Tiger Shroff पर Firing करने वाले 3 शूटर Kota Police ने दबोचे, पूछताछ में खुलासा, Nepal भाग रहे थे
अभिनेता टाइगर श्रॉफ की गाड़ी पर फायरिंग करने के मामले में पुलिस को एक बड़ी कामयाबी मिली है. वारदात को अंजाम दने वाले आरोपियों को राजस्थान के कोटा में गिरफ्तार किया गया है. कोटा के रेलवे कॉलोनी थाना क्षेत्र में AGTF राजस्थान और कोटा शहर की पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार किया. आरोपी दिल्ली पहुंचने के बाद हरियाणा में छिपने की फिराक में थे लेकिन इससे पहले ही पुलिस ने उन्हें दबोच लिया.गिरफ्तार आरोपियों में से एक नाबालिग है. दूसरे आरोपी का नाम रितिक कुमार उर्फ रोशन है, जो बिहार के बेगूसराय का रहने वाला है. वहीं, तीसरा आरोपी भी सोनीपत का निवासी है, जिसकी पहचान रेहान के रूप में हुई है. आरोपियों को कोटा से गिरफ्तार किया गया है. मुंबई से कोटा की दूरी लगभग 927 किलोमीटर है. सड़क मार्ग से यह सफर तय करने में लगभग 15 घंटे 22 मिनट लगते हैं. पुलिस को सूचना मिली थी कि आरोपी पुणे-जयपुर सुपरफास्ट एक्सप्रेस में सफर कर रहे हैं. इसके बाद पुलिस ने एंटी गैंगस्टर टास्क फोर्सके समन्वय से पूरी योजना बनाकर इन्हें गिरफ्तार किया गया. कोटा में ट्रेन से आरोपियों को पकड़ा गया है Tiger Shroff पर Firing करने वाले 3 शूटर Kota Police ने दबोचे, पूछताछ में खुलासा, Nepal भाग रहे थे #TigerShroff #KotaPolice #MumbaiPolice #rajasthan #FiringIncident #BreakingNews #BollywoodNews #CrimeNews #LatestNews #bishnoi #LawrenceBishnoi ------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------ Disclaimer: Republic Media Network may provide content through third-party websites, operating systems, platforms, and portals (‘Third-Party Platforms’). Republic does not control and has no liability for Third-Party Platforms, including content hosted, advertisements, security, functionality, operation, or availability. ------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------ रिपब्लिक भारत देश का नंबर वन न्यूज चैनल है। देश और दुनिया की जनहित से जुड़ी ब्रेकिंग न्यूज़, राजनीति, खेल और मनोरंजन की खबरों का खजाना है । इस खजाने तक पहुंचने के लिए रिपब्लिक भारत से जुड़े रहिए और सब्सक्राइब करिए। ► http://bit.ly/RBharat R. Bharat TV - India's no.1 Hindi news channel keeps you updated with non-stop LIVE and breaking news. Watch the latest reports on political news, sports news, entertainment, and much more. आप Republic Bharat से जुड़ें और अपडेट्स पाएं! ???? Facebook: https://www.facebook.com/RepublicBharatHindi/ ???? Twitter: https://twitter.com/Republic_Bharat ???? Instagram: https://www.instagram.com/republicbharat/ ???? WhatsApp: https://whatsapp.com/channel/0029Va7GPTi7dmecQ2LFH01I ???? Telegram: https://t.me/RepublicBharatHindi ???? LinkedIn: https://www.linkedin.com/company/republic-bharat/
