दुर्गा विसर्जन और दशहरा: विजय, शक्ति और धर्म की स्थापना का महापर्व
दुर्गा विसर्जन और विजयादशमी यानी दशहरा ऐसा महापर्व है, जो बुराई पर अच्छाई, अधर्म पर धर्म, असत्य पर सत्य और अहंकार पर मर्यादा की विजय का संदेश देता है। शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना के बाद दसवें दिन विजयादशमी मनाई जाती है। इसी दिन अनेक स्थानों पर मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। दूसरी ओर भगवान श्रीराम द्वारा लंकापति रावण के वध की स्मृति में देश के अनेक हिस्सों में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाता है। इस प्रकार एक ही पर्व में शक्ति की आराधना और धर्म की विजय, दोनों भाव एक साथ दिखाई देते हैं।
कब मनाया जाएगा दशहरा और दुर्गा विसर्जन?
विजयादशमी और दुर्गा विसर्जन मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 को मनाया जाएगा। दिल्ली के स्थानीय पंचांग के अनुसार दशमी तिथि 20 अक्टूबर को दोपहर 12.50 बजे शुरू होगी और 21 अक्टूबर को दोपहर 2.19 बजे समाप्त होगी। विजय मुहूर्त दिल्ली में लगभग दोपहर 1.59 बजे से 2.45 बजे तक बताया गया है। दुर्गा विसर्जन के लिए दिल्ली-एनसीआर के समीपवर्ती पंचांग गणना में 20 अक्टूबर को दोपहर 1.15 बजे से 3.31 बजे तक का समय दिया गया है। हालांकि पूजा और विसर्जन का मुहूर्त स्थान, स्थानीय सूर्योदय और पारिवारिक परंपरा के अनुसार कुछ अलग हो सकता है।
इसे भी पढ़ें: Vijayadashami पर रावण दहन के लिए प्रदोष काल शुभ, 20 अक्तूबर को मनेगा पर्व
दशहरा का धार्मिक महत्व
इसी दिन भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया था। रावण विद्वान और शक्तिशाली होने के बावजूद अपने अहंकार, अधर्म और अन्याय के कारण विनाश को प्राप्त हुआ। इसलिए दशहरा यह संदेश देता है कि ज्ञान और शक्ति तभी सार्थक हैं, जब उनका उपयोग धर्म और मर्यादा के लिए किया जाए।
दूसरी मान्यता शक्ति परंपरा से जुड़ी है। देवी दुर्गा ने महिषासुर नामक असुर का वध कर देवताओं और संसार को उसके अत्याचार से मुक्ति दिलाई। इसीलिए विजयादशमी को असुरता पर देवी शक्ति की विजय का पर्व भी माना जाता है। यही कारण है कि भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में इस दिन की धार्मिक परंपराएं अलग दिखाई देती हैं, लेकिन मूल भावना धर्म की विजय और अधर्म का अंत ही है।
दुर्गा विसर्जन का महत्व
नौ दिनों तक मां दुर्गा की पूजा के बाद दशमी के दिन प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। विसर्जन को केवल प्रतिमा को जल में प्रवाहित करने की प्रक्रिया के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि यह पूजा-अनुष्ठान की पूर्णता और मां को सम्मानपूर्वक विदा करने की धार्मिक परंपरा है। पूजा में जिस शक्ति का आवाहन किया गया था, विसर्जन के समय उसी शक्ति से पुनः अपने जीवन और घर-परिवार पर कृपा बनाए रखने की प्रार्थना की जाती है। विसर्जन का आध्यात्मिक संदेश भी अत्यंत गहरा है। संदेश यह है कि आगमन और प्रस्थान, निर्माण और विलय तथा आरंभ और पूर्णता प्रकृति के शाश्वत नियम हैं। इसीलिए भक्त मां को विदा करते समय कहते हैं कि माता अगले वर्ष फिर आएं और अपने साथ सुख, शांति, समृद्धि और शक्ति लेकर आएं।
दुर्गा विसर्जन की सामान्य पूजा विधि
