिक्षक व्यवस्था और शोध क्षमता है। शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पूरा करने वाले कर्मचारी नहीं, बल्कि ज्ञान सृजन, आलोचनात्मक विवेक और बौद्धिक स्वतंत्रता के वाहक हैं। अनेक संस्थानों में रिक्त पदों, संविदा नियुक्तियों और गैर शैक्षणिक दायित्वों का दबाव शिक्षण, शोध निर्देशन और विद्यार्थियों से संवाद को प्रभावित करता है। इसलिए पारदर्शी नियुक्ति, अकादमिक स्वतंत्रता और निरंतर प्रशिक्षण को दीर्घकालिक निवेश के रूप में देखना आवश्यक है।
गौरतलब है कि विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता शोध और नवाचार में उनके योगदान से भी निर्धारित होती है। भारत ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन व्यापक विश्वविद्यालय व्यवस्था में शोध संस्कृति को और मजबूत करने की आवश्यकता है। कृषि, जलवायु परिवर्तन, सार्वजनिक स्वास्थ्य, शहरीकरण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे क्षेत्र भारतीय संदर्भ में महत्वपूर्ण शोध अवसर प्रस्तुत करते हैं। इसके लिए शोध वित्तपोषण बढ़ाने, उद्योग और अकादमिक संस्थानों के सहयोग तथा युवा शोधकर्ताओं को स्वतंत्र अवसर देने की जरूरत है। विश्वविद्यालयों को ज्ञान के उपभोक्ता नहीं, बल्कि उसके उत्पादक केंद्र बनाना होगा।
इसी तरह रोजगार और उच्च शिक्षा के संबंध को भी अधिक सूक्ष्मता से समझने की जरूरत है। डिग्री और रोजगार के बीच बढ़ती दूरी पाठ्यक्रमों की प्रासंगिकता, व्यावहारिक प्रशिक्षण और उद्योग की बदलती मांगों पर प्रश्न उठाती है। तकनीकी दक्षता, डिजिटल साक्षरता, संचार क्षमता और समस्या समाधान जैसे कौशल अब अनेक क्षेत्रों में आवश्यक हो गए हैं। फिर भी, रोजगारोन्मुखी शिक्षा का अर्थ विश्वविद्यालयों को उद्योग की तात्कालिक जरूरतों के अधीन कर देना नहीं है। मानविकी और सामाजिक विज्ञान विषय विद्यार्थियों में ऐतिहासिक चेतना, नैतिक विवेक, लोकतांत्रिक समझ और समाज के जटिल प्रश्नों का विश्लेषण करने की क्षमता विकसित करते हैं। एक सक्षम उच्च शिक्षा व्यवस्था को आर्थिक उपयोगिता और बौद्धिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन कायम करना होगा। उसका उद्देश्य केवल रोजगार पाने योग्य व्यक्ति तैयार करना नहीं, बल्कि ज्ञानवान, विवेकशील और उत्तरदायी नागरिक बनाना भी है।
हाल में बिहार में 211 नए सरकारी डिग्री कॉलेजों की शुरुआत, 2,451 संविदा सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति तथा विश्वविद्यालयों में प्रशासनिक और डिजिटल सुधारों की पहल इसी राष्ट्रीय चुनौती का एक प्रासंगिक उदाहरण है। इन प्रयासों से उच्च शिक्षा की भौगोलिक पहुंच और संस्थागत क्षमता बढ़ाने की संभावना बनती है। लेकिन इनकी दीर्घकालिक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि कॉलेजों में नियमित शिक्षण, पर्याप्त संसाधन, अकादमिक नेतृत्व और गुणवत्तापूर्ण अध्ययन का वातावरण कितना विकसित होता है। बिहार का अनुभव इस व्यापक तथ्य को रेखांकित करता है कि संस्थानों की संख्या बढ़ाना सुधार का प्रारंभिक चरण है, उसकी परिणति गुणवत्तापूर्ण शिक्षा में ही हो सकती है।
ये पूरा दशक भारतीय उच्च शिक्षा में विस्तार और संस्थागत परिवर्तन का दौर रहा है, लेकिन अगली चुनौती कहीं अधिक जटिल है। बढ़ता नामांकन, महिलाओं और वंचित समूहों की भागीदारी तथा डिजिटल प्रशासन सकारात्मक आधार तैयार करते हैं, पर गुणवत्ता, शिक्षक उपलब्धता, शोध क्षमता और रोजगारपरकता की चुनौतियां अभी बनी हुई हैं। इसलिए उच्च शिक्षा नीति का केंद्र अब मात्र विस्तार नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण और समान अवसरों का निर्माण होना चाहिए। भारत की युवा आबादी तभी वास्तविक जनसांख्यिकीय लाभांश में बदल सकती है, जब शिक्षा उसे ज्ञान, कौशल और नवाचार की क्षमता प्रदान करे। आने वाले दशक की अग्निपरीक्षा इसी रूपांतरण में निहित है।
- संजीव कुमार मिश्र
Saraswati Puja 2026: 17 अक्टूबर को है सरस्वती पूजा, किताबों से लेकर संगीत के सामान तक की होगी पूजा
शारदीय नवरात्रि के दौरान मां सरस्वती की पूजा का भी खास महत्व है। इस दौरान किताबें, पढ़ाई का सामान और संगीत से जुड़ी चीजें मां सरस्वती के सामने रखकर उनकी पूजा की जाती है। मान्यता है कि मां सरस्वती ज्ञान, पढ़ाई, बुद्धि, संगीत और कला की देवी हैं।
शारदीय नवरात्रि में सरस्वती पूजा कब है?