अनिमेष बोले- फास्टेस्ट मैन बनने वाले दिन तबीयत खराब थी:एशियन गेम्स में ब्रॉन्ज जीता, दोस्तों के कहने पर एथलेटिक्स में आए थे
छत्तीसगढ़ के अनिमेष कुजूर इस साल विदेश में भारत के सबसे तेज रनर बने हैं। खास बात यह है कि जिस दिन उन्होंने यह रिकॉर्ड बनाया, उस दिन उनकी तबीयत ठीक नहीं थी। इसके बावजूद वे रेस में उतरे और अपना बेस्ट दिया। जर्मनी में उन्होंने 100 मीटर की रेस 10.14 सेकंड में पूरी की। इसके साथ ही उन्होंने अपना पर्सनल बेस्ट टाइम भी बनाया। अनिमेष का एथलेटिक्स का सफर भी काफी दिलचस्प है। वे सैनिक स्कूल अंबिकापुर में फुटबॉल खेलते थे। एक दिन दोस्तों ने कहा कि तुम्हारी स्पीड अच्छी है, एथलेटिक्स में भी ट्राई करो। इसके बाद उन्होंने पहली बार स्टेट मीट में हिस्सा लिया। यहां उन्होंने 100 मीटर रेस के साथ शॉटपुट में भी गोल्ड मेडल जीता। उस समय उन्हें यह भी पता नहीं था कि इस प्रतियोगिता के जरिए नेशनल के लिए सिलेक्शन हो रहा है। आज अनिमेष इंटरनेशनल लेवल पर भारत का नाम रोशन कर रहे हैं। वे एशियन गेम्स में मिक्स्ड रिले में ब्रॉन्ज मेडल जीत चुके हैं। हालांकि, व्यक्तिगत रेस में मेडल नहीं जीत पाने का मलाल भी है। उनका सपना है कि किसी बड़े इंटरनेशनल इवेंट में भारत के लिए गोल्ड मेडल जीतें और पोडियम पर बीच में खड़े होकर देश का राष्ट्रगान सुनें। दैनिक भास्कर डिटिजल की टीम अनिमेष कुजूर के रायपुर स्थित घर पहुंची। टीम ने उनसे उनके अब तक के सफर, मुश्किल दिनों, माता-पिता के सपोर्ट और आगे के टारगेट पर बात की। पढ़िए इंटरव्यू... देखिए ये तस्वीरें… सवाल: आप सैनिक स्कूल में फुटबॉल खेलते थे, फिर एथलेटिक्स में आने का ख्याल कैसे आया? जवाब: मैं सैनिक स्कूल अंबिकापुर से पास आउट हुआ। 2020 में स्कूल से निकलने के अगले ही दिन कोविड शुरू हो गया था। मेरे पेरेंट्स ने कभी नहीं कहा कि बाहर मत जाओ या खेलना बंद कर दो। दोनों DSP हैं। उस समय उनकी ड्यूटी लोगों को क्वारंटाइन कराने में भी लगती थी, लेकिन उन्होंने मुझे खेलने से नहीं रोका। मैं ग्राउंड में जाता था, जहां पुलिस और आर्मी की भर्ती की तैयारी करने वाले लोग ट्रेनिंग करते थे। मैं भी उनके साथ कभी दौड़ लेता था, कभी शॉटपुट, हाई जंप या लॉन्ग जंप ट्राई कर लेता था। ऐसे ही धीरे-धीरे फुटबॉल से मेरा इंटरेस्ट एथलेटिक्स में बढ़ने लगा। कोविड के बाद स्टेट मीट होने वाला था। मेरे फुटबॉल खेलने वाले दोस्तों ने कहा कि तुम्हारी स्पीड अच्छी है, तुम भी जाकर ट्राई करो। मैं प्रतियोगिता से एक दिन पहले पहुंचा था। उसी