दुर्गा विसर्जन से पहले मां दुर्गा की पूजा श्रद्धा और विधि-विधान से की जाती है। सबसे पहले मां दुर्गा को स्नान, वस्त्र, पुष्प, अक्षत, रोली, सिंदूर, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित किया जाता है। फिर मां दुर्गा की आरती की जाती है और परिवार की सुख-शांति तथा कल्याण के लिए प्रार्थना की जाती है। जहां नवरात्रि की परंपरा में कन्या पूजन किया जाता है, वहां कन्याओं को भोजन कराया जाता है और उन्हें दक्षिणा तथा उपहार देकर आशीर्वाद लिया जाता है। नवरात्रि के प्रारंभ में स्थापित कलश तथा अन्य पूजन सामग्री का विधि के अनुसार समापन किया जाता है। कलश के जल को पवित्र स्थान या पौधे में अर्पित करने की परंपरा कई परिवारों में है। इसके बाद मां दुर्गा से निवेदन किया जाता है कि वे भक्तों की पूजा स्वीकार कर पुनः अपने दिव्य धाम को प्रस्थान करें और अपने आशीर्वाद से परिवार की रक्षा करें। तत्पश्चात प्रतिमा को श्रद्धापूर्वक विसर्जन स्थल तक ले जाया जाता है। वहां पूजा और प्रार्थना के बाद प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। वर्तमान समय में पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए स्थानीय प्रशासन द्वारा निर्धारित विसर्जन स्थल और नियमों का पालन करना चाहिए। प्रतिमा और पूजन सामग्री के विसर्जन की व्यवस्था स्थानीय नियमों के अनुसार करना उचित है।
दशहरा पूजन विधि
विजयादशमी के दिन अनेक परिवारों में भगवान श्रीराम, मां दुर्गा, शस्त्र, वाहन, औजार तथा पुस्तकों आदि की पूजा की जाती है। कुछ परंपराओं में शमी पूजा, अपराजिता पूजा और सीमोल्लंघन भी किया जाता है। इन्हें सामान्यतः अपराह्न काल में करने की परंपरा बताई गई है।
पूजा के लिए स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल को स्वच्छ करें। भगवान श्रीराम, मां दुर्गा अथवा अपने इष्टदेव की पूजा करें। पुष्प, अक्षत, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। शस्त्र, औजार या वाहन की पूजा करने की पारिवारिक परंपरा हो तो उसे भी विधिवत पूजें। शमी अथवा अपराजिता की पूजा करें। भगवान श्रीराम और मां दुर्गा का स्मरण करते हुए परिवार के सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें। अंत में आरती करके प्रसाद वितरित करें। पूजा की स्थानीय परंपरा और कुलाचार को प्राथमिकता देना उचित है।
दशहरा व्रत कथा
विजयादशमी की कथा के दो प्रमुख धार्मिक प्रसंग हैं। श्रीराम और रावण का युद्ध तथा मां दुर्गा और महिषासुर का संग्राम।
श्रीराम और रावण की कथा
लंका का राजा रावण अत्यंत विद्वान और शक्तिशाली था, लेकिन उसके भीतर अहंकार और अधर्म बढ़ गया था। उसने माता सीता का हरण किया और भगवान श्रीराम को चुनौती दी। श्रीराम ने धर्म और न्याय की रक्षा के लिए रावण के विरुद्ध युद्ध किया। लंका में कई दिनों तक भयंकर युद्ध चला। अंततः विजयादशमी के दिन श्रीराम ने रावण का वध किया। इसी घटना की स्मृति में दशहरा मनाया जाता है और अनेक स्थानों पर रावण, कुंभकर्ण तथा मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाता है। इस कथा का संदेश केवल रावण के वध तक सीमित नहीं है। यह मनुष्य को चेतावनी देती है कि अहंकार चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, वह अंततः विनाश का कारण बनता है।
मां दुर्गा और महिषासुर की कथा
पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार महिषासुर नामक असुर ने कठोर तपस्या करके वरदान प्राप्त किया और अत्यंत शक्तिशाली हो गया। शक्ति के मद में उसने देवताओं और पृथ्वी पर अत्याचार आरंभ कर दिया। महिषासुर से युद्ध करने में देवताओं को कठिनाई हुई। तब देवताओं की शक्तियों के समन्वय से देवी दुर्गा का प्राकट्य हुआ। देवी ने महिषासुर से भयंकर युद्ध किया और अंततः उसका वध कर दिया। इसी विजय की स्मृति में देवी को महिषासुरमर्दिनी के रूप में पूजा जाता है और नवरात्रि के बाद विजयादशमी को शक्ति की विजय का पर्व माना जाता है। यह कथा बताती है कि जब अत्याचार अपनी सीमा पार करता है, तब धर्म और शक्ति का संगठित रूप अधर्म का अंत करता है।
दशहरा हमें क्या संदेश देता है?