साल 2026 में शारदीय नवरात्रि के दौरान मुख्य सरस्वती पूजा 17 अक्टूबर, शनिवार को होगी। इससे एक दिन पहले 16 अक्टूबर को सरस्वती आवाहन किया जाएगा।
सरस्वती पूजा 2026 की पूरी तारीखें
सरस्वती आवाहन: शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026
मुख्य सरस्वती पूजा: शनिवार, 17 अक्टूबर 2026
सरस्वती बलिदान: रविवार, 18 अक्टूबर 2026
सरस्वती विसर्जन/नवमी: सोमवार, 19 अक्टूबर 2026
विद्यारंभम दिवस: बुधवार, 21 अक्टूबर 2026
इसे भी पढ़ें: Saraswati Avahan पर मां सरस्वती की विशेष आराधना से दूर होगा अज्ञान, छात्र करें पूजन
शारदीय नवरात्रि में सरस्वती पूजा क्यों की जाती है?
मां सरस्वती को ज्ञान, पढ़ाई, बुद्धि, संगीत और कला की देवी माना जाता है। इसलिए विद्यार्थी, कलाकार और संगीत सीखने वाले लोग उनका आशीर्वाद लेते हैं। इस पूजा का मकसद सिर्फ धार्मिक पूजा करना नहीं, बल्कि ज्ञान और सीखने को सम्मान देना भी है। यही वजह है कि पूजा के दौरान किताबों और पढ़ाई से जुड़ी चीजों को भी मां सरस्वती के सामने रखा जाता है।
कई जगहों पर संगीत से जुड़ी चीजें और काम में इस्तेमाल होने वाला सामान भी पूजा में रखा जाता है। इस तरह लोग अपने सीखने और हुनर से जुड़ी चीजों के प्रति सम्मान जताते हैं।
सरस्वती पूजा कैसे की जाती है?
सरस्वती पूजा की विधि अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में थोड़ी अलग हो सकती है। सामान्य तौर पर पूजा इस तरह की जाती है, सबसे पहले पूजा की जगह को साफ किया जाता है। मां सरस्वती की तस्वीर या मूर्ति स्थापित की जाती है। किताबें, पढ़ाई का सामान और संगीत से जुड़ी चीजें उनके सामने रखी जाती हैं। फूल, धूप और दीपक जैसी पूजा सामग्री चढ़ाई जाती है। मां सरस्वती की प्रार्थना या मंत्र पढ़े जाते हैं। आखिर में आरती की जाती है। पूजा को बहुत भव्य तरीके से करना जरूरी नहीं है। परिवार अपनी परंपरा के अनुसार इसे सरल तरीके से भी कर सकते हैं।
इसे भी पढ़ें: एक ही दिन में है Maha Ashtami और महानवमी , जानिए सही तिथि और कन्या पूजन का समय
किताबों की पूजा क्यों होती है?
सरस्वती पूजा में किताबों को मां सरस्वती के सामने रखने की परंपरा सबसे खास मानी जाती है। किताबें ज्ञान हासिल करने का जरिया हैं, इसलिए इन्हें सम्मान दिया जाता है। इसी तरह संगीत सीखने वाले लोग अपने संगीत के सामान को पूजा में रखते हैं। कलाकार अपने काम से जुड़ी चीजों को भी मां सरस्वती के सामने रख सकते हैं। कह सकते हैं कि यह पूजा हमें याद दिलाती है कि सीखना और अपने हुनर को बेहतर बनाना भी सम्मान के योग्य है।
किसके लिए खास है सरस्वती पूजा?
सरस्वती पूजा खासतौर पर विद्यार्थियों, शिक्षकों, कलाकारों, संगीत सीखने वालों और किसी भी तरह का हुनर सीखने वाले लोगों के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। छात्र पढ़ाई और परीक्षा में सफलता के लिए मां सरस्वती का आशीर्वाद लेते हैं। वहीं कलाकार और संगीत सीखने वाले अपने हुनर को बेहतर बनाने की कामना करते हैं।
शारदीय नवरात्रि के दौरान होने वाली यह सरस्वती पूजा वसंत पंचमी की सरस्वती पूजा से अलग परंपरा है। दोनों में मां सरस्वती की पूजा की जाती है, लेकिन दोनों अलग समय और क्षेत्रीय परंपराओं से जुड़ी हैं।
होम
जॉब
पॉलिटिक्स
बिजनेस
ऑटोमोबाइल
गैजेट
लाइफस्टाइल
फोटो गैलरी
Others 
prabhasakshi