शाम मुझे बताया गया कि ब्लॉक कैसे लगाते हैं और स्टार्ट कैसे लेते हैं। इससे पहले मुझे एथलेटिक्स के बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं था। सिंथेटिक ट्रैक पर भी मैं पहली बार दौड़ा था। मैंने 100 मीटर रेस और शॉटपुट में हिस्सा लिया और दोनों में गोल्ड जीत लिया। मुझे यह भी नहीं पता था कि यहां से नेशनल के लिए सिलेक्शन हो रहा है। बाद में एसोसिएशन से फोन आया कि मेरा नेशनल के लिए सिलेक्शन हो गया है और मुझे गुवाहाटी जाना है। सवाल: पहली बार नेशनल खेलने गए तो क्या लगा कि इस खेल में आगे बढ़ सकते हैं? जवाब: जनवरी 2021 में पहली बार नेशनल खेलने गुवाहाटी गया था। पहली बार पेरेंट्स के बिना बाहर गया था। वहां 100 मीटर में पांचवीं और 200 मीटर में चौथी रैंक मिली, तब लगा कि इस खेल में आगे भी ट्राई करना चाहिए। इसके बाद फिर कोविड आ गया। लगा कि अभी तो शुरुआत की थी और फिर रुकना पड़ रहा है। अक्टूबर 2021 में दिल्ली में अंडर-23 की प्रतियोगिता हुई। मैंने सोचा कि सीनियर खिलाड़ियों के साथ भी ट्राई करते हैं। 200 मीटर में मेरी पांचवीं रैंक आई। मेरे लिए यह बड़ी बात थी कि कम उम्र में सीनियर खिलाड़ियों के साथ फाइनल तक पहुंचा। इसके बाद हैदराबाद में साईं के साथ ट्रेनिंग करने का मौका मिला। फिर बिलासपुर में अंडर-23 प्रतियोगिता में मीट रिकॉर्ड बनाया। वहीं से रिलायंस फाउंडेशन से जुड़ने का रास्ता खुला। सवाल: गुरविंदर सिंह के साथ एक ही प्रतियोगिता में बार-बार रिकॉर्ड टूटे, उस दिन क्या चल रहा था? जवाब: इस बार हम सबने पूरी ताकत लगा दी थी। सेमीफाइनल में गुरविंदर ने 10.18 सेकंड का रिकॉर्ड बनाया। इसके बाद मैंने 10.17 सेकंड का टाइम निकाला और रिकॉर्ड को 10.15 सेकंड तक ले गया। अगले दिन गुरविंदर ने 10.09 सेकंड में रेस पूरी की, जबकि मेरा टाइम 10.20 सेकंड रहा। उस दिन रिकॉर्ड पर रिकॉर्ड बन रहे थे। हम लोगों को भी काफी मजा आया। इसके बाद हम दोनों का कॉमनवेल्थ के लिए सिलेक्शन हुआ। ट्रैक पर हमारे बीच मुकाबला रहता है, लेकिन उसके बाहर हम अच्छे दोस्त हैं। हम रिले टीम में भी साथ रहते हैं। इंटरनेशनल कॉम्पिटिशन में जाते हैं तो कई बार साथ ही रहते हैं। रेस में एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश होती है, लेकिन बाकी समय दोस्ती रहती है। सवाल: जर्मनी में जिस दिन आपने 10.14 सेकंड का अपना बेस्ट टाइम दिया, उस दिन आपकी तबीयत खराब थी। फिर भी रेस में उतरने का फैसला कैसे किया? जवाब: इस साल जून में जर्मनी में प्यूमा फास्ट आर्म्स फास्टेस्ट कॉम्पिटिशन था। उस समय मेरी तबीयत थोड़ी खराब थी। मैं पोलैंड में टीम के साथ था और वहां से अकेले जर्मनी गया था। पहली बार इस तरह अकेले ट्रैवल करके कॉम्पिटिशन में हिस्सा ले रहा था। मेरे मन में था कि इतनी दूर आया हूं, तो मुझे खुद ही सब मैनेज करना होगा। हर बार कोच या फिजियो मेरे साथ नहीं आ सकते। मैं वहां यह एक्सक्यूज नहीं देना चाहता था कि तबीयत खराब थी, इसलिए अच्छा नहीं कर पाया। मैंने किसी तरह खुद को संभाला और रेस में उतरा। तबीयत ठीक नहीं होने के बावजूद 10.14 सेकंड का अपना पर्सनल बेस्ट टाइम दिया। मेरे लिए यह बहुत अच्छा पल था। अब मेरा टारगेट 10 सेकंड से कम टाइम निकालना है। 