दशहरा केवल पुतले जलाने या उत्सव मनाने का दिन नहीं है। यह अपने भीतर मौजूद उन प्रवृत्तियों को पहचानने का अवसर भी है, जो मनुष्य को धर्म और सत्य से दूर ले जाती हैं। रावण के दस सिर को परंपरागत रूप से अनेक नकारात्मक प्रवृत्तियों के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। इसलिए दशहरे का वास्तविक संदेश यह है कि मनुष्य अपने भीतर के अहंकार, क्रोध, लोभ, मोह और अन्य विकारों पर विजय प्राप्त करे। मां दुर्गा की आराधना हमें शक्ति देती है और श्रीराम की मर्यादा हमें उस शक्ति के उचित उपयोग का मार्ग दिखाती है।
इसीलिए विजयादशमी का सबसे बड़ा संदेश है कि शक्ति हो, लेकिन उसके साथ विवेक हो। सामर्थ्य हो, लेकिन उसके साथ मर्यादा हो। विजय मिले, लेकिन उसके साथ धर्म भी बना रहे।
- शुभा दुबे
किचन का Superfood है सौंफ, पेट की सूजन और एसिडिटी खत्म करने में है मददगार
हर भारतीय रसोई में सौंफ जरुर पाई जाती है। यह किसी सुपरफूड से कम नहीं है। यह स्वाद के साथ ही सेहत का भी खास ख्याल रखता है। इसमें पाए जाने वाले फाइबर, एंटीऑक्सीडेंट और एंटीबैक्टीरियल गुण पाचन तंत्र को मजबूत बनाते हैं, गैस -अपच से राहत दिलाने और सांसों को भी फ्रेश बनाता है।
आइए जानते हैं सौंफ के कुछ आसन और असरदार इस्तेमाल के तरीके-
खाने के बाद सौंफ का चबाना
अगर आप खाना खाने के बाद सौंफ चबाते हैं, तो यह एक पारंपरिक और कारगर तरीका है। इससे लार के स्राव को बढ़ाता है, जिससे भोजन जल्दी पच जाता है और मुंह की बदबू भी दूर होती है।
सौंफ का डिटॉक्स पानी
इसके लिए रात में एक चम्मच सौंफ पानी में भिगोकर रख दें और सुबह खाली पेट इसका सेवन जरुर करें। यह शरीर को डिटॉक्स करता है, पाचन को तेज करता है और पेट की सूजन को भी कम करता है।
सौंफ की हर्बल चाय
अगर आपको अपना दिन बेहतरीन रखना है, तो एक कप पानी में सौंफ उबालकर चाय बनाएं। इसमें थोड़ा अदरक या शहद मिलाएं। फिर गैस, एसिडिटी और पेट दर्द में राहत देने के साथ ही शरीर को रिलैक्स भी करती है।
सौंफ का पाउडर
सबसे पहले सौंफ को हल्का भून लें फिर इसे पीस लें। इसको रोजाना गुनगुने पानी के साथ के जरुर लें। यह मेटाबॉलिज्म को बेहतर बनाता है और पेट को हल्का रखता है, जिससे भारीपन महसूस नहीं होता है।
सलाद और डिशेज में इस्तेमाल
इतना ही नहीं, आप रायता या सब्जियों में भी थोड़ी सौंफ मिला सकते हैं, इससे स्वाद को बढ़ेगा और पाचन भी बेहतरीन होगा। यह एक हेल्दी फ्लेवर एन्हांसर की तरह काम करता है।
होम
जॉब
पॉलिटिक्स
बिजनेस
ऑटोमोबाइल
गैजेट
लाइफस्टाइल
फोटो गैलरी
Others 
prabhasakshi