10 सेकंड से नीचे रेस पूरी करने का जो मजा होगा, वह अलग ही होगा। सवाल: पहली बार इंटरनेशनल मेडल जीता था, तब क्या फीलिंग थी? जवाब: पहली बार विदेश रूस गया था। वहां कजान में कॉम्पिटिशन था। मैं देख रहा था कि भारतीय खिलाड़ी मेडल जीतने के बाद तिरंगे के साथ फोटो खिंचवा रहे हैं। मैं स्टैंड में बैठा सोच रहा था कि मेरा दिन कब आएगा। फिर जब मैंने 200 मीटर में ब्रॉन्ज मेडल जीता, तो लगा कि कल तक जिस चीज के बारे में सोच रहा था, आज वही मेरे साथ हो रहा है। तिरंगा लेकर फोटो खिंचवाना बहुत प्राउड मोमेंट था। इसके बाद एशियन चैंपियनशिप और दूसरी इंटरनेशनल प्रतियोगिताओं में भी मेडल मिले। हर बार देश के लिए खेलना और तिरंगे के साथ खड़े होना बहुत अच्छा लगता है। सवाल: एशियन गेम्स में मिक्स्ड रिले में ब्रॉन्ज मिला, लेकिन व्यक्तिगत रेस में मेडल नहीं आए। इसका कितना मलाल है? जवाब: 100 मीटर मेरे लिए साइड इवेंट जैसा है, जबकि 200 मीटर मेरा मेन इवेंट है। एशियन गेम्स में मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की। उस समय यही सोच रहा था कि भारत के लिए दौड़ना है और अपना पूरा दम लगाना है। लेकिन व्यक्तिगत रेस में क्या हुआ, यह मुझे खुद भी समझ नहीं आया। ट्रेनिंग कैंप तक सब अच्छा चल रहा था। मुझे लगता था कि अपनी नॉर्मल टाइमिंग में दौड़ता तो 200 मीटर में मेडल आ सकता था। 100 मीटर में पर्सनल बेस्ट देना पड़ता, लेकिन 200 मीटर में भी उम्मीद थी। मैंने कोच से इस बारे में बात की है। कभी-कभी ट्रेनिंग में अच्छा करने के बाद भी कॉम्पिटिशन में वैसा प्रदर्शन नहीं हो पाता। इसकी वजह समझने और आगे सुधार करने की कोशिश कर रहा हूं। मिक्स्ड रिले में ब्रॉन्ज जीतना अच्छी बात थी, लेकिन व्यक्तिगत इवेंट में भी भारत के लिए मेडल जीतना चाहता था। सवाल: बड़े इंटरनेशनल कॉम्पिटिशन में उतरते समय प्रेशर रहता है? जवाब: पहले मुझे लगता था कि बड़े कॉम्पिटिशन में बहुत प्रेशर होगा। लेकिन पिछले साल मोनाको में डायमंड लीग खेलने का एक्सपीरियंस मेरे लिए काफी खास रहा। वहां दुनिया के बड़े एथलीटों के साथ मुकाबला किया और उनसे मिला। मैंने देखा कि इतने बड़े खिलाड़ी भी काफी चिल रहते हैं। तब समझ आया कि कई बार हम खुद ही अपने ऊपर जरूरत से ज्यादा प्रेशर बना लेते हैं। अब बड़े कॉम्पिटिशन में जाने पर घबराहट नहीं होती, बल्कि एक्साइटमेंट होता है कि चलो, अब कुछ अच्छा करने का मौका मिलेगा। सवाल: पेरेंट्स दोनों पुलिस सेवा में हैं। जब आपने एथलेटिक्स को करियर बनाने का फैसला किया, तो उनका क्या रिएक्शन था? जवाब: मेरे पेरेंट्स हमेशा सपोर्टिव रहे हैं। पापा और मम्मी का कहना था कि जो करना है, करो। मम्मी और मौसी को थोड़ी चिंता रहती थी कि अगर पढ़ाई नहीं की तो आगे क्या होगा। उनकी चिंता भी सही थी। लेकिन परिवार ने मुझे कभी रोका नहीं। उन्होंने फाइनेंशियली, मेंटली और हर तरह से सपोर्ट किया। मैं खुद को लकी मानता हूं कि उन्होंने मुझे इस फील्ड में आगे बढ़ने का मौका दिया। अब उन्हें भी खुशी होती है कि जिस काम पर उन्होंने भरोसा किया, उसमें मैं आगे बढ़ रहा हूं। मुझे लगता है कि उन्होंने जो विश्वास दिखाया, उस पर खरा उतरना मेरे लिए बहुत जरूरी था। सवाल: कभी लगा कि एथलेटिक्स छोड़कर कोई दूसरा करियर चुन लेना चाहिए? जवाब: स्कूल के समय मेरा टारगेट नेशनल डिफेंस एकेडमी में जाना था। सैनिक स्कूल का माहौल ही ऐसा था। प्रिंसिपल, वाइस प्रिंसिपल और कई अधिकारी डिफेंस से जुड़े थे। हमें डिफेंस से जुड़ी जगहों पर जाने और उन्हें समझने का मौका भी मिलता था। लेकिन एथलेटिक्स में आने के बाद कभी ऐसा नहीं लगा कि गलत रास्ता चुन लिया है। अब इसी खेल में आगे बढ़ रहा हूं। परिवार का भरोसा मिला है और मैं इस फील्ड में अच्छा करना चाहता हूं। इसलिए इसे छोड़ने के बारे में नहीं सोचता। सवाल: आप साल में कम ही दिन घर पर रहते हैं। घर और परिवार की याद आती है? जवाब: मैं क्लास-6 से हॉस्टल में रहा हूं। वहां एक फोन पर करीब 80 बच्चों की फैमिली को बात करनी होती थी। फोन करने का समय भी तय था। कभी कॉल लग जाता था, कभी नहीं। कई बार एक-दो हफ्ते तक घर पर बात नहीं हो पाती थी। शुरुआत में हॉस्टल में थोड़ा अजीब लगता था, लेकिन धीरे-धीरे आदत हो गई। अब इतने साल से घर से दूर रहने के कारण इसकी आदत बन गई है। जब घर आता हूं तो परिवार के साथ समय बिताना अच्छा लगता है। सवाल: छत्तीसगढ़ और देश के लोगों को आपसे काफी उम्मीदें हैं। क्या यह उम्मीदें कभी प्रेशर बनती हैं? जवाब: मैं समझता हूं कि लोगों को उम्मीद रहती है कि छत्तीसगढ़ का खिलाड़ी आगे बढ़े और देश के लिए मेडल जीते। लेकिन अच्छे रिजल्ट आने में समय लगता है। मैंने अपना करियर बाकी खिलाड़ियों की तरह बहुत पहले शुरू नहीं किया था। अगर पहले शुरू करता तो शायद कुछ चीजें पहले हो जातीं। अब जिस समय शुरुआत की है, उसी हिसाब से आगे बढ़ रहा हूं। हमने पहले से प्लान किया है कि किस साल कौन-सी प्रतियोगिता पर फोकस करना है। इसलिए लोगों को भी समझना चाहिए कि हर चीज तुरंत नहीं होती। मेहनत करनी पड़ती है और समय देना पड़ता है। सवाल: खेल के साथ डाइट और फिटनेस को कैसे मैनेज करते हैं? घर आने पर पसंद का खाना मिलता है? जवाब: बाहर का खाना और ऐसी चीजें, जो मेरी डाइट के लिए सही नहीं हैं, उन्हें जितना हो सके अवॉइड करता हूं। घर के खाने में चावल और रोटी भी जरूरी हैं, लेकिन डाइट को ट्रेनिंग के हिसाब से मैनेज करना पड़ता है। अभी घर आया हूं तो पसंद का खाना भी खा रहा हूं। मेरा फेवरेट चिली चिकन है। मेरी मामी ने खास तौर पर मेरे लिए चिली चिकन बनाया था। घर आकर ऐसा खाना खाने का मजा ही अलग है। सवाल: आपकी ट्रेनिंग कैसी रहती है? क्या आराम करने का भी समय मिलता है? जवाब: हमारी ट्रेनिंग में ट्रैक और जिम के दिन अलग-अलग होते हैं। ट्रैक वाले दिन सुबह करीब 5:30 बजे उठना पड़ता है। सुबह 6:30 से 10 या कभी 10:30 बजे तक वर्कआउट चलता है। इसके बाद स्विमिंग होती है और फिर लंच। लंच के बाद बॉडी की स्ट्रेंथ और जिन हिस्सों में कमी है, उन पर काम करते हैं। शाम को रिकवरी सेशन, स्टीम बाथ और दूसरी रिकवरी एक्सरसाइज होती हैं। रात की नींद भी बहुत जरूरी है, इसलिए कोच दिन में ज्यादा सोने नहीं देते। आराम के लिए मूवी देखता हूं, वेब सीरीज देखता हूं या कभी थिएटर चला जाता हूं। शनिवार शाम को दोस्तों के साथ मॉल या आसपास घूमने निकल जाते हैं। मुझे वॉक करना भी बहुत पसंद है। रविवार को पूरा दिन चिल करने की कोशिश करता हूं। सवाल: छत्तीसगढ़ में खेलों को और बेहतर बनाने के लिए क्या बदलाव जरूरी हैं? जवाब: दूसरे राज्यों और देशों में स्पोर्ट्स का कल्चर पहले से बना हुआ है। उन्हें पता है कि खिलाड़ी तैयार करने के लिए किस तरह का इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए। छत्तीसगढ़ में भी इस दिशा में काम हो रहा है, लेकिन अभी और काम किया जा सकता है। जैसे-जैसे यहां से नए खिलाड़ी निकलेंगे, सरकार को भी समझ आएगा कि ग्रासरूट लेवल पर किन चीजों की जरूरत है। बच्चों को शुरुआत से अच्छे मौके मिलने चाहिए, ताकि वे अपने खेल में आगे बढ़ सकें। मेरे हिसाब से खिलाड़ी, परिवार और सरकार, सभी में कुछ करने का जुनून होना चाहिए। खिलाड़ी में पैशन हो और उसे परिवार और सरकार का सपोर्ट मिले, तो मुश्किल परिस्थितियों में भी आगे बढ़ सकता है। सवाल: अब आगे का टारगेट क्या है? अगले साल किन प्रतियोगिताओं पर फोकस रहेगा? जवाब: नवंबर और दिसंबर में भारत में ट्रेनिंग करूंगा। इसके बाद विदेश में ट्रेनिंग के लिए जाने का प्लान है। अभी तय किया जा रहा है कि कहां जाना है। अगले साल एशियन चैंपियनशिप, वर्ल्ड यूनिवर्सिटी गेम्स और वर्ल्ड एथलेटिक्स चैंपियनशिप जैसे बड़े इवेंट हैं। इन प्रतियोगिताओं में अच्छा प्रदर्शन करना है। इसके बाद ओलिंपिक के लिए क्वालिफाई करना बड़ा टारगेट है। मैं चाहता हूं कि भारत के लिए गोल्ड मेडल जीतूं। जब पोडियम पर बीच में खड़े होकर देश का राष्ट्रगान सुनने का मौका मिलता है, तो वह एहसास अलग होता है। अब तक कई मेडल जीते हैं, लेकिन उस जगह खड़े होने का सपना है।
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